Shades of the Sea

Posted by Harsh Khanabadosh
May 31, 2017

Self-Published

मुझे मुंबई आये हुवे अभी कुछ ही दिन हुए हैं I जैसा सुना था बिलकुल वैसी ही है ये जगह, हरपल भागती सी हुई I

इस तेज रफ़्तार दुनिया में, मैं शांति को ढूंढता यहाँ आ पहुंचा I इस जगह का नाम नहीं लूंगा पर हाँ इतना जरूर कहूंगा कि, जब भौर में आप यहाँ आते हैं, तब सागर के एक छोर से इस शहर जगता हुवा खूबसूरत नज़ारा, आपको देखने को मिलता है और देखते ही पल में आपको, इस शहर से प्यार होजाता है I

पर इस जगह कि खासियत सिर्फ इतनी सी ही नहीं है I यहाँ मुझे कुछ और भी मिला, जिसने मेरी जिंदगी में एक नया पन्ना जोड़ दिया I

Oh!! By the way, I’m Harsh and I’m from nowhere……..

Or maybe from everywhere……………..

Hmmmmm , तो में आपको बता रहा था आपको, मेरी जिंदगी की कहानी में जुड़े एक नए पन्ने के बारे में I

मैं हर रोज उस किनारे पर जाता और टहलता. घण्टो लम्बे गहरे सागर को देखता I

और जो सबसे ज्यादा पसंद था देखना वो थी ” लहरें “. मैं लहरों में जो देखता वो था उनका हर पत्थर को लांघकर किनारे से मिलना और उसे छूकर धीरे से सिमटते हुवे वापिस चले जाना. ये खूबसूरत मंजर उस गहरे प्यार की कहानी सा है ,

” जिसमे आशिकी, तमाम मुश्किलों के बाद भी आकर , अपने आशिक को चूमती है , उसका दीदार करती है, फिर लाज के अंचल में शर्माती हुई अपने इश्क़ का इज़हार कर लौट जाती है “

यूँ ही ये सिलसिला , खामोश पर रफ़्तार धड़कन कि तरह चलता रहता है और इश्क़ का जाम भरता रहता है.

क्या आपको मालूम है ? हर किनारे पर कुछ मोती भी मिलते है I जो अपनी ख़ास खूबसूरती से हमारी नजरों को खुद पर यूँ टिका लेते है कि हम कब इस सुफीयाने इश्क़ के साथी बन जाते है, हमें खुद भी नहीं पता चलता है I

और इस तरह ज़िन्दगी कि कहानी में एक नया पन्ना जुड़ जाता है.

उस सुबह एक मोती मुझे भी मिला I

मैं उससे मिला…………………………….. I

हाँ उससे……..

वैसे मैं उस सुबह की जगह उस रात कहना पसंद करूँगा , कियोंकि उसका चेहरा मैंने चाँद की ठंडी रौशनी में देखा था I एक शांत चेहरा. इतना शांत जिसकी कल्पना करना नामुमकिन था I

शायद इसलिए , क्योंकि जिंदगी के अभी तक के अनुभव में मैंने ऐसी शांति न तो कभी महसूस करि थी और न ही देखि थी I

सागर की ठंडी हवा , छुपते चाँद की चटकीली रोशनी, टिमटिमाते पर मुस्कुराते तारे , मोती और किनारे सभी कहीं छुप गए थे I

और मेरी नज़रों में जो था, वो था उसका वही शांत चेहरा I

मेरे मैं की उथल-पुथल इतनी तेज़ मनो मैं के सागर में कुछ नया हुवा है . पर किया ?

और चाहते-नचाहते मेरे कदम उसकी और और चल दिये I मैं जाकर उसके साथ बैठ गया I

पर………… अभी भी उत्सुकता के कांटे मुझे चुभ रहे थे, आखिर अगले पल मेने उससे पूछ ही लिया ?

आप इतने शांत कैसे हो सकते हो ? मेने आज-तक किसी को भी इतना गहरा शांत कभी नहीं देखा है I ये कैसे मुमकिन हो सकता है जो मैं इस वक़्त महसूस कर रहा हूँ ?

और पता है जवाब में मुझे किया मिला ?

वही गहरी शांत ख़ामोशी I

लगभग १० मिनट बाद मेरे कानो ने कुछ सुना I

“मुंबई में नए आये हो ?

मैं जवाब देने को उचका, पर…… रुक गया I क्योकि मेरी निगाहें, उसकी निगाहों में, अपने अक्स को देखने में डूब चुकी थी I

अक्स इतना साफ़ झलक रहा था कि, मानो वो इंसानी आँखे नहीं बल्कि तिलिस्मी आईना है जिसमे मेरा अक्स नहीं में ही खुद खड़ा हूँ I

मैं इस एहसास को थोड़ा और जी पाता कि, अगली कुछ आवाजों ने मेरे भीतर चल रही इस फ़िज़ा का रुख अपनी और मोड़ लिया ….

Hi, I’m Zihan from Andheri west…… you?

I replied like an automatic machine.

 और उसके साथ ही उस शांत चेहरे में, मेने जो नया देखा, वो थी एक बेहद खूबसूरत मुस्कराहट , जो इतनी अपनी लगी कि , कैसे बयां करूँ मालूम ही नहीं I

See the rising Mumbai, जिसको देखने तुम रोज आते हो (उसने मुझसे कहा )

मैं हक्का-बक्का होकर उसकी और देखता रह गया और जो सवाल मेरे मैं आया वो था कि , इसको कैसे मालूम कि में यहाँ देखने आता हूँ I मेने तो अभी तक इसको कुछ भी नहीं बताय है सिवाए मेरे नाम के…….

अगले ही पल उसके दाएं हाथ कि हथेली मेरे बाएं तरफ के गाल को कोमलता से छूती है, और हलकी फिसलन के दबाव के साथ मेरे चेरे को Rising Mumbai देखने के लिए घुमाती है I इस तरह उसके हाथ की कुछ तीन उँगलियाँ मेरे होंठो को छू जाती है I

पर मेरी निगाहों में…….अभी भी बस वही शांत चेहरा है और कुछ भी नहीं  I

जैसे ही उसने अपना हाथ मेरे गाल से हटाया I मुझमे एक अजीब से बेचैनी हुई . मेरा हाथ अचानक हरकत में आया और बिना मेरे दिमाग से सवाल-जवाब किये, बिना सही-गलत को आंके, उसकी हथेली को पकड़कर फिर से मेरे गाल पर जा बैठाया I

ये क्या एहसास था नहीं मालूम. मैं उसके हाथ में बाह रहे खून की रफ़्तार को महसूस कर पा रहा था. उसके हाथ कि नरमी और फूल कि कोमलता सी नरमी मुझे माँ के स्पर्श सी लगी I

हथेली का ये स्पर्श मुझे उसकी ली हुई हर साँस का रास्ता बता रहा था और उसकी निगाहें…. नशेऐ-इश्क़े-जाम को भरे जा रही थी जिसमे मैं अब तक डूब चूका था I

ये सब होते अभी चंद पल ही गुजरे थे कि, अचानक मेने उसके हाथ को दूर झटक दिया और हड़बड़ाते हुवे उससे कुछ दुरी बना ली I

एक शर्म का एहसास मुझमे आगया I मेरी निगाहें झुक गई I अब मेरे अंदर हजारों सवाल उठ खड़े हुवे जोकि मेरे ही खिलाफ थे I मैं अपनी ही नजरों में गुनेहगार बन् गया और मेरा मासूम मन …

मेरा मासूम मन … बस इतना कहकर शांत हो गया कि, मुझे मालूम है मुझसे एक बड़ी गलती हुई है, पर ये किया एहसास था मुझे भी नहीं पता…..

कुछ देर मुझे यूँ शर्म से झुका देख ज़िहान ने मुझसे कहा , किया हुवा हर्ष , खुद पर गुस्सा आरहा है और शर्म भी ? (मैं अभी-भी सर झुकाये जमीं को तक रह था )

उसने अपने दाएं हाथ कि हथेली, मेरे बाएं हाथ के ऊपर आहिस्ते से रखते हुवे हलके दबाव के साथ कहा I

सुनो! सब ठीक है… इस एहसास ने मुझे थोड़ी हिम्मत दी जिससे मेरी शर्म से झुकी निगाहें थोड़ा उठी और उसकी और देखने लगी और जुबान ने साथ देकर जो कहा वो था I

THANK YOU…….

मैं वहां से चला गया और फिर कभी उस किनारे पर नहीं गया I अगले जितने भी दिन मुंबई में रहा बस अशांत रहा I ढेरों सवालों के साथ लड़ता रहा (अकेले), और आज भी I सवाल इतने जहरीले थे कि मन में, विचारों में, खून की हर बूँद में और सांस कि हर तार में बस कड़वाहट ही बाकि रह गयी है और उसके हाथ का एहसास…………

Youth Ki Awaaz is an open platform where anybody can publish. This post does not necessarily represent the platform's views and opinions.