जसवंत खालरा वो इंसान जो शमशान से लावारिस लाशों का सुबूत ले आया था

साल 1987, पंजाब अखबारों की सुर्खियों में था और हर दिन पंजाब के बारे में कोई न कोई खबर प्रकाशित हो रही थी। पंजाब के बाहर सिखों के प्रति बढ़ती नफरत को देखते हुए पिता जी ने हमें पंजाब भेजने का फैसला किया। सिख समुदाय के ज़्यादातर लोगों की तरह उन्हें भी लगता था कि उस समय सिखों के लिये पंजाब ही सबसे सुरक्षित जगह थी, लेकिन पंजाब की हकीकत इस सोच से कुछ अलग थी।

हमारे गांव के नज़दीक सबसे बड़ा कस्बा मंडी निहाल सिंह वाला और भदौड़ था और सबसे  नजदीकी शहर मोगा था। गर्मियों में शाम 5 बजे के बाद एक तरह का कर्फ्यू लग जाता था और हमें घर से बाहर जाने की आज्ञा नहीं थी। किसानों ने रात को खेतों में जाना छोड़ दिया था, सारे सरकारी बैंक, दफ्तर आदि बंद हो जाते थे। अखबारों की मुख्य खबरों में पुलिस द्वारा किये जा रहे एनकाउंटर छाए रहते थे। आम पंजाबी को इस बात का एहसास था कि इन एनकाउंटरों में कितनी सच्चाई हैं। पंजाब के नौजवान घर से गायब हो रहे थे, जिसमें अमृतसर, तरनतारन और गुरुदासपुर पंजाब के तीन जिलों के नौजवानों संख्या सबसे ज़्यादा थी। जब पुलिस से इसके बारे में पूछा जाता तब उनका यही बयान होता था कि ये सब लड़के बाहर विदेशों में जाकर काम कर रहे हैं और बेवजह इसे एक मुद्दा बनाया जा रहा है।

ये बात करीब 1987-88 की है, मुझे ठीक से याद नहीं कि वह कौन सा महीना था लेकिन हमारे गांव के पास के एक नहरी नाले में एक लाश आयी थी, मुझे याद हैं कि वो लाश फूल गयी थी और उस पर कोई कपड़ा नहीं था और वो लाश नाले की झाड़ियों में फंसकर रुक गयी थी। उन दिनों इस तरह से लाशों का आना आम था। घर से दबाव पड़ा कि पंजाब या पंजाब के बाहर एक सिख के लिये हालात एक जैसे ही हैं और हम वापस गुजरात आ गये।

हमारा पंजाब आना-जाना लगा रहता था, खासकर कि गर्मियों की छुटियों में। 1992 की गर्मियों में, मैं अपने एक रिश्तेदार के यहां रुका हुआ था। उनका खेतों के बीच एक बड़ा सा घर था, घर के मुखिया की फौज में रहते हुये मौत हो चुकी थी। एक दिन पुलिस की जिप्सी उनके घर आकर रुकी, खेतों के बीच घर का होना शक पैदा करता था। वैसे उन दिनों पुलिस सबको शक की नज़र से ही देखती थी, पुलिस अपनी छान बीन कर रही थी। मुझे थानेदार का नाम तो याद नही लेकिन लोग उन्हें शर्मा जी कह कर बुला रहे थे। जिप्सी में एक आदमी बैठा था, शायद बंदी था, क्यों था मुझे नहीं पता।

थानेदार चारपाई पर बैठा था और मेरे रिश्तेदार पैरो के बल, हाथ जोड़कर मिन्नत कर रहे थे। थानेदार को यकीन हो गया कि ये घर एक मरहूम फौजी का है, वह वहां से चलने ही वाला था कि उसकी नजर मुझ पर पड़ी। मेरे जीवन का ये पहला अनुभव था किसी पुलिस अधिकारी से बात करने का, मैं कुछ बोल नहीं पाया, लेकिन जिनके घर पर मैं रुका था उन्होंने बताया कि मैं पंजाब के बाहर से हूं। थानेदार के जाने के बाद मेरी सांसो में सांस आयी। लेकिन अगर मैं कहीं बाहर अकेला घूम रहा होता और पुलिस को देखकर डर के मारे भागता, तो क्या मैं भी गुमशुदगी की लिस्ट में शामिल हो जाता? कहना मुश्किल हैं। लेकिन ये गुमशुदा लोग कहां जा रहे थे, ये सवाल मां-बाप के आंसुओं में ही बह जाता था लेकिन पुलिस से पूछने की उनकी हिम्मत नहीं होती थी।

कुछ साल बाद इन सवालों का जवाब मिला, जसवंत सिंह खालरा जो कि एक मानवाधिकार कार्यकर्ता थे, 1989 में तरनतारन में बतौर डायरेक्टर एक बैंक में कार्यरत थे। उस दौरान इनके दो सहयोगी पियारा सिंह और अमरीक सिंह को पुलिस ने उठा लिया जिनकी गिरफ्तारी किसी भी कागज में दर्ज नही की गई थी। पुलिस से किसी भी तरह की जानकारी का ना मिलना और पुलिस द्वारा इनकी गिरफ्तारी को नकार देना, इस शक को पैदा कर रहा था की पुलिस द्वारा उनकी हत्या कर दी गयी है।

इन गायब हुए दो लोगों की खोज के सिलसिले में जसवंत सिंह ने शमशानों का रुख किया, वहां उन्हें जो जानकारी मिली उससे पंजाब की बदहाली की दास्तान बयान हो रही थी। सिर्फ अमृतसर, तरनतारन और मजीठिया इन तीन शहरों के शमशानों से और म्युनिसिपल ऑफ़िस से पुलिस द्वारा लावारिस कहकर जलाई गई लाशों की जानकारी को बतौर सबूत जसवंत सिंह खालड़ा ने इकट्ठा करना शुरू किया। धीरे-धीरे खालरा ने 2000 से भी ज़्यादा ऐसी लाशों की जानकारी इकट्ठा की जिन्हें पंजाब पुलिस ने लावारिस कहकर जला दिया था।

पहले उन्होंने भारत में इस पर क़ानूनी कार्रवाही करने के प्रयास किये लेकिन कोई सकारात्मक साथ ना मिलने से, खालरा ने इस लिस्ट को कनाडा की असेंबली में बतौर सबूत पेश कर दिया। लेकिन किसे पता था की इस लिस्ट में जसवंत सिंह खालरा का नाम भी दर्ज हो जायेगा। 1995 में पुलिस ने खालड़ा को उन्हीं के घर से उठा लिया और उनकी हत्या कर उनकी लाश को नहर में बहा दिया। पुलिस इस हत्या को भी गुमशुदगी का नाम दे रही थी, लेकिन लंबी कानूनी लड़ाई और पुलिस के ही एक कर्मचारी द्वारा खालरा की हत्या की गवाही से पुलिस के हत्यारों को क़ानून ने सजा सुनाई। लेकिन जसवंत सिंह खालरा द्वारा सार्वजनिक की गयी लावारिस लाशों की लिस्ट से पंजाब में एनकाउंटर का दौर थम गया था।

उस दिन मेरे गांव में लाश किस तरह नहर में आई गयी थी इसका तो पता नहीं चला, लेकिन एक पुलिस कर्मचारी सतवंत सिंह मानक ने ये सार्वजनिक किया की किस तरह उसकी मौजूदगी में 15 लोगो का कत्ल पुलिस द्वारा किया गया। जब इनके सामने एक 16 साल के लड़के कुलवंत सिंह कांता  को पुलिस ने पहले टार्चर किया और बाद में कत्ल करके लाश को नहर में बहा दिया तो इसके बाद सतवंत सिंह मानक का जमीर कांप गया। उन्होंने पुलिस की नौकरी छोड़ दी और बतौर गवाह बनकर इन हत्याओं की क़ानूनी लड़ाई में शामिल हो गए, लेकिन अभी तक उन्हें भी न्याय नहीं मिल पाया है।

आज पंजाब शांत हो चुका है लेकिन इन फ़र्ज़ी एनकाउंटरों की परछाई हमारी ज़िंदगी में मौजूद है, जहां पुलिस एक रक्षक से ज्यादा भक्षक की भूमिका में नजर आती है। पंजाब अपने काले दौर से तो निकल गया लेकिन उस दौरान ना जाने कितनी बेकसूर लोगों ने अपनी जान गंवाई। आज भले ही पंजाब किसी अख़बार की सुर्खियां नहीं बनता लेकिन शिक्षा, रोज़गार, सुरक्षा, सटीक और ईमानदार कानून व्यवस्था की नामौजूदगी में एक अलग तरह का एनकाउंटर पंजाब में जारी है। पुलिस की गोली से भी ज्यादा खतरनाक ये एनकाउंटर है नशा। शायद अब कोई लाश मेरे गांव के नहरी नाले में ना आये लेकिन आधी से ज़्यादा आबादी खत्म होने की कगार पर है। और इसकी रोकथाम के लिये कोई प्रहरी या जसवंत सिंह खालरा मौजूद नहीं है। मुझे डर हैं कि 1984 के दौर से जो पंजाब निकल पाने में कामयाब हुआ था, वो इससे शायद ना बच पाए।

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