दलित संघर्ष को पर्दे पर उकेरती फिल्म ‘लाइफ ऑफ एन आउटकास्ट’

Posted by Bhaskar Jha in Hindi, Media
May 4, 2017

हर दौर में कुछ ऐसे फिल्म निर्देशक आते हैं जो उनके समकालीन सिनेमा से हटकर कुछ करने की कोशिश करते हैं। नफे-नुकसान के समीकरणों को एक तरफ रखकर कला को आगे लेकर आने का प्रयास इस तरह के लोगों की हमेशा से ही प्राथमिकता रही है। पवन श्रीवास्तव आज के दौर में ऐसे ही एक प्रयोगधर्मी निर्देशक हैं जो सिनेमा की दुनिया में अपनी पहचान को पुख्ता करने के प्रयास में अपनी फिल्म ‘लाइफ ऑफ़ अन आउटकास्ट’ लेकर आ रहे हैं। इससे पहले उनकी पहली फिल्म ‘नया पता’ को सैन फ्रांसिस्को फिल्म फेस्टिवल में भी सराहा गया पढ़िए  Youth Ki Awaaz के लिए भास्कर झा से हुई उनकी बातचीत में उनके फ़िल्मी सफ़र और उनकी प्रेरणाओं के बारे में –

भास्कर: फिल्म करियर में अब तक का आपका सफ़र और इस विधा की ओर रूचि का कारण ?

पवन: मेरा जन्म बिहार में छपरा जिले के पास एक इंडस्ट्रियल टाउन ‘मढ़हरा’ में हुआ, पिताजी वहां एग्रीकल्चरल डिपार्टमेंट में नौकरी करते थे। दसवीं तक वहीं एक प्राइवेट स्कूल में पढ़ाई की और फिर हम इलाहबाद आ गए। बचपन से ही मेरे ऊपर साहित्य का बहुत प्रभाव था। फिल्में भी बहुत देखते थे हम लोग, वीसीआर में एक रात में चार-चार फिल्में। सुबह उठते तो याद ही नहीं रहता था, एक कहानी दूसरी में मिल जाती थी। लेकिन अगले कुछ दिनों तक पापा फिल्म के बारे में ही बात करते थे, मोहल्ले भर में चर्चा होती थी। तब लगा कि फ़िल्में एक सशक्त माध्यम हैं।

मैंने देखा कि मेरे आस-पास की कहानियां फिल्मों में तो है ही नहीं? यहां भी तो कहानियां हैं! स्कूल जाते समय बहुत सारे दृश्य दिखते थे जैसे गर्मी की दोपहर है, सत्तूवाला सत्तू बेच रहा है, वहां एक आदमी आकर सत्तू पी रहा है। लगता था कि कितना सुंदर दृश्य है! शरतचंद्र की कहानियों में पढ़ता था कि एक आदमी नाव से नदी पार कर रहा है, पोस्टमास्टर चिट्ठी बांट रहा है, लगा इन सब कहानियों को भी सिनेमा में आना चाहिए। इलाहाबाद आने के बाद गज़लों की तरफ़ रुझान हुआ, गज़लों ने संवेदना पैदा की मेरे अंदर। बारहवीं तक मुझे एहसास हो गया था कि मेरे अंदर कुछ कहानियां हैं जो बाहर निकलना चाहती हैं।

भास्कर: फ़िल्म मेकिंग में क्या आपने कोई बेसिक ट्रेनिंग ली है?

पवन: इलाहबाद में था तो बहुत सी फ़िल्में देखीं। फिर दिल्ली आ गया कंप्यूटर साइंस की पढ़ाई करने। दिल्ली में कला की तरफ रुझान थोड़ा कम हो गया। ये सन 1999-2000 का समय था, इच्छाएं दबने लगी थी और मुझे लगा कि मेरे अंदर कुछ ख़ास नहीं है। इसके बाद मेरी नौकरी मुंबई में लगी। वहां ऑफिस में बैठे- बैठे ब्लॉग भी लिखता था। उसी दौरान पृथ्वी थिएटर भी जाने लगा और वहां मेरी मुलाक़ात संजना कपूर से हुई। मैंने सीधे उनसे कहा कि ‘मुझे थिएटर करना है’ उन्होंने पूछा, ‘क्या करते हो?’ मैंने कहा, ‘मैं नौकरी करता हूं’ उन्होंने कहा कि ‘तुम्हें नौकरी छोड़नी पड़ेगी, पृथ्वी में पार्ट टाइम कुछ भी नहीं है, फुल टाइम काम करना पड़ेगा। पर उस वक्त इतनी हिम्मत नहीं थी कि सब छोड़कर थिएटर ज्वाइन कर लेता।

2009-10 के आसपास मैं नौकरी छोड़कर बिहार चला आया और कुछ पुणे और बैंगलोर से आए दोस्तों के साथ मिलकर दो डाक्यूमेंट्री बनाई, बिना किसी ट्रेनिंग के। ये डॉक्यूमेंट्री खगड़िया के बाढ़ पीड़ित इलाकों पर बनाई गईं थी, सेव द चिल्ड्रेन आदि विषयों पर काम किया। समाज से जुड़कर काम करने की कोशिश की। मुझे लगा कि इस दिशा में कुछ करना चाहिए, सीखना चाहिए। फिर दो साल के बाद दुबारा मुंबई आ गया और अगले तीन साल मैंने अलग-अलग लोगों को असिस्ट किया।

भास्कर: आपकी फिल्मों ‘नया पता’ और ‘हाशिए के लोग’ के बारे में कुछ बताइए? 

पवन: एक रात अंधेरी से लौटते वक्त एक कहानी का आइडिया दिमाग में आया जिसे मैं develop करने लगा, वही कहानी ‘नया पता’ के रूप में उभर कर आई। नया पता माइग्रेशन(विस्थापन) के मुद्दे पर मेरी पहली फिल्म है और यह ख़ास इसलिए थी क्योंकि मेरी ज़िंदगी के अनुभवों और मेरी यात्रा की यह पहली प्रस्तुति थी। ‘नया पता’ उसी जगह पर बेस्ड है जहां मेरा बचपन बीता और जो देखा है वही बनाया है। 1985-90 के आस–पास बहुत सारी शुगर फैक्ट्रीज़ बंद होने लगी थी और बहुत बड़ा पलायन होने लगा जिसने मुझे काफ़ी हद तक प्रभावित किया। मैंने इसी मुद्दे के इर्द-गिर्द ‘नया-पता’ की कहानी लिखी।

अब समस्या आई प्रोड्यूसर की। कई विचार आए, कुछ लोगों ने नकारा भी, कुछ लोगों ने स्क्रिप्ट बदलने की राय दी वगैरह-वगैरह! पर मैं समझौता नहीं करना चाहता था। फिर कुछ दोस्तों की मदद से, कुछ क्राउड फंडिंग से, लगभग तीन साल के बाद बहुत मुश्किलों को पार करके फिल्म बनाई। PVR DIRECTOR’S RARE के बैनर तले फिल्म आखिरकार रिलीज़ हो ही गयी। फिर फिल्म फेस्टिवल में तारीफ़ हुई, हार्वर्ड से भी मेल आया और फिल्म सैन फ्रांसिस्को फिल्म फेस्टिवल में भी दिखाई गई।

मुझे अब मेरे सिनेमा पर काफ़ी विश्वास हो चुका था। मैंने वर्ल्ड सिनेमा को और समझना शुरू किया। मैं इतनी उर्जा में था कि मैंने एक बड़ी सी स्क्रिप्ट लिखी और उसका नाम ‘हाशिए के लोग’ रखा। जिसका बजट 1.5-2 करोड़ के आस-पास था। प्रोड्यूसर भी मिल गया, काफ़ी हद तक कास्टिंग और रिसर्च भी पूरा कर लिया था। प्रशांत नारायण अय्यर और राम गोपाल बजाज जी की कास्टिंग फाइनल भी हो गयी थी, लेकिन अचानक प्रोड्यूसर की कुछ निज़ी दिक्कतों के कारण फ़िल्म बीच में ही रुक गयी। फिर एक कम बजट की फिल्म लिखी पर एक साल बाद उसका भी प्रोड्यूसर बैक-आउट कर गया। दो बार मात खाने के बाद मैं तीसरी बार उस मीडियम में नहीं जाना चाहता था। मैंने सोचा सबसे पहले मुझे फ़िल्म करनी चाहिए, कुछ अपने पैसे जुटाए कुछ दोस्तों को साथ जोड़ा और दसवें दिन हम लखनऊ में शूट कर रहे थे। अब अच्छा लग रहा है फिल्म शूट करके। फिल्म शूट की है तो दर्शकों तक ले के जाऊंगा ही।

भास्कर: आज के सन्दर्भ में आपके हिसाब से सिनेमा की परिभाषा क्या है? और वेब-सीरीज़ वाले समय में लोग आपकी फिल्म को क्यों देखें?

पवन: चाहे साहित्य हो, थिएटर हो या फ़िल्म, पूरा समाज किसी एक माध्यम का ‘ऑडियंस’ नहीं हो सकता। हर सिनेमा एक ‘टारगेट ऑडियंस’ के लिए बनती है। बस पता होना चाहिए कि आप किस वर्ग के लिए सिनेमा बना रहे हैं?’ अगर आप ऐसी फिल्म बनाने की कोशिश करेंगे जो सबको पसंद आए तो आप मीडियोकर हो जाएंगे। मसलन लोग हनी सिंह को सुनते हैं तो पंडित जसराज को भी सुनने वाले लोग हैं। संख्या बहुत मायने नहीं रखती। मुझे अगर दर्शक नहीं मिलेंगे तो मैं तलाशूंगा।

मुझे पता है कि सिनेमा अब आर्ट कम है प्रोडक्ट ज़्यादा है और मुझे इससे कोई परहेज़ नहीं है। मैं उन लोगों को कोई दोष नही देता हूं, क्योंकि वह अपनी कहानी कह रहे हैं। मैं करण जौहर से कैसे उम्मीद कर सकता हूं कि वह ‘लाइफ ऑफ़ एन आउटकास्ट’ बनाएं, वह दुनिया उन्होंने नहीं देखी है। सब अपनी कहानी कह रहे हैं, मैं भी अपनी कहानी कह रहा हूं।

रही बात वेब-सीरीज की तो यह अलग माध्यम है, सिनेमा की साख अलग है। नुक्कड़ के आने से, प्रोसीनियम थिएटर थोड़े न मर गया। मैं मानता हूं कि जिस समय में हम जी रहे हैं हर आर्ट में काम होना ज़रुरी है। मेरी लिए वेब, थिएटर, कवितायें सब आर्ट का हिस्सा हैं। सबका अपना अस्तित्व है और हर आर्ट को सर्वाइव करने का पूरा हक़ है।

भास्कर: अभी के दौर में आपके कोई रोल मॉडल रहे हैं?

पवन: मैं इरान की फिल्मों से बहुत प्रभावित हूं, क्योंकि मैं इनके ज़रिए वहां के समाज को देखता हूं। वहां का जो राजनीतिक माहौल है, उसकी सामाजिक सरंचना बहुत अलग है। अक्सर हम सुनते हैं कि समाज के आधार पर सिनेमा बनता है पर इरानी सिनेमा बिल्कुल अलग दिशा में जा रहा है।

दे सिका की ‘द बाईसाइकिल थीफ’ पहली फिल्म है जिससे मैं बहुत प्रभावित रहा हूं। अभी हाल फ़िलहाल में अब्बास कैरोस्तामी की ‘सर्टिफाइड कॉपी’ जब मैंने देखी तो मैं काफी दिनों तक विचलित था। जफ़र पनाही की यात्रा जब ‘ऑफ़साइड’ में मैं देखता हूं तब मैं इंस्पायर हो जाता हूं। माजिद मजीदी की फिल्में मुझे बहुत पसंद है। मुझे लगता है कि इरानियन सिनेमा कहीं न कहीं प्रतिरोध का सिनेमा है और मेरा सिनेमा भी प्रतिरोध का सिनेमा है।

भास्कर: समकालीन समय में ऐसी कोई फिल्म या निर्देशक जो आपकी विचारधारा से मेल खाते हों?

पवन: फेंड्री और कोर्ट ऐसी दो फिल्में हैं, शायद मेरा सिनेमा इन्हीं के आस-पास है, ‘चैतन्य’ और ‘नागर्जुन’ दोनों से बहुत आशाएं हैं। अनंत गांधी की ‘शिप आफ़ थीसियस’ का बहुत बड़ा प्रशंसक हूं, दार्शनिकता है उनमें। एक अलग तरह का सिनेमा है वह, इंटेलेक्चुअल के लिए। ठीक है वह भी तो एक ऑडियंस है! हम उसको ख़ारिज नहीं कर सकते। सिनेमा को हमेशा एक नया डिस्कोर्स पैदा करना चाहिए। 

भास्कर: अब तक के सफ़र में यूथ के साथ आपका रिलेशन कैसा रहा है? क्या वह आपके सिनेमा में तारतम्य बैठा पाए?

पवन: दोनों तरीके से रिएक्शन आए, कुछ ने विरोध किया तो कुछ ने तारीफ़ भी की है। कुछ के लिए सिनेमा की परिभाषा शाहरुख और सलमान की फिल्मों से ही है, उनसे मेरी फिल्म की तुलना करेंगे तो वह मेरी फ़िल्म क्यों पसंद करेंगे? दोनों अलग-अलग तरह के सिनेमा हैं। लेकिन मेरे सिनेमा को आप किसी चश्मे से नहीं, केवल एक कहानी के नज़रिए से देखिए तो आपको पसंद आएगा।

जब मैं सोशल मीडिया पर अपने फिल्मों को लेकर लिखता हूं तो बहुत तरह से जवाब आता है कि ‘तुम कलाकार हो, राजनीति की बात क्यों लिखते हो? दूर रहो राजनीति से!’ मेरा मानना है कि राजनीति से भले ही आप दूर रहें, राजनीति आपसे दूर नहीं हो सकती। एक फिल्मकार हैं केरल के, उन्होंने कहा है कि सिनेमा का हर एक फ्रेम पॉलिटिक्स होता है। सिनेमा का हर फ्रेम एक पॉलिटिकल मैसेज देता है। मैं कौन से कपड़े अपने कैरेक्टर को पहना रहा हूं, किस रंग का कपड़ा है, किस तरह के शब्दों का इस्तेमाल कर रहा है? क्या संवाद बोल रहा है? सब पॉलिटिकल है। कई बार लोग कहते हैं कि सिनेमा पर फोकस करो, मैं कहता हूं राजनीति को समझना ही मेरे सिनेमा का फोकस है! अगर मेरे सिनेमा से राजनीति गायब हो जाएगी तो मैं ऐसा सिनेमा बनाऊंगा जिसकी कोई आवाज़ ही नहीं होगी।

भास्कर: ‘लाइफ आफ़ एन आउटकास्ट’ के बारे में  कुछ बताइए और आम लोगों तक इस फिल्म को पहुंचाने के लिए आपकी स्ट्रेटेजी क्या रहेगी ?

पवन: इस फिल्म की कहानी का मुख्य किरदार एक दलित है। उसके जीवन को दिखाया है, उसके वयस्क जीवन से बुढ़ापे तक की कहानी है। उसके जीवन के तीन महत्वपूर्ण हिस्सों को दिखाया है, कहानी यूपी के एक गांव की है। फ़िल्म शूट कर चुके हैं हम लोग और इसके पोस्ट-प्रोडक्शन के लिए पैसे जुटा रहा हूं। इस बार मैं कुछ फिल्म सोसाइटीज़ और संस्थाओं को जोड़ने की कोशिश भी कर रहा हूं। वह ऐसे ग्रुप हैं जो फ़िल्म को दिखाते हैं और इस तरह के सिनेमा को सपोर्ट करते हैं।

मैं चाहता हूं कि सिनेमा जिनके लिए बना है उन तक पहुंचे। फिल्म रिलीज़ होने से पहले, मैं 500 गांव में इसे स्क्रीन करना चाहता हूं और दस स्थानीय भाषाओं में सब-टाइटल करना चाहता हूं। मैं सिनेमा की रीच को बढ़ाना चाहता हूं। शहरी ऑडियंस तक पहुंचने के लिए फिल्म को रिलीज़ करने की कोशिश करूंगा। अगर नहीं हो पाई तो netflix, ऑनलाइन प्लेटफार्म जैसे विकल्प हैं ही।

मैं सबसे अपील कर रहा हूं कि कोई आर्थिक रूप से मदद करना चाहे तो https://www.studiosarvahara.com/ पर जाकर डोनेट कर सकते हैं। कोई आर्टिस्ट पोस्टर बनाकर सपोर्ट करना चाहे तो कर सकते हैं। जो कोई अपने गांव में इस फिल्म की स्क्रीनिंग करवाना चाहता है, मुझसे सम्पर्क कर सकता है, मैं उसे DVD कुरियर कर दूंगा। इस इंटरव्यू को पढ़ने वाले मुझे सीधे सम्पर्क कर सकते हैं। यह हमारी ज़िम्मेदारी है कि गांव के लोगों तक यह फ़िल्म पहुंचे।

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