दिल्ली: केंद्र या सरहद ?

Posted by Sushant Pankaj
June 23, 2017

Self-Published

देश अपना 14वां राष्ट्रपति चुनने वाला है।तमाम राजनीतिक पार्टियों ने बिगुल फूंक दिया है।इस बार का राष्ट्रपति चुनाव ख़ास इसलिए भी है क्योंकि ये उन लोगों के लिए एक सबक जैसा है जिनके लिए देश का मतलब सिर्फ दिल्ली की चौहद्दी में बसे बड़े-बड़े इमारतें, राजनीतिक संस्थाएं ,फर्राटेदार अंग्रेजी बोलते so called sophisticated लोग एवं सरपट दौड़ती चौड़ी चमचमाती सड़क भर से है (हालाँकि दुधिया रोशनी में नहाये इन सड़कों पर भी कोई निर्भया सुरछित नहीं है)।
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हमारी मीडिया, The great lutyens, सेल्फी, गोदी या काले स्क्रीन वाले, in short सभी प्रजाति वाले दिल्ली-नॉएडा बेस्ड मीडिया ने भी इन खाइयों को पाटने का काम कभी किया नहीं, किया भी होगा तो शायद उनकी रोजी इससे चल नहीं पायी होगी। नतीजन इसी बेबसी में सूट-टाई पहने, किसी AC न्यूज़ रूम में बैठा एंकर बार-बार हमें यह एहसास दिलाने की कोशिश करता है कि देश की राजनीति ही नहीं, बल्कि देश भी दिल्ली की सीमा समाप्त होने के साथ नई करवट लेता है, आप अपनी सीट बेल्ट बाँधे रखें!
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अब जिनकी देश की समझ संसद मार्ग,जनपथ से कनॉट प्लेस, 7RCR तथा अकबर व अशोका रोड तक सीमित हो उनसे ये उम्मीद तो कतई नहीं की जानी चाहिए कि मीरा कुमार, राम नाथ कोविन्द जैसे राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार या फिर दीन दयाल उपाध्याय,जगजीवन राम या पुट्टू श्रीरामलु, के.कामराज जैसे अनेकों शख्सियत के बारे में जानकारी वो बिना गूगल बाबा की सहायता से पा सके( चूँकि राम मनोहर लोहिया और जय प्रकाश नारायण के नाम पर RML और JP International Airport जैसे संस्थाएं हैं तो इसकी संभावना रहती है लोग जानते हो इन्हें, इसलिए मैंने इनका नाम नहीं लिया, समाजवादी मुझसे नाराज हो सकते हैं )। ऐसे में उनसे ये उम्मीद करना बेईमानी ही होगी। अब अगर ऐसे में बड़े-बुजुर्गों द्वारा कही गयी ये पुरानी बात दुहराई जाए कि ‛ सत्ता का रास्ता उत्तरप्रदेश और बिहार से होकर जाता है’ तो तकनीकी रूप से सही ही होगा। सवाल अभी भी वही है , अगर इन रास्तों पर चल कर ‛कथित तौर पर’ कोई गुमनाम शख्स दिल्ली तक पहुँचता है तो क्या उसका स्वागत उसी तरह से किया जाएगा जिसका वो हक़दार है ? या इतिहास के पन्नो में सिमटे अनगिनत लोगों के साथ उपेक्षा की खाई में वह भी कहीं गुम हो जाएगा?

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