नया-पुराना

Posted by Prashant Vats Shahi
June 22, 2017

Self-Published

मैं उत्तर प्रदेश के गोरखपुर का रहने वाला हूँ, और पिछले चार सालों से दिल्ली में रहकर पढाई कर रहा हूँ. घर से बाहर रहते हुए लगभग दशक भर होने को आये. पहले एक छोटे से गाँव महुआपार से निकलकर गोरखपुर शहर, फिर इलाहाबाद और अभी राजधानी दिल्ली. दौड़ती भागती जिंदगी बहुत कुछ बदलती है, और जब हम थोड़ा ठहरते हैं और खुद में झांकते है तो पाते हैं की हम खुद कितना बदले और हममे क्या क्या बदल गया.

गाँवों में हम अक्सर देखते हैं कि लोग नौकरी की तलाश में दिल्ली, मुंबई से लेकर विदेशों तक जाते है, और जब लौटते हैं तो बोल-चाल से लेकर पहनावा और बालो का स्टाइल तक बदल जाता है. लेकिन इन बदलावों की वजह से बहुत कुछ खो जाता है…एक बानगी देखिएगा!

हमारे यहाँ ‘मैं’ की जगह ‘हम’ कहने का रिवाज़ है। जैसे- हम खा रहे हैं, हम जा रहे हैं। बजाय की, मैं खा रहा हूँ या मैं जा रहा हूँ कहने के।
और हम बहुत जल्दी इस ‘मैं’ वाली भाषा की तरफ आकर्षित होते हैं…खासतौर से हमारी तरफ वाले यूपी, बिहार वाले लोग! और ऐसा भी नहीं है कि ये ‘हम’ सम्बोधन हमेशा से सिर्फ यहीं का रहा है…पुराने लोगो की भाषा देखिये तो पाएंगे कि दिल्लीवाले भी ‘ हम’ सम्बोधन ही करते आये हैं खुद के लिए…
तो दोस्तों हमारी सोच हमें इस राह में जिस मुक़ाम पर ले आई वो ये है कि इस भाषाई परिवर्तन के पीछे व्यक्तिवाद और पश्चिमीकरण का हाथ है। जहाँ पहले हमारा कोई निर्णय सिर्फ हमारा व्यक्तिगत निर्णय नहीं होकर पूरे परिवार और हमारे स्नेहीजनों को ध्यान में रखकर लिया गया निर्णय होता था और बात ऐसे होती थी कि ‘हम ये काम करना चाहते हैं,हम ये बात कहना चाहते हैं।, वहीं आज व्यक्तिवादिता ने निर्णयों का आयाम छोटा कर दिया है, व्यक्ति की सोच छोटी हो गयी है, वो सिर्फ खुद की सोचता है। इसीलिए वो ‘मैं’ और ‘मेरा’ या ‘मेरी’ तक सीमित हो गया है।
संस्कृत में अहम् का आशय ‘मैं’ से है और अहम् का ही आशय ‘अहंकार’ से भी है। दूसरे शब्दों में कहें तो ये ‘मैं’ शब्द घमंड को जन्म देता है…आज तो भाषा तू-तड़ाक तक आ पहुंची है जिसकी विवेचना करना भी बेईमानी होगी…
संत कबीर का ये दोहा इस प्रकरण में प्रासंगिक प्रतीत होता है…
जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि है मैं नाहि।
प्रेम गली अति सांकरी, तामे दो न समाहिं।।

ये सिर्फ एक छोटा सा उदाहरण है. ऐसी बहुत सी बातें हैं, बहुत सी विशेषताएं हैं जो हम खोते जा रहे हैं. पर आधुनिकता के छोले में कुछ छेड़ भी हैं जिनमे से झाँकने पर हमें अतीत की अच्छाइयाँ भी दिख जाती हैं… और तब अफ़सोस होता है कि हम ये सब भी साथ लेकर क्यों न चल सके.

आधुनिकता के खोखलेपन का ही एक और उदाहरण आज विज्ञान की अतिवादिता में भी दिखता है. पुनर्जागरण ने शासन की बागडोर धर्म के हाथ से निकालकर राजनीति को थमाई थी. और ऐसा हुआ था क्योकि धर्म अति की ओर उन्मुख था…लोगो में धर्म के नाम पर अंधविश्वास पैदा हो गया था…तर्कशीलता समाप्त हो गयी थी। पुनर्जागरण ने वैज्ञानिक सोच को नयी ज़िन्दगी दी।
पुनर्जागरण से पैदा हुआ विज्ञान दिनोदिन तरक़्क़ी के मक़ाम चूमता गया…और आज विज्ञान भी अति की उसी दहलीज पर खड़ा है जिस पर किसी ज़माने में धर्म खड़ा हुआ करता था। आज वैज्ञानिकता इस क़दर हावी हो चुकी की समाज से नैतिकता का साया छूटता जा रहा है।
जिस समाज ने जितनी जादा वैज्ञानिक तरक़्क़ी की है उस समाज से नैतिकता उतनी ही दूर हुई है। फिलहाल स्वतंत्रता और बोलने-चालने की आज़ादी पर तो लोग कुछ भी बोलेंगे…पर इस बात पर सभी सहमत होंगे की परिवारवाद की जडें पश्चिमी समाजों से उखड रही हैं। आज़ादी के नाम पर तलाक़ हो जाते हैं, कइयों शादियां हो जाती हैं…और अंततः घिनौनी बीमारियों का जन्म हो जाता है। फिर इन बीमारियों का इलाज करने विज्ञान कूदता है समाज में…।
इससे तो बेहतर होगा की धर्म जैसी कोई संस्था हो…जो समाज को संचालित करने में एक निर्णायक भूमिका निभाये. हाँ… ये बात जरूर होनी चाहिए वो संस्था भी अतिवाद की और न चली जाये…

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