पाकिस्तान से एक आखिरी युद्ध का मतलब

Posted by Deepak Bhaskar in Hindi, Society
May 4, 2017

“इनफ इज़ इनफ; हमारे सैनिको की प्राणों की आहुति निरर्थक नहीं जाएगी, पाकिस्तान को सबक सिखाना ज़रुरी हो गया है। पाकिस्तान को उसी की भाषा में जवाब दिया जाना चाहिए। हम दो के बदले दस सिर काट लायेंगे। हम पाकिस्तान के कुकृत्यों की घोर निंदा करते हैं, बस बहुत हो गया, एक अन्तिम युद्ध हो ही जाना चाहिए…”

एक अंतिम युद्ध! हर युद्ध से पहले यही कहा गया था। मानव का इतिहास तो युद्ध का ही इतिहास है, जो समय हमें शांति का लगता है, वो असल में ‘युद्ध-विराम’ का है। धर्म (न्याय) की स्थापना के लिए भी युद्ध लड़े गए, तो क्या इंसाफ और बराबरी वाले समाज का निर्माण हो पाया? अगर हो गया तो फिर अगला युद्ध क्यूं हुआ?

बस बहुत हो गया! अब युद्ध ही एकमात्र रास्ता बचा है। तो क्या इस बार युद्ध एक दूसरे को फूल देकर लड़ें जायेंगे? जब बंदूक और टैंक मैदान में होंगे और हज़ारों/लाखों सैनिक मारे जाएंगे तब हम किसकी निंदा करेंगे, युद्ध की या पाकिस्तान की? हम जब इन घटनाओं की भर्त्सना करते हैं तो क्या युद्ध की करेंगे? युद्ध अगर शांति का मार्ग दिखलाता तो क्या किसी युद्ध के बाद कोई और युद्ध होता?

हम पाकिस्तान को उसकी भाषा में जवाब देंगे, तो क्या हम अब उनकी भाषा सीखेंगे? क्या वह भाषा इतनी अच्छी है, जिसे अब हमें सीख लेना चाहिए? क्या उस भाषा में शांति का प्रसार निहित है? कलिंग युद्ध के बाद जो भाषा हमने सीखी उसके क्या अब कोई मायने नहीं रहे? बुद्ध और जैन की भाषा क्या अब हमें सूट नहीं करती? गांधी ने जिस भाषा से अत्याचारी अंग्रेज़ों से भारत को मुक्त करा लिया, उससे हमारा कोई सरोकार नहीं? पाकिस्तान की हिंसा की भाषा के मद्देनजर, अब हमें अपने स्कूलों और विश्विद्यालयों में भी यही पढ़ाना शुरू कर देना चाहिए? सोचिये! हम अपने बच्चों को अंतिम-अंतिम तक शांति, धैर्य और संयम रखने की शिक्षा देते रहते हैं। क्या अब हम उन्हें दूसरों के सर काट लाने को कहेंगे?

पाकिस्तान को अब सबक सिखाना ही पड़ेगा, तो हम कौन सा सबक सिखाएंगे? क्या हम बुद्ध, जैन या गांधी वाला सबक सिखायेंगे या फिर हमने पाकिस्तान से ये सबक भी सीख लिया है। कभी हम विश्व-गुरु होते थे तो क्या हम अब शिष्य हो गए हैं? वो भी पकिस्तान के? क्या हमें अब अपने इतिहास पर गुमान नहीं रह गया है? क्या सैन्धव सभ्यता से हमारा कोई लेना देना नहीं रह गया है?

क्या सैनिक के प्राण सिर्फ युद्ध और फिर एक और नए युद्ध के लिए होते हैं? क्या सैनिक शांति के लिए अपने प्राण नहीं गंवाता है? अगर उनके शहीद होने के बाद भी शांति नहीं हो तो क्या सैनिक के प्राण व्यर्थ नहीं हो जायेंगे? एक सैनिक अपने प्राण की आहुति, अंतिम आहुति समझ कर देता है। उसे यह उम्मीद होती है कि उसके बाद किसी और की जान नहीं जाएगी। फिर एक नए युद्ध से उनका शहीद होना सार्थक कैसे हो जाएगा?

इनफ इज़ इनफ! शांति प्रक्रिया की शुरुआत होनी ही चाहिए। लेकिन हमें देश के और मुद्दों पर भी तो यही नारा देना चाहिए। सबक लेना हो तो ट्यूनीशिया से लेना चाहिए। उत्तरी अफ्रीका के देश ट्यूनीशिया में 2010 में हुए आंदोलनों में, ‘इनफ इज़ इनफ’ ही नारा था। वह नारा जिसने कई दशकों की बेरोज़गारी और असमानता के खिलाफ जनमानस को एक साथ खड़ा कर दिया था। महज सात दिनों में सत्तारूढ़ बेन अली को देश छोड़ना पड़ा था। क्या हमारे देश में सब कुछ ठीक है? क्या बेरोज़गारी ख़त्म हो गयी है? क्या हम सामाजिक एवं आर्थिक विषमता से निजात पा चुके हैं?

हमारे हुक्मरान इन बातों पर हमें ध्यान देने से भी रोकते हैं, हम कब इन चीजों के खिलाफ ‘इनफ इज़ इनफ’ कहेंगे? कब हम अपने सैनिकों के बलिदानों को सार्थक कर पाएंगे? सैनिक इसलिए भी जान देते हैं कि देश के अंदर विकास का रथ रुके नहीं, लोगों के लिए रोज़गार पैदा हों, देशवासी अपने लिए एक बेहतर ज़िंदगी तलाश सकें। ट्यूनीशिया ने वह कर दिखाया, उन्होंने मुहम्मद बौआजीजी के बलिदान को व्यर्थ नहीं जाने दिया। हमारे हुक्मरान सैनिकों के बलिदान व्यर्थ कर देते हैं जब वो एक नए युद्ध की कल्पना कर डालते हैं। हर रोज़ अपनी बन्दूक साफ़ करने वाला सैनिक भी दुआ करता होगा कि आज इसे चलाना न पड़े। क्यूंकि बन्दूक किसी की जान ही लेगी ज़िंदगी तो दे नहीं सकती। वह इस बात को भलीभांति जानता है कि युद्ध शांति का मार्ग नहीं बल्कि हर युद्ध में अगले युद्ध का बीज होता है।

किसी से युद्ध कर लेने से सैनिकों का बलिदान सार्थक नहीं हो सकता, बल्कि सार्थकता तो शांति-प्रस्ताव में है। देश में बढ़ती बेरोज़गारी, असमानता के खिलाफ ‘इनफ इज़ इनफ’ का नारा बुलंद करने में है। हम वो मुल्क हैं जहां अंगुलिमाल के बुद्ध-भिक्षु बनने की उम्मीद की जाती है और ऐसे देश में शांति प्रक्रिया की उम्मीद ख़त्म होना हमारे अस्तित्व पर भी सवाल खड़े करता है।

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