प्रेरणा की “नमस्ते”

Posted by Tushar Srivastava
June 5, 2017

Self-Published

सुबह जिम से लौटते हुए आज फिर पड़ोस की उस बच्ची से मेरा सामना हो गया और रोज की तरह जिंदादिल मुस्कान के साथ उसने नमस्ते बोला और आगे बढ़ गयी।  मुश्किल से छठी  या सातवीं में होगी नाम भी नहीं पता बस रोज सुबह स्कूल जाती मिल जाती थी गली में।  पोलियो है शायद, “विकलांग” है दोनों पैरो से, चलने के लिए भी बहुत मशक्क़त  करनी पड़ती है, लगभग घसिट  के ही चलती है लेकिन कभी स्कूल बैग अपने छोटे भाई के हाथ में देकर चलते नहीं देखा।

खैर आज का  दिन बहुत इम्पोर्टेन्ट था, एक बहुत ही अच्छी कंपनी में इंटरव्यू था मेरा  जिसके लिए मैं  पिछले 10 दिनों  से तैयारी में लगा था और मुझे  पूरा यकीन था की इस बार तो हो ही जाएगा।  6 महीने हो गए थे इन्जिनीरिंग  पास किये हुए और अब तक नौकरी नहीं लगी थी, चाहता तो छोटी मोटी  नौकरी ज्वाइन कर लेता लेकिन धुन थी अपने ब्रांच की कोर जॉब की।  वैसे तो घर  वालो से कोई दबाव  या जिम्मेदारी नहीं थी लेकिन अपनी जेनेरशन में सबसे बड़े और पढ़ाई में हमेशा अव्वल रहने वाले मुझ पर खुद की आकांक्षाओं, उम्मीदों और खुद को साबित करने का दबाव हर इंटरव्यू में रिजेक्शन के साथ बढ़ता ही जा रहा  था।

कमरे से निकलने से पहले माँ को फोन किया और बस हाल चाल पूछ कर रखने को था की माँ ने बोला भइया  परेशान ना होना भगवान् सब कुछ समय पर  देते है, लगभग झुँझला  कर मैंने बोला  आप और आपके भगवान् बस ! रखते है नमस्ते। सुबह समय पर पहुँचने की वजह से पहले बैच में इंटरव्यू हो गया सारे राउंड बहुत अच्छे हुए और मै  आश्वस्त था अब तो हो ही जाएगा। लेकिन प्रभु को कुछ और मंजूर था आज फाइनल लिस्ट में मेरा नाम नहीं था। मै  हर बार की तरह चुपचाप उठा बैग टांगा  और मन में वैचारिक कुश्तिया लड़ता वापस कमरे की तरफ चल दिया। मेट्रो से उतर कर पैदल अपनी कॉलोनी की ओर बढ़ते हुए अपने मन में अन्तर्युद्ध लड़ रहा था  “बस अब बहुत हो गया अब सब्र नहीं होता, अरे कब तक घर से पॉकेटमनी लेते रहेंगे घर वालो के लिए भी कुछ जवाबदेही है मेरी।  इतनी भी किस्मत किसी की नहीं खराब होती, अब जो जैसी नौकरी मिलेगी कर लूँगा, दुनिया में सब जी रहे है सबको अपनी मन चाही  जिंदगी नहीं मिलती, ये जो भगवान् है ऊपर वो तो बस नाम के है  सब दिखता हैँ उनको तो क्या मेरी मेहनत मेरी परेशानिया नहीं दिख रही !” ये सोचते सोचते अभी अपनी गली में मुड़ा  ही था की देखा स्कूल ड्रेस में सुबह वाली गुड़िया बहुत मुश्किल से धीरे धीरे घसीटते हुए अकेले घर की तरफ जा रही है।  और पास पहुंचा, देखा तो चिलचिलाती  धूप  और गर्मी से उसका चेहरा लाल था पसीने से लथपथ वो लगभग रोने को थी।

अरे क्या हुआ बिटिया क्यों परेशान हो ?” मुझे देख कर जैसे उसे रहत मिली हो लेकिन कुछ  बोली नहीं। बगल में बने चबूतरे पर  छाँव में उसे बैठाया और अपने बैग से निकल कर पानी की बोतल देते हुए बोला  लो पानी पी लो  बहुत गर्मी है। पानी के लम्बे घूंट भर कर जैसे उसे चैन मिला, फिर मैंने पूछा क्या हुआ आज परेशान दिख रही हो तो जवाब आया चक्कर गया था आज गर्मी ज्यादा है ना भैया

किसी को बुला लेती घर से स्कूल लेने को

अरे नहीं मै  चली जाती हूँ अपने आप वो आज थोड़ी गर्मी ज्यादा है वरना  मै अपने भाई से पहले पहुँच जाती हूँ घर , वो अपने दोस्तों के साथ बदमाशियां करता हुआ आता है सुबह सिर्फ नमस्ते करने वाली लड़की इतनी बातूनी होगी सोचा नही था,  मै  भी खाली ही था आज तो सोचा थोड़ी गप्पे ही मार लेता हूँ ।

अच्छा  सबसे फेवरेट सब्जेक्ट कौन सा है ?” तपाक  से जवाब आया साइंस

कौन पढ़ाता है घर पे ?”

मम्मी  और पापा दोनों, डॉक्टर बनना है मुझे मेरा और पापा का ड्रीम है

“डॉक्टर बनने के लिए बहुत मेहनत  करनी पड़ती है पता है बहुत पढ़ना भी पड़ता है !” मैंने उसे समझाने के लहज़े  में बोला।

हां पता है अब तो नीट एग्जाम देना पड़ता है मैंने सारी  रिसर्च पहले से कर ली है मै पापा के फ़ोन पे गेम नहीं खेलती बस ये ही सब पढ़ती रहती हूँ, पता है भैया बहुत मेहनत  करनी है, पापा बोलते है सिर्फ रट लेने से एग्जाम क्लियर नहीं होगा बहुत सारी  मेहनत  और उस से ज्यादा पेशेंस रखना पड़ेगा। मै  तो सबसे अलग हूँ ना तो मुझे तो और ज़्यादा  रखना पड़ेगा

इतनी छोटी सी बच्ची को अपने लक्ष्य और जीवन को लेकर इतना दृढ़ और सजग देख कर बहुत अच्छा लगा, लगा जैसे रेगिस्तान में कोई तालाब दिख गया हो।

चलो अब घर चलते है मै  किसी से बाइक से छुड़वा देता हूँ तुम्हे

नहीं भैया पैदल चलेंगे पानी पी लिया है अब सही है वैसे भी रोज आना है तो गर्मी की भी आदत डालनी पड़ेगी। मै  भी उसकी बात टाल  नहीं पाया और उसके पीछे पीछे चल दिया।

धीरे धीरे उस बच्ची के साथ चलते हुए मुझे अपनी जिंदगी दौड़ती दिख रही थी, कुछ घंटो पहले हुआ इंटरव्यू का रिजेक्शन दिमाग से कब और कहा गायब हो गया था पता ही नहीं था । मै  मन ही मन खुद को डाँट रहा था एक मै  इतनी सी परेशानी में घुटने टेकने की सोचने लगा था और एक ये बच्ची है जिसे परेशानियाँ दिखती ही नहीं। आज सुबह तक विकलांग लगने वाली वाली लड़की अब मुझे “दिव्यांग” दिख रही थी।  दृढ़, संकल्पित, प्रेरक दिव्यांग।

कमरे पर पहुँच कर माँ को फ़ोन किया और बस इतना बोला  “आज नहीं हुआ  लेकिन चिंता न कीजिये जल्दी ही हो जाएगा “।

अब रोज जिम से लौटते समय उस बच्ची का नमस्ते मेरे लिए सिर्फ अभिवादन नहीं था अब वो नमस्ते मेरे दिन भर का प्रेरणास्रोत था।

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