ईद पर मेरे दोस्त ने पूछा, “क्या हिन्दू मुसलमानों पर भरोसा कर सकते हैं?”

Posted by Vineet Kumar in Hindi, Society
June 27, 2017

बारह बजने को थे और पढ़ाई से उचट चुके मन को नींद बुला ही रही थी कि एक मित्र का फोन आ गया। हाल-चाल का लेनदेन अभी खत्म ही हुआ था कि सामाजिक मुद्दों पर मंथन शुरू हो गया। घटती नौकरियों, किसानों की समस्याओं, दलितों की स्थिति, जीडीपी और कतर के ब्लॉकेड से लेकर मोदी जी की पुर्तगाल ट्रिप तक की बहस हुई और हम दोनों ने अपनी-अपनी चिंता भी जताई। दरअसल, जो लोग कुछ नहीं करते हैं, वो मंथन बहुत अच्छा कर लेते हैं।

तभी एकाएक उसने पूछ लिया, “यार मुसलमानों का तुम्हें क्या लगता है? क्या कहीं भी हिन्दू मुसलमानों पर भरोसा कर सकते हैं?” मैं कुछ ठहर सा गया, मानो खुद से ही ये सवाल कर कर रहा था। सेकुलरिज़्म से भरा भीतर का ज्वालामुखी फट पड़ा और मैं उसे हिन्दुओं और मुसलमानों के मधुर संबंधों पर व्याख्यान देने लगा। संतुष्टि तो ना उसे थी और ना मैं खुद संतुष्ट था पर सेकुलरिज़्म का पाठ तो देना ही था। खैर थोड़ी देर में नींद आने लगी और फिर गुड नाईट हो गई।

सुबह उठकर जैसे ही अखबार खोला तो अखबार ने ईद की बधाइयां दे रखी थी। मोबाइल में व्हाट्सआप खोला तो कुछ लोगों की ईद की बधाइयां मेरे ऑनलाइन आने का इंतज़ार कर रही थी। बीते सालों के अनुपात में ईद की बधाइयां कुछ कम ही हो गयी हैं। वैसे भी एक गैर मुस्लिम के लिए ईद की बधाइयां वैसी ही होती हैं, जैसे फादर्स डे, मदर्स डे और बाकी और कई तरह के ‘डे’ की। बधाई देना हमारी सदाचारिता का सूचक होता है, जो जितनी बधाइयां देना जानता है और देता है हम उसे उतना ही ‘सोशल’ मानते हैं। मैं भी समाज में सोशल बने रहने के दबाव में बधाइयां बांट ही देता हूं। आखिर जाता क्या है? एक मैसेज ही तो टाइप करना है और सब जगह पेस्ट कर देना है, बाकी व्हाट्सअप तो फ्री है ही।

खैर “थैंक्यू एंड सेम टू यू” लिख ही रहा था कि रात की बात याद आई कि क्या वाकई हिन्दू मुसलमान पर भरोसा कर सकता है? क्या इन “ईद मुबारक” के मैसेज लिखने वाले मेरे हिन्दू दोस्तों के अंदर इतनी शक्ति बची है कि वो इस देश में नष्ट होती हमारी अनेकता में एकता वाली संस्कृति को बचा पाएं? या फिर ये सब एक ढोंग है।

कुछ श्रेय तो आज के राजनीतिक माहौल को भी देना बनता है। खुलेआम किसी मुसलमान के प्रति उल्टी-सीधी बातें करना आम हो गया है और बात ही क्या अब तो हाथ उठाने का प्रचलन भी बढ़ गया है। एक भीड़ जो पचासों आंख कान लेकर भी अंधी और बहरी है, वो न्याय करने को आतुर है और उसका न्याय कठोर और निर्णायक होगा। जब किसी देश में ऐसी प्रवृत्ति हावी हो जाए तो क्या कोई ईद मुबारक हो सकती है?

लेकिन फिर भी हम ईद मनाएंगे, जिनके मुसलमान दोस्त हैं वह सिवईयां चाट के मनाएंगे और जिनके नहीं हैं वो व्हाट्सप्प और फेसबुक पर छुट्टी का आनंद लेते हुए मनाएंगे। क्यूंकि हमने बैसाखी भी मनाई थी, हमने क्रिसमस भी मनाया था तो हम ईद भी मनाएंगे। हम उम्मीद करेंगे कि ईद के चांद की रौशनी से ये अंधेरा छटेगा और सुबह की किरण नई उम्मीदों के साथ हमारे घरों को रौशन करेगी।

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