इस देश की राजनीति ने महिला अधिकारों का हर दौर में मज़ाक बनाया है

महिला सुरक्षा के मुद्दे को चुनाव में प्रमुखता से उठाना सभी राजनीतिक पार्टियों का सर्वमान्य लक्ष्य प्रतीत होता है, चाहे दिल्ली विधानसभा चुनाव में सीसीटीवी लगाने की बात हो या उत्तर प्रदेश का विधानसभा चुनाव। जहां एक तरफ मुस्लिम वोट बैंक की राजनीति और मुसलमानों को सीट देने का मुद्दा महत्वपूर्ण रहा, वहीं महिलाओं के सीट आवंटन पर किसी राजनीतिक दल ने रुचि नहीं दिखाई है। हालांकि उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में विजयी महिला प्रत्याशियों की संख्या में कुछ वृद्धि दर्ज़ की गई है। लेकिन महिलाओं के सीट आवंटन पर और उनके उचित प्रतिनिधित्व के विषय पर कोई राजनीतिक पार्टी खुल कर सामने नहीं आई है।

मसला ये है कि क्या मुद्दों का वास्ता सिर्फ वोट बैंक की राजनीति से ही होनी चाहिए? क्या आज 108वें संविधान संशोधन की चर्चा प्रमुखता से नहीं होनी चाहिए है जिसमें संसद में 33 फीसदी महिला आरक्षण की बात कही गई थी? जिसे राज्यसभा ने तो पास कर दिया पर लोकसभा में पास नहीं हो सका। इस मुद्दे पर किसी राज्य सरकार ने विधानसभा में महिला सीट के आरक्षण पर किसी तरह के चर्चा को प्रमुखता नहीं दी गई है, जबकि देश की महिला जनसंख्या, कुल जनसंख्या की लगभग आधी है।

विगत वर्षों में पंचायती राज्य अधिनियम 1993 में संशोधन कर बिहार, मध्यप्रदेश, आंध्रप्रदेश आदि राज्यों ने ग्राम पंचायतों में महिलाओं के लिए 50 फीसदी सीट आरक्षित की हैं, जबकि उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य ने ऐसा कोई संशोधन लागू नहीं किया है। हालांकि पंचायत चुनावों में आरक्षण के बावजूद महिलाओं की प्रभावी भूमिका नहीं देखी जा रही है, जो चिंता का विषय है। महिलाओं के प्रभावी प्रतिनिधित्व को तय करने की ज़िम्मेदारी केंद्र सरकार के साथ-साथ राज्य सरकारों की भी है जिसका संवैधानिक आधार राज्य के नीति निदेशक तत्त्व से मिलता, पर केवल सवैधानिक संरक्षण से महिलाओं को सशक्त नहीं बनाया जा सकता है। महिला अधिकारों पर बात करने वाली कमला भसीन का मानना है कि जब तक पितृसत्तात्मक सोच को नही बदला जाएगा, महिला अधिकारों की बात करना सार्थक नहीं है। इसके लिए आवश्यक है कि महिलाओं के प्रति हमारा नज़रिया सकारात्मक और बराबरी वाली होनी चाहिए।

अगर घरों में महिला सुरक्षा की बात करें तो वर्तमान स्थिति काफी परेशान करने वाली है। घरेलू हिंसा अधिनयम 2005 को लागू हुए लगभग 10 साल हो चुके हैं फिर भी राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) की 2014 की रिपोर्ट के अनुसार घरेलू महिला से जुड़े आपराधिक मामले में जहां उत्तर प्रदेश में कुल 8781 मामले, वहीं गुजरात में कुल 7812 मामले दर्ज किये गए। जबकि पश्चिम बंगाल इन मामलों में प्रथम स्थान पर रहा। राज्य सरकारों की घरेलू हिंसा पर उदासीनता का पता इस बात से चलता है कि अभी कई ऐसे राज्य हैं, जहां घरेलु हिंसा अधिनयम 2005 के तहत न तो उचित संख्या में सुरक्षा अधिकारियों की नियुक्ति की गई है, न ही महिला आश्रय घरों की व्यवस्था। इस विषय पर राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण की रिपोर्ट -4 के अनुसार विवाहित महिलाओं के साथ घरेलू हिंसा की दर काफी ऊंची है, बिहार जैसे राज्यों में यह 59 फीसदी तक दर्ज की गई है।

विगत वर्षों में देश में संपन्न हुए चुनावों में राजनीतिक दलों द्वारा महिलाओं को वोट बैंक की तरह इस्तेमाल करने से परहेज नहीं किया गया है। दक्षिण भारत के राज्यों में चुनावी घोषण पत्रों में मिक्सी, साड़ी, मंगलसूत्र जैसी वस्तुओं को शामिल किया जाता रहा है। वहीं उत्तर प्रदेश में भी ऐसे उदाहरण देखे जा सकते हैं जिसमें प्रेशर कुकर, मुफ्त LPG गैस के वायदे शामिल हैं। हालांकि बिहार विधानसभा चुनाव में शराबबंदी और नियुक्तियों में महिलाओं का आरक्षण का मुद्दा प्रमुख रहा था, जो एक सकारात्मक कदम माना जा सकता है। शराबबंदी महिलाओं से जुड़ा एक महत्वपूर्ण विषय रहा है, क्योंकि राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे 2005-06 की रिपोर्ट के अनुसार पुरुषों के मद्यपान की स्थिति में घरेलु हिंसा की संभावना 17 फीसदी बढ़ जाती है, यही कारण है कि तमलिनाडु ने भी शराबबंदी को चरणबद्ध तरीके से लागू करने के संकेत दिए हैं।

चुनावों में मुद्दों का निर्धारण एक महत्वपूर्ण विषय होता है, जबकि राजनीतिक पार्टियां- राजनीतिक लाभ के लिए तत्कालीन मुद्दों को स्थान देती हैं। वहीं मौलिक मुद्दों पर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया जाता है, इसमें महिलाओं से जुड़े हुए विषय, स्वास्थ्य, शिक्षा, सुरक्षा एवं नियोजन जैसे मुद्दे शामिल हैं। जहां महिलाओं को चुनाव में सशक्त मतदाता के रूप में उभरना होगा, वहीं राजनीतिक पार्टियों को वोट बैंक की राजनीति से इतर महिला उत्थान जैसे मुद्दों को महत्व देना होगा।

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