पहले खुद की इज़्ज़त करना सीख लें फिर दूसरों से उम्मीद रखें

Posted by Deep Shikha
June 27, 2017

Self-Published

           एक दिन मैं सपने में अपने आप से मिली। पल भर के लिए तो विश्वास नहीं हुआ।मैं ज़रा छोटी थी, थोड़ी सांवरी भी, गाल थोड़े गोल थे और पेट की गोलाई उससे भी ज़्यादा।
आपमें से बहुत लोग यही सोच रहे होंगे कि हाए राम! काश मुझे ये सपना ना आए। और जिनकी हकीकत है ये, वो दुपट्टे से मुँह छुपाए होंगे।
पर मुझे आज तक ये समझ नहीं आया कि सांवरे रंग को सांवरा रंग ना बुलाया जाए तो फिर क्या कहा जाए। किसी को ये कहना कि तुम छोटी हो या हकलाती हो ,इसमें भी क्या बुराई है अगर ये सच है तो।
बुराई है तब जब सामने वाले की आँखों में सांवरे लोगों के लिए सम्मान ना हो। बुराई सबसे ज़्यादा तो तब है जब सांवरे, कद के छोटे, मोटे, अपंग लोगों की आँखों में खुद के लिए ही सम्मान ना हो। जब खुद ही फेयरनेस क्रीम,हील्स पहन कर,किसी कोने में छुप कर अपनी कमियों को छुपाने की आदत बना लेते हैं हम, जिसे कमी का नाम भी हमने ही दिया है। फिर हम बाकियों से कैसे उम्मीद कर सकते हैं कि वो हमें,हम जैसे भी हैं वैसे ही स्वीकार करें,बिना टिप्पणी के।
पहले हम खुद की ही इज़्ज़त करना सीख लें फिर बाकियों को पाठ पढ़ाने निकलेेेें।

मैं कितनी अलग हूं भीड़ से

मुझे बुलाओ छोटी, मोटी
बुरा क्या है
सच है वो
काली ही बुला लो, सांवरी भी
वो भी एक रंग है
काले मेघ देखे होंगे तुमने
बारिश नहीं होती उजले मेघों से
बस निहारने के काम आते हैं

मेरे दांत ऊंचे हैं
तो बुलाओ शेरनी खरगोश हाथी कुछ भी
बेतुके नाम दे लो
मुझे शिकायत बिल्कुल नहीं
पाकेट काट कर जाते हो देखने उन्हें
परिवार के साथ, दोस्तों के साथ
याद है ना, सुकून मिलता है तुम्हें

सोचना, अभिव्यक्त करना प्रवृत्ति है मानव की
तुम वही करो
मुझे शिकायत नहीं
मैं हूं जो हूं
प्रकृति से मिला जो मुझे, संवारना है
बिगाड़ना नहीं

पसंद करो तो करो
ना करो तो आलोचना ही कर लो
पता तो चले, “मैं कितनी अलग हूं, भीड़ से”
मैं हूं जो हूं, मां की कोख का सबूत हूं
वो खूबसुरत थी, मैं भी हूं
मैं खुद को पसंद हूं

-दीप शिखा

 

 

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