बनिये की चतुराई

Posted by Nitesh Ojha
June 30, 2017

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देश की सत्ता में काबिज़ पार्टी के राष्ट्राध्यक्ष ने राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी को चतुर बनिया कहकर देश को एक नया मुद्दा दे दिया. असल में देखा जाए तो गाँधी चतुर बनिया तो थे. जिसके हाथ में लाठी होते हुए भी उसका इस्तेमाल किसी पर नहीं किया. बावजूद इसके उस बनिये से वह साम्राज्य कांपता था जिसका “सूरज कभी अस्त नहीं होता था”.
उस धार्मिक बनिये की नज़र में गाय-बकरी उपयोगी जीव थे. शाकाहारी भोजन खाने वाले बनिये ने गाय को माता तो माना पर उसकी खाल उतारने वाले को कभी पापी नहीं माना.
विदेशों में भ्रमण के बाद भी वो बनिया देशवासीयों की नब्ज़ पहचानता था. दिन में चार पांच बार कुर्ता और जैकेट बदलने की जगह गरीब जनता को देख पहले उसने अपने वस्त्र त्यागे फिर देश के करोड़ों लोगों के बदन से विदेशी वस्त्र उतरवा कर जलवा दिए. उस बनिये की इस चतुराई से मैनचेस्टर की कपड़ा मिलों की कमर टूट गई.
उस बनिये की ग्राम स्वराज की कल्पना का आधार ही था कि देश का हर गांव स्वावलम्बी हो कि अपनी जरूरतों कि लिए किसी का मुँह न ताकना पड़े.
वह चतुर बनिया पढ़ा लिखा बैरिस्टर था. उसने अपनी “डिग्री” कभी छिपाई नहीं. अच्छे खासे खानदान से होने के बाद भी उसने अपना पखाना अपने हाथों से साफ़ करना शुरू किया और उसी के स्वछता अभियान को आज के सत्ताधारी अपना मिशन बनाकर “सूट-बूट” पहन झाड़ू लगाते हुए फोटो खिंचवाते नज़ए आते हैं.

उस बनिये ने किसानों के लिए कभी उपवास का ढोंग नहीं किया शायद इस लिए ही तो जब वो उपवास करता तो सारा देश उसके पीछे भूखा रहता.
वो जुमलेबाज नहीं था बल्कि वो बनिया इतना सच्चा और निडर था की बचपन में की गई एक-एक गलती को लिखित दस्तावेज़ बना कर मरा ताकि आने वाली पीढ़ी उससे परिवर्तन के उदहारण सीख सके.

संविधान में कोई उपाधि न होने के बावजूद देश की जनता उसे आज भी राष्ट्रपिता का दर्जा देती है. यही उस बनिये की चतुराई है.

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