आजादी के नाम पर कैसा समाज दे रहे हैं हम मर्द

Posted by Abhishek Kumar Chanchal
June 21, 2017

Self-Published

सच में शब्दों की अपनी गंभीरता होती है, माँ शब्द कहते ही एक उल्लास का बोध होता है, वहीं मौत के नाम पर मातम छा जाता है। लेकिन गौर करने वाली बात यह है कि इन शब्दों के साथ एक मनमाना अधिकार बोध हो जाना समाज को पीछे की तरफ धकेल रहा है। अब प्रेम को ही ले लीजिए प्रेम अपने आप मे एक सम्पूर्ण कहानी है कविता है और जीवन है। लेकिन इस प्रेम की ओट में ना जाने कितनी लड़कियां हर रोज घुट-घुट के मर रही है, ना जाने कितनी मां, कितनी बहन शादी के बाद भी अपने प्रेंम को ढूढ़ने में लगी है। स्त्रियों के साथ एक बार संबधं रखने वाली पुरुषवादी समाज उसे अपनी संपत्ति समझ या यों कहें मशीन समझ कर ना जाने कितनी बार अपने मर्द होने पर गर्व करते हैं। और समाज मे अपने आप को आर्दशवादी घोषित करने वाले लोग भी उनके पीछे-पीछे चल देते है। सवाल यह है कि आखिर क्या वजह है कि एक मर्द एक माँ एक बहन या एक लड़की का दर्द नही समझ पाता है?

समाज में इस तरह की मानसिक बिमारी वर्षो से चली आ रही है, शायद इसलिए कि बचपन मे इन सब मुद्दों के ऊपर बात ही नही की जाती है। वर्तमान में जिस तरह लड़कियां आगे बढ़ना चाहती है उन पर जहां एक तरफ लड़को की तरफ से परेशानियों का सामना करना पड़ता है, वहीं अपनी वजूद को बचाने के लिए अपने परिवार से लड़ना पड़ता है, कुछ लड़कियां कदम बढ़ाती तो है लेकिन बड़े ही उलझन में अपने जीवन को बिताती है। इस समाज में महिलाओं की सुरक्षा के नाम पर उनके जीवन,उनके जीने के हिसाब से बड़ा ही असुरक्षित है। क्योंकि इनको कमजोर करने का बस एक आसान तरीका है कि इनके चरित्र पर सवाल खड़ा कर देना।यह मर्दो का आखरी रामवाण होता है। इसकी वजह से ना जाने कितनी महिलाएं आज अपना वजूद तलाशने में लगी हुई है।

हम भी महिला सशक्तीकरण के नाम पर या यों कहें कि उनकी सुरक्षा के नाम पर उन्हें कम उम्र में लड़कों से परहेज करना, ओढ़नी, पायल, रोटी बनाना सीखादेते हैं और तय कर देते हैं उनके भविष्य को, लेकिन वही दूसरी और लड़कों या मर्दो को छोड़ दिया जाता है कि मर्द तो मर्द है वो लड़के है कुछ भी कर के कमा खा लेंगे उनका जीवन तो चल ही जायेगा। उन्हें लड़कियों के साथ कैसे बिहेव करें बताने की कोई जरुरत नहीं महसूस करते।

नेशनल हेल्थ फैमिली सर्वे के हिसाब से भारत में 37 परसेंट औरतें अपनी शादीशुदा ज़िन्दगी में सेक्शुअल, मानसिक और शारीरिक हिंसा सहती हैं। गांव तो छोडिये सिर्फ दिल्ली शहर में दी ल्लनटॉप के रिर्पोट के अनुसार 500 महिलाओं पर किये गए स्टडी से पता चलाता है कि ये 29 फिसदी औरतें पढ़ी-लिखी नहीं थीं और लगभग 71 परसेंट औरतें स्नातक या इससे ज्यादा की पढ़ाई कर चुंकी है। पूरे शहर में करीब 37 फीसदी औरतें किसी न किसी रुप मे घरेलू हिंसा की शिकार है, जिसमे से 12 फीसदी महिलाएं ही इसके विरोध में आवाज उठाती है, और सबसे खतरनाक यह है कि 88 फीसदी महिलाएं ये मान चुंकी है कि यही उनका भविष्य या तकदीर हैं।

 

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