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परीक्षा और प्रश्नपत्रों पर कुछ बेसिक सवाल

Posted by Rana Ashish Singh
June 12, 2017

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(google images)
आबादी में जिस प्रकार के बदलाव हो रहे हैं उसके अनुसार आने वाले दशकों में भारतीय जनसँख्या का एक बड़ा हिस्सा मुख्यतया युवाओं का होगा. आंकड़ों के हिसाब से पंद्रह से चौंसठ साल आयुवर्ग की जनसँख्या सन 2000 में 600  मिलियन थी जो सन 2025 तक 942 मिलियन (पूरी जनसँख्या का 67 प्रतिशत) हो जाने की सम्भावना है. कई शोध यह भी बता चुके हैं कि सन 2020 तक भारत दुनिया का सबसे युवा देश बन जायेगा.
देश में शिक्षा का स्टार भी बढ़ रहा है. उसके साथ समाज में नई चुनौतियाँ आएँगी. सरकार ने सभी को रोजगार उपलब्ध करने के लिए कई योजनाओं के क्रियान्वयन की बात समय-समय पर की है. वास्तविकता इससे थोड़ी इतर है. सरकारी नौकरी को आज भी एक अच्छा विकल्प मन जाता है. सरकारी नौकरी पाने के लिए प्रतियोगी परीक्षायें
आयोजित की जाती हैं. एक अच्छे संसथान में पढ़ने के लिए भी ऐसी परीक्षाओं से गुजरना पड़ता है .
सामान्यतः सरकार का वह विभाग या एजेंसी जो किसी प्रतियोगी परीक्षा कराने की ज़िम्मेदार होती है, किसी थर्ड पार्टी/कंपनी को परीक्षा-पत्र बनाने के लिए हायर करती है. यह कंपनी निर्धारित समयावधि में प्रश्नपत्र के कई सेट बनाकर देती है. कंपनी एक (या कई) टीम बनाकर इस काम को पूरा करती है. मुझे यहाँ मामला थोड़ा पेंचीदा लगता है, और कुछ सवाल जहन में आते हैं-
1) प्रश्नपत्रों की सीक्रेसी कैसे मेंटेन होती है?
2) जो लोग यह प्रश्नपत्र बनाने के काम में लगे हैं वे कितने विश्वशनीय हैं, और क्या वे इन प्रश्नपत्रों को बना पाने योग्य हैं?
3) प्रश्नपत्र बनाने वाले व्यक्ति लगातार (दिनों/महीनों) तक एक जैसे प्रश्नो को पढ़ते और तैयार करते हैं. ऐसे में यदि वे प्रश्नपत्र बाहर लेकर न भी आएं, क्या यह संभव नहीं है कि वे इस कार्य के दौरान अपने अभ्यास और याद्दाश्त का प्रयोग करके उन (/उन जैसे) प्रश्नो को आगे सर्कुलेट कर दें? इसके लिए उनकी जवाबदेही कैसे बनेगी?
4) यह थोड़ा फिलोसोफिकल प्रश्न है कि किसी की योग्यता का परिचय हमारे यहाँ याददाश्त पर निर्भर क्यों करता है?
 हम अपनी आने वाली पीढ़ी को एक बेहतर भविष्य के अलावा कुछ और नहीं दे सकते और उसके लिए हमें वर्तमान को सुधारना पड़ेगा. जब हमें आने वाले समय के बारे में और उस समय की चुनौतियों के बारे में पता है तो क्यों न उससे निपटने की तयारी शुरू कर दी जाये?

 

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