हमारा समाज क्यों नहीं अपनाता अपना ‘तीसरा सच’

पिछले दिनों मीडिया जगत में किन्नर गौरी सावंत और उनकी बेटी गायत्री चर्चा का विषय बनी थीं। एक प्रसिद्ध विज्ञापन कंपनी ने उनके असल जीवन की कहानी को अपने एक एड फिल्म के माध्यम से दिखाया, जिसमें छठी क्लास में पढ़नेवाली गायत्री बड़ी ही मासूमियत से अपनी जीवनदात्री मां के बारे में बताते हुए कहती है कि उसे अपनी जन्मदात्री मां के बारे में तो कुछ याद भी नहीं।

उस विज्ञापन का दृश्य जिसकी चर्चा की गई है।

उसकी मां तो वह है, जिसने उसे नया जीवन दिया, जिसके साथ आज वह अपने जीवन के हर पल को जी रही है, जो उसके बीमार होने पर रात-रात भर जाग कर बैचेनी में काट दिया करती है, जो उसे अच्छी परवरिश देने के लिए पूरी दुनिया से लड़ने को तैयार रहती है-वही है उसकी असली मां. अपने इन बातों के क्रम में गायत्री एक बेहद तीखा-सा सवाल भी उठाती है कि ‘सिविक बुक में उन्हें पढ़ाया जाता है कि देश में रहनेवाले सभी नागरिक समान है, फिर उसकी मां के साथ भेदभाव क्यों किया जाता है?’

सही मायनों में देखें, तो मासूम गायत्री का यह सवाल उस पूरे भारतीय समाज और यहां के कानून पर एक करारा तमाचा है, जो समानता और समान अधिकारों की बात करता है और जो खुद को शिक्षित, सभ्रांत और मानवाधिकारों का पैरवीकार समझता है।

अफसोस की बात है कि हमेशा से ही मानव समाज का एक अभिन्न अंग रहे किन्नर समुदाय को आम इंसान का दर्ज़ा और अधिकार पाने के लिए आज भी संघर्ष करना पड़ रहा है। लंबे इंतज़ार और संघर्ष के बाद 2014 में किन्नरों को ‘तृतीय पंथ’ या ‘ट्रांसजेंडर’ का दर्ज़ा दिया गया, जिसके अनुसार अब हर व्यक्ति को अपनी मर्ज़ी से अपनी लैंगिंक पहचान निर्धारित करने की पूरी स्वतंत्रता है। भले ही उसका जन्म किसी अन्य लिंग में हुआ हो। साथ ही, उन्हें संविधान की धारा- 14,15 और 21 में वर्णित वे सारे मौलिक अधिकार भी दिये गये, जो किसी अन्य भारतीय नागरिक को प्राप्त हैं।

इस निर्णय का एक सबसे बड़ा फायदा यह हुआ कि अब तक जो लोग शरीरिक तौर से पुरुष होने के बावजूद स्त्रीभाव रखते हैं, उन्हें स्वयं को ‘ट्रांसवुमेन’ घोषित करना आसान हो गया। इसी तरह स्त्री के रूप में जन्म लेने के बावजूद जो लोग पुरुषभाव रखते हैं, उनके लिए खुद को ‘ट्रांसमैन’ घोषित करने का रास्ता साफ हो गया। माननीय सर्वोच्च न्यायालय का यह निर्णय किन्नरों को एक सामाजिक पहचान देने की दिशा में मील का पत्थर साबित हुई। अब वक्त आ गया है कि उन्हें वे सारे अधिकार भी दिये जायें, जो कि एक आम स्त्री तथा पुरुष को प्राप्त हैं जैसे- विवाह का अधिकार, बच्चों को गोद लेने का अधिकार आदि।

किन्नर समुदाय शुरू से ही मानव समाज का एक अंग रहा है। रामायण और महाभारत में भी किन्नरों का उल्लेख मिलता है। किन्नरों को शिव का अर्द्धनारीश्वर रूप माना गया है, जिसमें एक स्त्री तथा पुरुष-दोनों के गुण विद्यमान होते हैं। फिर क्यों शिव को उनके अर्द्धनारीश्वर स्वरूप में भगवान मानकर पूजा जाता है, जबकि किन्नरों को एक आम इनसान का दर्ज़ा और अधिकार पाने के लिए इतना संघर्ष करना पड़ रहा है।

2014 में भारतीय कानून ने किन्नरों को ‘तृतीय पंथ’ या ‘ट्रांसजेंडर’ का दर्ज़ा ज़रूर दे दिया, लेकिन सच तो यह है कि हमारा यह समाज आज भी उन्हें एक आम इंसान के तौर पर ट्रीट करने के मामले में काफी पीछे चल रहा है। हमें यह समझने की ज़रूरत है कि वे मात्र शारीरिक रूप से हमसे भिन्न हैं-जिस तरह एक पुरुष एक स्त्री से और एक स्त्री एक पुरुष से भिन्न होती है, उसी तरह वे भी भिन्न हैं, न कि उनकी भावनाएं।

समाज की इस उपेक्षा का ही नतीजा है कि अल्पसंख्यकों की तरह किन्नर समुदाय भी आम समाज से हमेशा खुद को अलग-थलग मान कर जीता रहा है। अगर सच में हम देश का विकास चाहते हैं, इस समाज का विकास चाहते हैं और अपने आप का विकास चाहते हैं, तो हमे अपनी सोच को बदलना होगा। किसी इंसान को उसके धर्म, जाति, समुदाय या लिंग के तौर पर देखने-परखने से पहले उसे एक इंसान के तौर पर देखना होगा।

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