नवोदय विद्द्यालय का सच

Posted by vidhi singhai
June 25, 2017

Self-Published

हमारे देश के ग्रामीण प्रतिभावान छात्रों के लिए 1986 में राजीव गांधी जी द्वारा जवाहर नवोदय विद्यालय  की स्थापना की गई थी। इस स्कूल का उद्देश्य  उन विद्यार्थियों के संपूर्ण विकास के लिए किया गया था। इसमें प्रवेश के लिए प्रवेश- परीक्षा होती है। मैंने भी दी और मेरा भी सेलेक्शन हो गया। पर, सच्चाई का सामना तो वहां जाने पर ही हुआ।

6वीं कक्षा में थी, जब पहली बार अपनी राजनीतिशास्त्र की किताब में भेदभाव शब्द पड़ा था। 10 साल के बच्चो को तो, इस शब्द का अर्थ भी नही पता होता है। बस किताब से परिभाषा याद कर लेते है। लेकिन नवोदय विद्द्यालय के हर बच्चे को भेदभाव शब्द का अर्थ 7वीं में आने तक समझ आ जाता है।

इन विद्यालयों का उद्देश्य यही होता है, की सब बच्चों को भेदभाव विहीन माहौल दिया जाए। लेकिन, यही विद्यालय हमे भेदभाव सीखाता है। अगर आप एक लड़की है, तो आपको कभी किसी लड़के से बात नही करनी है। अगर आप ऐसा करते हुए पाए जाती है, तो आपको चरित्रहीन के टैग से लैस कर दिया जाता है। आप उनसे पढ़ाई की बात भी नही कर सकते है।
हम लोगोंको एक छोटी सी दुकान मुहैया कराई गई थी। जिसमे आपकी ज़रूरत का सारा समान मिल ही जाता था। लेकिन, लड़कियो के लिए इस दुकान पर जाने के लिए एक समय फिक्स था दोपहर 2 से 3 तक। पूरे दिन में अमूमन बस यही समय होता था, आराम के लिए लेकिन अगर आप इस वक्त दुकान नही जाएंगे तो आप जा नही सकते है। इसलिए आराम शब्द तो आप निकल ही दीजिये। सप्ताह के 6 दिन के लिए दुकान लड़कियों के लिए खुली होती थी, लेकिन रविवार को आप नही जा सकते है। सप्ताह का हर दिन एक क्लास की लड़कियों के लिए फिक्स था, आप उसी दिन बस दुकान जा सकते है। इस बीच मे अगर आपको जाना हो, जिस दिन आपकी टर्न ना हो तो वार्डन के सामने गिड़गिडायो। इस एक घंटे में ही उस दुकान पर आप अपने घर फ़ोन पर बात कर सकते है। दुकान में दो फ़ोन थे, एक कॉइन वाला और दूसरा लैंडलाइन। कॉइन वाले में कम पैसे में ज़्यादा बात होती थी, तो सारी लड़कियां इसी से बात करती थी। इसका भी वक्त तय था कोई पांच मिनट से ज़्यादा बात नही करेगा। तो एक क्लास में 24 से 28 लड़कियां होती थी। अगर एक लड़की 3 मिनट बात भी करे, तो औसतन 72 मिनट होते थे। लेकिन हमें मिलते सिर्फ 60 मिनट थे। इस कारण कई लड़कियां अपने घर बात ही नही कर पाती थी, जिनकी लास्ट में टर्न होती थी।
दोपहर के खाने के बाद जो मैस से सबसे पहले बाहर आएगा उसकी पहली टर्न और जैसे जो निकलता आएगा उसकी टर्न फिक्स हो जाती थी। कोई भी लड़की आखिरी में नही आना चाहती थी, क्योंकि उन्हें पता था फिर तो घर पर बात ही नही हो सकती है। इसलिए उस दिन खाना भी नही खाते थे। वॉर्डन हमे खाना ना खाने पर गुस्सा तो तो करती थी, पर कभी उसकी वजह नही समझ पायी। ये तो शुरू के सालों की बात है। बाद के सालों में तो हमारा कैंटीन पर जाना ही बंद कर दिया गया था। लेकिन लड़के तो खुले हुए साँड़ थे, जब चाहे जा सकते थे। सारी पावंदियाँ सिर्फ लड़कियों के लिए थी।
हमारे यहाँ होस्टल में खाना बनाना एक अपराध था। अगर लड़के पकड़े जाते है, तो उन्हें वार्निंग देकर छोड़ दिया जाएगा। अगर लड़की पकड़ी गई तो, पहले तो उसके घर वालो को बुलाया जाएगा उनकी बेज़्ज़ती होगी और फिर उसे सस्पेंड कर दिया जाएगा। यहाँ बात सजा देनी की नही है, अगर आपको सज़ा देनी है तो सबको बराबर सज़ा दीजिये। पर लड़कियों के लिए दंड संहिता अलग थी और लड़कों के लिए अलग। हमे खाना बनाने के अपराध में सस्पेंड तो कर दिया गया , पर कभी इसके पीछे की वजह जानना स्कूल प्रशासन ने ज़रूरत नही समझी। हमे रात के आठ के बाद सीधा सुबह नौ बजे नास्ता मिलता था। लेकिन हम किशोरावस्था में थे, भूख भी ज़्यादा लगती थी। दूसरा कारण था, खाने का स्वाद व गुणवत्ता। वो अच्छी नही होती थी, इसलिए हमें ये कदम उठाने पड़ते थे। अगर इसकी शिकायत लड़कियां करती तो उन्हें सस्पेंस होने की धमकी दी जाती और चुप करा दी जाती। लेकिन लड़के अवाज़ उठा लेते थे। उनकी आवाज जब दबा नही पाए, तो उन्हें विद्रोही घोषित कर दिया जाता था। मतलब अब आप जितने साल वहां है, आप इसी टैग के साथ रहेंगे। अपने हक के लिए लड़ना हमे बागी बना देता है।

हमारे होस्टल में एक कमरे में 20 लड़कियां होती थी। और हर एक माले में 2 कमरे मतलब एक माले में 40 लड़कियां होती थी। हर माले में 6 टॉयलेट, 4 बाथरूम और 1 बड़ा सिंक जिसमे 4 नल थे। इनमे पानी भी सिर्फ सुबह 30 मिनट आता था, लेकिन टॉइलेट में नही।टॉयलेट में हमे अपनी बाल्टी भरकर जाना होता था। इन 30 मिनट में हम कैसे नहाते होंगे, इसका अनुमान आप सब लगा सकते है। देश के सबसे अच्छे सरकारी स्कूल के होस्टल में टॉइलेट में पानी नही आता है, और आप बात करते है चाँद और मंगल ग्रह पर पानी के अस्तित्व की। ये हालात लड़के और लड़कियों दोनो के होस्टल में थी। शायद सिर्फ हम इस चीज़ में लड़कों के बराबर थे।

हमारे यहाँ अगर किसी लड़के को अपनी बहन से मिलना हो, तो उसे पहले वार्डन से मिलना होगा। लेकिन वो अपने किसी दोस्त के साथ नही आ सकता है। भाई – बहन को जो भी बात करनी है, वो वार्डन के सामने ही करेंगे। अगर लड़की को मिलना है, तो वो बॉयज होस्टल तक नही जा सकती है।
आजकल सोशल मीडिया का उपयोग करना बहुत आम हो चुका है। लेकिन हमारे यहां कोई लड़की इसका इस्तेमाल करती है, तो वह चरित्रहीं है। हम कभी स्कूल मे तो इसका उपयोग करते नही थे, पर घर पर वो भी कुछ समय के लिए। मेरे कुछ जूनियर्स को फेसबुक का उपयोग करने के जुर्म में सस्पेंड कर दिया गया था।
हम जब सीनियर क्लासेज में आये, तब पढ़ाई भी ज़्यादा थी। लेकिन होस्टल में शांति नही होती थी। लड़के तो शाम को स्कूल चले जय करते थे और वहाँ पढ़ाई किया करते थे। लेकिन हम लड़कियों को तो शाम 6 के बाद होस्टल से ही नही निकलने दिया जाता था। जब दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्राओं के आंदोलन के बारे में रोज़ अखबार में पढ़ते थे। हमारा भी मन था, हम इन लोगो से जुड़े और अपने साथ हो रहे भेदभाव के खिलाफ आवाज़ उठाये। पर हमारे पंख उड़ने के पहले ही काट दिए थे, हमे तो फुदकना भी नही आता था।

ये विचार मेरे मौलिक विचार है। हर एक्स – नवोदयन को ये  बर्दास्त नही होगा कि कोई आपके स्वर्ग को बुरा बोले, पर सच तो स्वीकारना होगा। हर सिक्के के दो  पहलू होते है, आप लोगो ने अच्छा तो सबको बताया है। पर कभी इसे भी साझा कीजिये।

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