“ख्वाहिशो का सैलाब है  किनारे की तालाश है “

Posted by Alisha Haider Naqvi
June 16, 2017

Self-Published

“ख्वाहिशो का सैलाब है

किनारे की तालाश है ”

 

माना के मंजील नहीं आसान,मगर खुला है ख्वहिशो का आसमान

क्यों ना बुंन लू मैं भी अपने सपने , जब साथ देने को तैयार हैं अपने

ज़िन्दगी बहूत छोटी सी है जनाब ,उठो और पुरे करो अपने सपने

हार जो मान ली रूठ ज़ायेगे सपने ,कोशिश तो करो हैं इंतेजार मे खज़ाने

 

“ख्वाहिशो का सैलाब है

किनारे की तालाश है ”

 

माना के हम हार गये , करते है अपनी गलती कूबूल

मगर सपनो को  टूटने नहीं दिया ,होती हैं सबसे भूल

फिर करेगे कोशिश और खिलाएगे जीत के फुल

हारना नहीं कभी किसमत से , यही हैं ज़िन्दगी के उसूल

 

“ख्वाहिशो का सैलाब है

किनारे की तालाश है ”

 

लाख हसे ज़ामाना मुझपे , कौन सा मुझे उन्हे दिखाना है

ये लड़ाई है मेरे सपनो की ,अब तो बस ल्क्षय को पाना हैं

दुनिया पागल समझे तो क्या ,मुझे तो मंजिल के उसपार जाना हैं

मुझे मेरे सपनो का खूब पता हैं ,वो किस चीज़ का दीवाना हैं

 

“ख्वाहिशो का सैलाब है

किनारे की तालाश है ”

 

अब फिर से उठ खड़ी हूँ , हिम्मत ने दोबारा साथ दिया है

लगन जूटाई हैं फिर से मैंने ,भूल गई जो कल बीत गया हैं

भले हो हार कितनी भी बार ,टूटना नहीं यही ज़िन्दगी की काया हैं

अरे देखो ये सामने कौन खडा हैं ,ये तो जीत का सवेरा मिलने आया हैं

 

 

“ख्वाहिशो का सैलाब है

किनारे की तालाश है ”

 

 

 

-अलीशा हैंदर नकवी

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