तो इस तरह उधम सिंह ने अंग्रेजों से जलियांवाला बाग हत्याकांड का लिया था बदला

13-अप्रैल-1919 अमृतसर, जलियांवाला बाग में जनरल रेजीनॉल्ड एडवर्ड हैरी डायर के हुक्म से, बिना किसी चेतावनी के हज़ारों की संख्या में मौजूद निहत्थे लोगों पर अंग्रेज़ सरकार के सैनिकों ने ताबड़तोड़ गोली चला दी थी। ये मंजर जिसने भी देखा होगा उसको अपनी और देश की गुलामी का एहसास तो हो ही गया था, लेकिन सैकड़ों की संख्या में बिखरी हुई लाशों ने अंग्रेज़ हुकूमत के खिलाफ बगावत के निशान भी छोड़ दिये थे। यही हत्याकांड बाद में भगत सिंह की बगावत का मुख्य कारण बनकर उभरा।

लेकिन यहीं एक और क्रांति जन्म ले रही थी जिसका नाम था सरदार उधम सिंह। उस समय कुछ 20 वर्ष का यह नौजवान भी जालियांवाला बाग में मौजूद था और किसी तरह अपनी जान बचाने में कामयाब रहा। इस घटना के बाद का उधम सिंह के जीवन का एक ही लक्ष्य था जलियांवाला बाग हत्याकांड का बदला।

जलियांवाला बाग के बाद पंजाब के तत्कालीन गवर्नर सर माइकल ओ-ड्वायर (Sir Michael O’Dwyer) ने सार्वजनिक रूप से इस हत्याकांड के दोषी जनरल डायर का बचाव किया। यही नहीं इस हत्याकांड को अपना समर्थन भी दिया। जलियांवाला बाग हत्याकांड के बाद बनी कमेटी में भी डायर को ने इस बात को स्वीकार किया कि उसने गोली चलाने से पहले किसी भी तरह की चेतवानी नहीं दी लेकिन उसे किसी भी तरह का पश्चाताप नहीं था। कुछ सालों बाद जनरल डायर की मृत्यु 1927 में हृदयरोग से हो गयी थी।

जनरल डायर की मौत का वर्णन इसलिये भी ज़रूरी हैं क्योंकि आमतौर पर ये धारणा बनी हुई है कि उधम सिंह ने जनरल डायर को मारा था, जो गलत है। 1940 में सरदार उधम सिंह ने वह कर दिखाया जिसके कारण उनका नाम सदा के लिये अमर हो गया।

उधम सिंह का जन्म 26 दिसंबर 1899 में सुनाम, पंजाब में हुआ था। इनकी मां का नाम नरेन कौर, पिता का नाम टहल सिंह और इनके बचपन का नाम शेर सिंह था। मां की मौत के बाद इनके पिता ने इन्हें और इनके भाई मुक्ता सिंह को अमृतसर के सेंटर खालसा अनाथालय पुतलीघर में भेज दिया। यहां इन्हें सिख धर्म की जानकारी दी गयी और इन्हें इनका नया नाम उधम सिंह भी यहीं दिया गया। 1918 में मैट्रिक की परीक्षा पास करने के बाद इन्होनें 1919 में इस अनाथालय को सदा के लिए अलविदा कह दिया।

जलियांवाला बाग हत्याकांड के दिन, उधम सिंह और इनके दोस्त लोगों को पानी पिलाने की सेवा कर रहे थे। इस हत्याकांड को अपनी आंखो से देखने के बाद सरदार उधम सिंह ने अंग्रेज़ सरकार से इस हत्याकांड का बदला लेने का प्रण कर लिया था।

जलियांवाला बाग हत्याकांड के कुछ दिन बाद ये किसी तरह अमेरिका चले गये, वहीं ये गदर पार्टी से जुड़े। इसी दौरान ये भगत सिंह और इनके संगठन से काफी प्रभावित हुये। भगत सिंह के कहने पर ही ये 1927 में ये अपने 25 साथियों के साथ वापस भारत आ गए। लेकिन यहां इन्हें अंग्रेज़ सरकार ने अवैध हथियार रखने और भारत में प्रतिबंधित संगठन गदर पार्टी के प्रचार पत्र “ग़दर-ऐ-गूंज” को रखने और बांटने के जुर्म में गिरफ्तार कर लिया और इन्हें कुछ (4-5) साल की सजा भी सुनाई गयी। जब 23-मार्च-1931 को भगत सिंह को फांसी दी गयी थी, तब ये जेल में ही थे।

1931, में जेल से रिहा होकर सरकार के जासूसों से बचकर ये पहले किसी तरह कश्मीर और बाद में जर्मनी पहुंचे, जहां उस वक्त नाज़ी विचारधारा पनप रही थी। साल 1934 में ये राम मोहम्मद सिंह आज़ाद के नाम से लंदन पहुंचे। लंदन, में खुद को स्थापित करने के लिये इन्होंने फेरीवाला, कारपेंटर, इत्यादि काम किए और कई सामाजिक संगठनों से भी जुड़े। यहां इन्होंने एक फिल्मी एक्टर के रूप में भी काम किया था, शायद बहुत कम लोग ये जानते हैं की उधम सिंह ने बतौर एक्टर इंग्लिश फिल्म एलीफैंट बॉय और द फोर फेदर्ज़ में भी काम किया था।

इरादे के पक्के उधम सिंह ने सर माइकल ओ-ड्वायर के साथ मित्रता का रिश्ता कायम कर लिया। लंदन में एक दिन, सर माइकल ओ-ड्वायर ने राम मोहम्मद सिंह आजाद उर्फ़ उधम सिंह को अपने घर चाय पर भी बुलाया था। अगर उधम सिंह चाहते तो इन्हें वहीं मार सकते थे, लेकिन उधम सिंह इसकी गूंज अंग्रेज़ सरकार के कानों तक पहुंचाना चाहते थे।

आखिर वह दिन आ ही गया, 13 मार्च 1940 लंदन के कैक्स्टन (Caxton) हॉल में एक कार्यक्रम के दौरान सर माइकल ओ-ड्वायर, अपना भाषण देने वाले थे। सुरक्षा के बेहद कड़े इंतजाम बीच उधम सिंह नीले रंग के अंग्रेजी कोट और टोपी के साथ यहां पहुंचे। सुरक्षा इंतज़ामों से बचते हुए एक बड़ी सी किताब के पेज को बंदूक के आकार में काटकर इसमें पिस्तौल छिपाकर ये हॉल में पहुंच गए। सर ओ-ड्वायर के भाषण और इस सभा के खत्म होने के पश्चात इन्होंने अपनी रिवाल्वर से दो गोलियां, सर माइकल ओ-ड्वायर के सीने में मारी, जिससे इनकी वहीं मौत हो गयी। इसके बाद उन्होंने खुद आत्मसमर्पण कर दिया। अगले दिन ये खबर अखबार के मुख्य पेज पर थी और अंग्रेज़ सरकार इससे हिल चुकी थी।

इन पर चले मुकदमें में इन्हें मौत की सज़ा सुनाई गई। 31-जुलाई-1940 को पेंटोविल (Pentoville) जेल में, भारत की आज़ादी का एक और सिपाही शहीद हो गया। उधम सिंह भारत की आज़ादी की लड़ाई में, अपना नाम सुनहरे अक्षरों में लिखवा चुके थे। यूरोप में दूसरा विश्व युद्ध शुरू हो चुका था अंग्रेज़ सरकार समझ चुकी थी कि अब भारत को और अधिक समय तक गुलाम बनाकर रखा नहीं जा सकता।

मुकदमे के दौरान उधम सिंह ने भरी अदालत में कहा था, “मैंने ये इसलिये किया क्योंकि सर माइकल ओ-ड्वायर के खिलाफ मेरे मन में असंतोष था। वह इसका हकदार था। वह असली गुनेहगार था, वह मेरे लोगों की भावना को कुचल देना चाहता था, इसलिये मैंने उसे कुचल दिया। 21 साल तक, मैं इस प्रतिशोध की तलाश में रहा हूं और आज मैं खुश हूं कि मैनें मेरा काम कर दिया। मुझे मौत का डर नहीं है। मैं, अपने देश के लिये कुर्बान होने जा रहा हूं। मैने भारत में मेरे लोगों पर अंग्रेज़ राज्य के अत्याचारों को देखा है। मैंने इसके खिलाफ विद्रोह किया है जो मेरा कर्तव्य था। ये मेरे लिये कितने गर्व की बात होगी कि मैं अपने देश के लिये मौत की सज़ा प्राप्त करूंगा।”

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