नक्सलवाद : समस्या और समाधान

Posted by Sneh Sagar
June 29, 2017

Self-Published

नक्सलबाद ऐसी समस्या है जिससे निबटने में सरकार पूरी तरह से असफल रही है और सुकमा में बार बार हो रहे नरसंहार इस बात की पुस्टि करते है। साथ ही भारतीय जनमानस को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है की इस समस्या से कैसे निबटा जाय। वास्तव में नक्सलबाद से निबटने हेतु सरकार ने ऑपरेशन ग्रीन हंट जैसे सख्त कार्यक्रम तक चलाया और सेना व् केंद्रीय पुलिस बल का भी उपयोग किया किन्तु स्थिति सम्भलने के बजाय और बाद से बदतर होते चले गई। फिर हल ही में वर्त्तमान सर्कार द्वारा इसे राज्यों का मामला करार देकर पलड़ा झरने की कोशिस भी सर्कार की बिफलता को ही चि’न्हित करता हैं।
पता नहीं ये हम कब समझेगे की ये कोई राजनितिक समस्या नहीं वरन सामाजिक व् आर्थिक असमानताओं ने इस समस्या को जनम दिया है। एक तरफ तो हमने एक बेहतर संबिधान का निर्माण किया है जो सामाजिक ,आर्थिक ,राजनैतिक समानता की बात करता है किन्तु इसके बेहतर किर्यानव्यन के आभाव में आज भी ये आदर्श एक दिवा स्वप्न बना हुआ है।
इस देश में आज आदिवासियों की,दलितों की क्या स्थिति है ये किससे छुपी है। एक तरफ दलितों का उत्पीड़न बढ़ा है तो दूसरी तरफ आदिवासी आज सरकार के कॉर्पोरेट परस्त रवैया के कारण अपनी जंगल और जमीं से बेदखल हो चूका है। इस सामाजिक व् आर्थिक असमानताओं ने नक्सलवाद जैसे समस्याओं को जन्म दिया है जो बंगाल के नक्सलबाड़ी से सुरु हो कर आज भारत के आधा राज्यों में फैल चूका है। इस के पीछे एक मजबूत वैचारिक पृष्ट्भूमि काम करती है जिसे jnu जैसे विश्विद्यालय में पढ़ने वाला छात्र तो समझता है लेकिन सरकार नहीं। यही कारण है की सर्कार इस से निबटने में आज भी विफल रही है।
वास्तव में हमारे जवानो के मौत का जिम्मेदार सरकार की गलत नीतिया है जिसने अपने कॉर्पोरेट परास्त रवैये के कारन जहा वास्तविक आदिवासियों को जंगल से बेदखल कर दिया है वही दूसरी तरफ जमीं दे कर अडानी ,अम्बानी, मित्तल जैसे नए आदिवासियों को जनम दे दिया है बस फरक इतना है की ये जंगलो का विनास कर कंक्रीट के जंगलो का निर्माण कर रहे है।
अब प्रसन उठता है की इस समस्या का समाधान क्या है और क्या नक्सलियों द्वारा की जा रही हिंसा को जायज ठहराया जा सकता है। जहा तक हिंसा का सवाल है तो ये किसी भी स्थिति में न्यायोचित्य नहीं ठहराया जा सकता चाहे ये नक्सलियों के तरफ से हो सा राज्य के तरफ से। किन्तु यहाँ इस बात पर भी धयान देने की जरुरत है की यदि अन्याय पूर्ण सिस्टम न्याय को ही कुचलने लगे तो रास्ता ही क्या बचता है उदहारण के लिए हम भोपाल गैस त्रासदी को ले सकते है जहा दशको बित जाने पर भी लोगो को न्याय नहीं मिला और उसका मुख्य अभियुक्त अभी भी कानून के चुंगल से बहार है। ऐसे में यदि लोग हथियार उठा ले तो इसके पीछे कौन जिम्मेदार होगा आप खुद ही सोच सकते है। जहा तक इस समस्या का स्थाई समाधान का प्रसन है तो हमे यह धयान रखना होगा की इसका स्थाई समाधान बातचीत से ही निकला जा सकता जो एक लोकतान्त्रिक तरीका भी है……

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