दोहरा चरित्र क्यों अपनाते हैं तथाकथित लोग ???

Posted by Satendra Baghel
June 29, 2017

Self-Published

उन मां-बाप के दुर्भाग्य की सिर्फ कल्पना ही की जा सकती है, जिन्हें मीठी ईद से पहले अपने जिगर के टुकड़े को अंतिम विदाई देनी पड़ी। वह भी तब, जबकि उनके बेटे को मामूली झगड़े में कुछ लोगों ने पीट-पीटकर मार डाला हो। पलवल-मथुरा शटल में सफर कर रहे जुनैद के साथ जो हुआ, वह बर्बरता की हद है। ऐसी घटना और दोषियों की सभी पूर्वग्रहों, धर्म-पंथ के मतभेदों और राजनीतिक हितों से ऊपर उठकर निंदा की जानी चाहिए। लेकिन, इस मामले से भी शायद कुछ लोग सबक नहीं ले रहे और राजनीतिक तूल देने में जुटे हैं। ट्रेन में सीट को लेकर हुए झगड़े को पहले तो बीफ से जुड़ा मामला करार दे दिया गया, जिसे तमाम बड़े मीडिया घरानों ने धड़ल्ले से चलाया। फिर देश में शांति-सौहार्द्र और गंगा-जमुनी तहजीब के कथित झंडाबरदार हमलावरों की मानसिकता को देश के हिंदू समाज की मानसिकता में बदलाव का परिचायक बताने लगे। क्या ऐसा करना सही है?

सवाल खड़े करता है अवॉर्ड वापसी गैंग का सक्रिय होना?यदि किसी धर्म को मानने वाले कुछ युवक ट्रेन में किसी घटना को अंजाम देते हैं तो क्या यह उनके पूरे समाज की मानसिकता को दर्शाता है? एक बड़े विदेशी मीडिया हाउस के स्वनामधन्य पत्रकार ने तो इसे हिंदू समाज के सैन्यीकरण की शुरुआत करार दिया है। तो क्या बीते कुछ सालों में एक वर्ग विशेष के युवाओं के इस्लामिक स्टेट से जुड़ने को पूरी कौम का आतंकी होना कहा जा सकता है? क्या रामपुर में एक समुदाय के कुछ युवकों द्वारा दलित युवतियों से बदसलूकी और उसका विडियो बनाने पर उनके पूरे समाज को शोहदा करार दिया जा सकता है? बिल्कुल नहीं। समाज और देश का संचालन सौहार्द्रपूर्ण सोच से होता है और इसे ही मुख्यधारा में जगह दी जानी चाहिए। जैसे किसी कुकर्मी पिता या भाई के रेपिस्ट होने से पूरे समाज को कटघरे में नहीं खड़ा कर सकते, वैसे ही किसी उपद्रवी की हरकत को पूरे समाज का सैन्यीकरण नहीं कहा जा सकता।

सीट के झगड़े को बीफ का विवाद करार देना और फिर अवॉर्ड वापसी गैंग का सक्रिय होना तमाम सवाल खड़े करता है। क्या यह एक युवक की दर्दनाक हत्या पर रोटियां सेंकने का प्रयास नहीं है? ऐसा हो सकता है कि इस तरह की प्रॉपेगैंडेबाजी से मुस्लिम समाज का एक तबका उनके साथ आ जाए, जो लोग इसे हिंदुओं की मानसिकता में बदलाव करार दे रहे हैं। लेकिन, इससे अविश्वास की खाई और बढ़ेगी, घटेगी नहीं।

मेरा पैतृक घर रायबरेली में है। गाजियाबाद से अक्सर ट्रेन में आते-जाते वक्त मुरादाबाद और बरेली में अचानक अधिक सवारियों के आने पर सीट को लेकर कई बार कहा-सुनी होने लगती है। ये दोनों शहर मिली-जुली आबादी के हैं और सीट को लेकर झगड़ने वालों में सभी तबकों के लोग होते हैं। साफ है कि यह सिर्फ सीट पाकर आरामयदायक सफर के लालच में होता है। कई बार दूसरे को हड़काने वाला मुस्लिम होता है तो कभी हिंदू और कभी एक ही समुदाय के लोग सीट को लेकर उलझे दिखते हैं। तो क्या ट्रेन में सीट के इस विवाद को हम मुस्लिमों के ‘आतंकी’ होने और हिंदुओं के ‘सैन्यीकरण’ से जोड़ सकते हैं?

सीट के झगड़े को बीफ से जोड़ने वाले माफी मांगेंगे?
दुखद है कि खुद को पत्रकार और बुद्धिजीवी कहलाने वाले कुछ बौद्धिक विलासी लोग इस जुगत में लगे हैं। इससे उनके एसी दफ्तरों के वातानुकूलन पर तो कोई फर्क नहीं पड़ेगा, लेकिन सीट के झगड़े को बीफ का विवाद बताने से हजारों साल से बसीं बस्तियों में जरूर आग लग सकती है। मैं जुनैद के पिता की भावना को नमन करता हूं, जिन्होंने दुख की घड़ी में भी आगे बढ़कर कहा कि मेरे बेटे का कत्ल बीफ के चलते नहीं, बल्कि सीट के विवाद में हुआ। क्या सीट के झगड़े को बीफ से जोड़ने वाले लोग समाज से माफी मांगेंगे?

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