तस्वीर 1

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हर तस्वीर की अपनी एक पहचान और भाषा होती है, इसी के जरिये ये मानवी जज्बात और मानसिकता से सवांद करने में कामयाब रहती है, ये तस्वीर का ही असर है जो कभी हमैं गुदगुदा कर हसाती है, कभी सोचने के लिये मजबूर करती है, कभी क्रोधित भी करती है और कभी हमारी जिंदगी पर बहुत गहरा अपना प्रभाव छोड़ती है, ये प्रभाव इतना गहरा हो सकता है कई मानवी जिंदगियों पर अपना अनुकूल या इसके विपरीत प्रभाव दर्ज कर दे. तस्वीर की इसी मानसिकता के कारण अक्सर अखबार की खबर के शीर्षक के साथ एक तस्वीर छापी जाती है जो अक्षरों से ज्यादा अपने पाठक का ध्यान खबर की तरफ खिंचती है, सही मायनों में ये तस्वीर ही है जो खबर की रुचि के साथ-साथ पाठक की इसमे जिज्ञासा भी बढ़ाती है. आज बदल रहे डिजिटल युग में जब इन्टरनेट हर हाथ में मोबाइल फोन के रूप में मौजूद है और समय की इसी इस करवट को समझते हुये ज्यादातर अखबार आज डिजिटल माध्यम में अपनी मौजूदगी दर्ज करवा चुके है, लेकिन आज भी इस नये दोर में तस्वीर ओर खबर का नाता भी बरकरार है.

ये तस्वीर की ही मानसिकता थी की सीरिया में चल रहे जिस गृह युद्ध की किसी ने सार भी नहीं ली थी वह अचानक सुर्खियों में आ गया था, एक सुबह एक अखबार / ट्विटर में छपी तीन साल के मृत ऐलान कुर्दी की तस्वीर, जँहा इनकी बेजान शरीर को एक सुरक्षा कर्मी, तुर्की के एक रेतीले समुद्री तट से उठाकर लेकर जा रहा है, यहाँ इसी नन्ही सी जान के पैरों में पहने हुये बूट, शरीर के कपड़े, इस तस्वीर के माध्यम से हर पाठक को मृत ऐलान में अपना बच्चा दिखाई दे रहा था, ये तस्वीर थी जिसने पूरे विश्व को ये जानने के लिये मजबूर कर दिया था की ऐलान की मौत कैसे हुई ? और ये पुष्टि की गयी की सीरिया के गृह युद्ध से परेशान ऐलान और उनका परिवार और भी बहुत से सीरिया के रिफ्यूजी परिवार समुद्री मार्ग से तुर्की के माध्यम से ग्रीस जाना चाहते थे लेकिन समुद्री रास्ते में ही नोका डूब गयी, जहाँ ऐलान के परिवार में सिर्फ ऐलान के पिता की जान बच पाई वही इनका पूरा परिवार समुद्र में डूब गया और ऐलान का मृत शरीर तैरता हुआ समुद्री तट पर आ पहुचा. ये इस तस्वीर में ब्यान इंसानी दर्द का ही असर था इसके तुरंत पश्चात  यूरोपीयन देशो में सीरिया के रिफ्यूजी को अपनाने का दौर शुरू हो गया वही इसी पहल में अमेरिका और कनाडा जैसे देश भी शामिल हुये, और राहत कोश में दिया जाने वाला दान दिनों में ही 55 गुना तक बढ़ गया था. (http://www.npr.org/sections/goatsandsoda/2017/01/13/509650251/study-what-was-the-impact-of-the-iconic-photo-of-the-syrian-boy)

व्यक्तिगत रूप से मुझे इस तस्वीर के बारे में उस दिन एक रेडियो प्रोग्राम के दोरान पता चला जब रेडियो जॉकी इस पर अफ़सोस जता रही थी और ये प्रश्न कर रही थी की ऐसा ऐलान के साथ क्यों हुआ ? मैने सुनते ही गूगल से ऐलान की तस्वीर को सर्च किया और जब ये तस्वीर कंप्यूटर की स्क्रीन पर प्रकट हुई तब मेरे भी इंसानी जज्बात घायल हो गये थे. लेकिन अब ये सोचता हूँ की इस तस्वीर में ऐसा क्या था की पूरी दुनिया, जो की अलग-अलग समुदाय, धर्म, रंग, इत्यादि में बटी हुई है, इसके फासले मिटा कर इस तस्वीर ने इंसानी जज्बात के माध्यम से धरती पर बिछाई गई देशो की लकीरों के फासले मिटा दिये थे, ऐसा क्यों और कैसे ? इसका अध्धयन करना शुरू कर दिया.

ऐलान की इसी तस्वीर के माध्यम से, डिसिशन रिसर्च संस्था, जो की एक नॉनप्रॉफिट संस्था है जो मानव निर्णय, निर्णय लेना और जोखिम बोध पर अध्धयन करती है, इस संस्था के प्रमुख और यूनिवर्सिटी ऑफ ऑरेगोन के साइकोलॉजी के प्रोफेसर पॉल सोल्विक का अध्धयन काफी सटीक साबित होता है, इन्होंने इस तस्वीर के बाद गूगल सर्च का निरीक्षण किया जहाँ ऐलान, सीरिया, रिफ्यूजी जैसे सर्च किये गये शब्दो से ये जानकारी निकाल पाये की ऐलान के मोत के पहले इन शब्दों के माध्यम से काफी कम गूगल पर सर्च की गयी थी वही ऐलान की मौत के बाद करीबन एक महिने तक ये आंकड़ा अचानक से बढ़ गया था, वही लोग इस बात की भी जानकारी सर्च कर रहे थे की किस माध्यम से वह सीरिया के रिफ्यूजी कैंप में रकम दान दे सकते है. इस तस्वीर ने इंसानी जज्बात को झँकझोड़ दिया था लेकिन कैसे ? इस पर प्रोफेसर पॉल सोल्विक के मुताबिक इसके कई कारण हो सकते है मसलन ऐलान अभी सिर्फ तीन साल का मासूम था, बहुत बढ़िया तरीके से उसे जिस तरह कपड़े, बूट, पहनाये गये और तैयार किया गया, इस तरह हर इंसान को ऐलान में अपना एक करीबी दिखाई देता था, और इसका दूसरा पहलु था की ऐलान अपने परिवार के साथ एक नई जिंदगी की तलाश के सफर पर था, और समुद्री तट के बेहद करीब इनकी नोका डूब गई जहाँ ऐलान के पिता के सिवा इनका पूरा पतिवार समुद्र में डूब गया था, जिंदगी के करीब मिली ये मोत भी एक वजह थी की लोग इस तस्वीर से जुड़ रहे थे. वही, प्रोफेसर पॉल सोल्विक के मुताबिक इसका सबसे बड़ा सटीक कारण यह था की अमूमन ऐलान की हर तस्वीर को फोटो ग्राफर ने इस तरह खिंचा था जँहा ऐलान का चेहरा कही भी साफ़-साफ़ नहीं दिखाई दे रहा जिससे इस तस्वीर को देखने वाला हर इंसान को ऐलान में कोई अपना करीबी दिखाई देता है और इसी वजह से एक दर्शक ऐलान से अपनी दुरी नही बना सकता था और वह जज्बाती रूप से ऐलान से जुड़ जाता है.

यु तो आये दिन हमारे इर्द गिर्द तस्वीरों का एक मेला सा लगा रहता है किसी का प्रभाव कुछ पल के लिये होता है तो किसी का ना के बराबर, लेकिन ऐलान की तस्वीर का इतना ज्यादा गेहरा प्रभाव इसलिये भी हुआ था की यहाँ ऐलान की मृत देह सीरिया के गृह युद्ध साथ-साथ उस घटना को भी बयान कर रही थी जो मानव निर्मित थी और इसमे हर कोई अपने आप को कसूरवार समझ रहा था.

इसी सिलसिले में आज एक और तस्वीर बार-बार हमारी खबरों में अक्सर प्रकाशित होती है खासकर जब कभी भी अंतर्राष्ट्रीय मंच पर भारत के प्रधान मंत्री श्री नरेंद्र भाई मोदी और पाकिस्तान के प्रधान मंत्री श्री नवाज शरीफ की मुलाकात के कयास लगाये जाते है, इस तस्वीर में मोदी जी को इस तरह दिखाया गया है कि यह नवाज शरीफ को फटकार लगा रहे हो और शरीफ की झुकी हुई नजरे उन्हे इस फटकार के लिये दोष कबूल करवाती हुई दिखा रही है. मसलन इस तस्वीर के माध्यम से ऐसे हालात बताये जा रहे है जँहा कुछ भी संभव है.

आज भारत और पाकिस्तान के रिश्ते किस दोर से गुजर रहे है वह हमें कहने की जरूरत नहीं लेकिन कही भी अगर युद्ध की पहल हुई तो क्या हम किसी ऐलान को देख पायेगे ? फिर वह चाहे लकीर के इस तरफ बेजान पड़ा हो या उस तरफ. हमैं आज सोचने की जरूरत है कि कही इस तरह तकरीबन रोज प्रकाशित हो रही तस्वीरे कही हमारे जज्बात के माध्यम से हमारे वोट पर अपना अधिकार तो नहीं साबित कर रही, ये एक राजनीतिक प्रयास तो नही मानवी जज्बात को भड़काने की और बदले में हमैं पाकिस्तान के साथ एक ऐसी नफरत दे रही है जिसका कही भी कोई अंत नहीं दिखाई दे रहा. हमैं आज सोचने की जरूरत है कि नफरत का अंत सिर्फ और सिर्फ तबाही ही है जहाँ नागरिक खुद अपने देश में एक रिफ्यूजी बन जाता है. दूसरे विश्व युद्ध में जर्मनी का क्या हसर हुआ था, ये हम सब जानते है. आज हमैं हर प्रकार की सामाजिक, धार्मिक, हर तरफ से परोसी जा रही नफरत को नकारने की जरूरत है क्योंकि ना जाने कितने ऐलान भारत में और पाकिस्तान में अपने सुनहरे भविष्य को , अपनी छोटी छोटी नजरो से देख रहे है, और हमारा ये कर्तव्य है कि हम आने वाली पीढ़ी को एक सुनहरा भविष्य देकर जाये. ना की कभी ना अंत होने वाला नफरत का अंधकार.

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