बेहिसाब बढ़ती छँटनी और बेरोज़गारी

Self-Published

बेहिसाब बढ़ती छँटनी और बेरोज़गारी

मुकेश

छँटनी और बेरोज़गारी इस वक़्त पूरे देश की आम मेहनतकश जनता के लिए एक भारी चिन्ता का विषय है। 2014 के चुनाव के पहले भारतीय जनता पार्टी और उसके नेता नरेन्द्र मोदी ने पिछली सरकार की रोज़गार सृजन न कर पाने के लिए तीव्र आलोचना की थी और इसे अपना मुख्य लक्ष्य बताते हुए प्रति वर्ष करोड़ों नयी नौकरियाँ देने का वादा किया था। लेकिन वस्तुस्थिति इसके ठीक उलट है। 2015-16 के आर्थिक सर्वे में कहा गया कि 2011-12 में बेरोज़गारी 3.8% थी, जो 2015-16 में बढ़कर 5% हो गयी। वैसे यह संख्या और भी ज़्यादा है क्योंकि किसी भी काम में साल के कुछ भी दिन लगे व्यक्तियों को इसमें बेरोज़गार नहीं गिना जाता। साथ ही, 8 श्रम केन्द्रित क्षेत्रों में 2011-12 के 9.3 लाख के बजाय 2015 में मात्र 1.35 लाख नयी नौकरियाँ ही जुड़ीं। जुलाई 2014 से दिसम्बर 2016 के पूरे ढाई साल में उद्योग, निर्माण, व्यापार, शिक्षा, स्वास्थ्य, सूचना प्रौद्योगिकी, होटल/रेस्टोरेण्ट और यातायात के मुख्य रोज़गार प्रदाता क्षेत्रों में मात्र 6 लाख 41 हज़ार नौकरियाँ ही मिलीं। साथ ही 2016-17 का आर्थिक सर्वे यह भी बताता है कि रोज़गार की प्रकृति भी स्थाई रोज़गार के बजाय अस्थाई और संविदा/ठेका रोज़गार की होती जा रही है जिससे श्रमिकों की मज़दूरी, रोज़गार स्थायित्व और सामाजिक सुरक्षा पर बेहद बुरा असर पड़ रहा है।

मोदी सरकार ने रोज़गार के लिए पाँच मुख्य योजनाएँ शुरू की थीं – मेक इन इण्डिया, स्टार्ट अप, डिजिटल इण्डिया, स्किल इण्डिया तथा स्मार्ट सिटी। लेकिन इन पाँचों का अब तक कहीं कोई असर नज़र नहीं आया है। पहले ही क्षमता से नीचे चलते उद्योगों की स्थिति में नये निवेश की गुंजाइश ही नहीं है इसलिए मेक इन इण्डिया का नतीजा क्या निकल सकता था? स्टार्ट अप जो शुरू भी हुए थे, उनकी हवा पहले ही निकलनी शुरू हो चुकी है। डिजिटल के क्षेत्र का तो सबसे बुरा हाल सबको मालूम ही है कि आईटी की इन कम्पनियों में तो लाखों की तादाद में कर्मचारियों को बाहर का रास्ता दिखाया जा रहा है। स्मार्ट सिटी का क्या हुआ किसी को मालूम नहीं; और बिना रोज़गार देने वाले कारोबार के सिर्फ़ स्किल इण्डिया में कौशल प्रशिक्षण एक नौटंकी से बढ़कर क्या हो सकता है क्योंकि बेरोज़गारी की वजह कुशलता का अभाव नहीं नौकरियों की कमी है।

मैनपावर ग्रुप ने 4910 रोज़गार दाताओं के सर्वे के नतीजे जारी किये हैं। इनके अनुसार वैश्विक अर्थव्यवस्था में अनिश्चितताओं के चलते ये रोज़गार दाता या कम्पनियाँ 2005 के बाद से अब तक की सबसे निराशाजनक स्थिति महसूस कर रही हैं और जुलाई-सितम्बर 2017 में लगातार छठी तिमाही भर्तियाँ कम होने वाली हैं। यह भी बताया गया कि सभी कम्पनियाँ अपना मुनाफ़ा बढ़ाने के लिए नयी तकनीकों का प्रयोग कर कर्मचारियों की संख्या को सीमित रखना चाहती हैं। इसलिए वे भर्ती बढ़ने के बारे में आशावादी नहीं हैं। उद्योग, खनन, वित्त, बीमा, सम्पत्ति और निर्माण सभी बड़े रोज़गारदाता क्षेत्रों में भर्तियों की तादाद कम होने की सम्भावना है सिर्फ़ थोक व फुटकर व्यापार अर्थात दुकानें ही एक क्षेत्र हैं, जहाँ कुछ नौकरियाँ दिखाई दे रही हैं। (इकोनॉमिक टाइम्स, 14 जून)

ख़ुद इकोनॉमिक टाइम्स ने नौकरियों की स्थिति पर 11 हज़ार कर्मचारियों के बीच एक सर्वे किया और निष्कर्ष निकाला कि छँटनी सिर्फ़ एक अफ़वाह मात्र नहीं बल्कि कर्मचारियों के लिए एक वास्तविक सिर पर खड़ी आफ़त है। 50% कर्मचारियों का कहना था कि उनकी कम्पनी में छँटनी की बात चल रही है। 62% का यह भी कहना था कि नौकरियों की संख्या आगे सिकुड़ती ही जायेगी। 52% कर्मचारियों का यह भी मानना था कि छंटनी का एकमात्र कारण सिर्फ़ नयी तकनीक का प्रयोग ही नहीं बल्कि उनके कार्यक्षेत्र में आर्थिक संकट भी है। उदाहरण के लिए, स्टार्ट अप क्षेत्र के कर्मचारियों के अनुसार डिजिटल तकनीक से भी ज़्यादा निवेश के लिए धन का अभाव नौकरियों को खा जाने वाला है। सिर्फ़ 35% कर्मचारी ही डिजिटल तकनीक को अपनी नौकरी के लिए मुख्य ख़तरा मानते हैं।

छँटनी का यह संकट अर्थव्यवस्था के किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं है। इंजीनियरिंग क्षेत्र की प्रमुख कम्पनी लार्सन एण्ड टुब्रो अपने 11% अर्थात 14 हज़ार कर्मचारियों को निकाल चुकी है। सबसे सशक्त माने जाने वाला एचडीएफ़सी बैंक भी पिछली 2 तिमाहियों में 11 हज़ार कर्मचारियों को निकाल चुका है। एक और बड़ी कम्पनी टाटा मोटर्स ने भी हज़ारों कम्पनियों को निकाला है। मोदी सरकार द्वारा रोज़गार सृजन का मुख्य स्रोत बताये जाने वाले स्टार्ट अप क्षेत्र में फ़्ल‍िपकार्ट, स्नैपडील से लेकर तमाम कम्पनियों से बड़ी तादाद में नौकरियों में कमी हुई है। लेकिन भारतीय अर्थव्यवस्था के ग्लैमरस क्षेत्र सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र की कॉग्निजेण्ट, इनफ़ोसिस, विप्रो, आदि कम्पनियों में होने वाली भारी छँटनी की ख़बरों ने इस मुद्दे को ज़ोरों से चर्चा में ला दिया है। एनडीटीवी प्रॉफि़ट द्वारा प्रकाशित नौकरी डॉट कॉम के सर्वे के मुताबिक़़ मई 2017 में पिछले साल के मुक़ाबले भर्ती की संख्या में 4% की गिरावट है जिसमें सूचना प्रौद्योगिकी और बीपीओ क्षेत्र की गिरावट सबसे अधिक है। साथ ही हर अनुभव-उम्र वालों और हर स्तर के कर्मचारियों की भर्ती में कमी आयी है और यह स्थिति अभी आगे भी जारी रहने वाली है।

लेकिन यह प्रक्रिया तो पिछले कई सालों से ही चल रही थी। ख़ुद सरकारी लेबर ब्यूरो के तिमाही सर्वे द्वारा जारी आँकड़े यह बहुत पहले से बता रहे थे कि नयी नौकरियों की तादाद लगातार घट रही थी और मोदी के 2 करोड़ प्रति वर्ष नयी नौकरियों के सृजन के वादे के मुक़ाबले एक-दो लाख की संख्या पर आ पहुँची थी। पर सरकार द्वारा नवम्बर 2016 में की गयी नोटबन्दी ने रोज़गार के इस संकट को एक महाविनाश में बदल दिया। पहले ही नये निवेश की कमी और क्षमता से कम उत्पादन से जूझ रही अर्थव्यवस्था में इस ज़बरदस्ती पैदा किये गये तरलता या नक़दी की उपलब्धता में कमी ने कारोबार के पूरे चक्र अर्थात ख़रीद, उत्पादन और बिक्री को बाधित कर दिया। इससे बहुत सारे, ख़ास तौर पर छोटे-मध्यम कारोबार या तो बन्द या कम सक्रिय हो गये और उन्होंने अपनी सक्रियता के स्तर से ज़्यादा श्रमिकों को नौकरियों से बाहर कर दिया। निर्माण और उद्योग के बड़ी संख्या में रोज़गार देने वाले क्षेत्रों में इसका ख़ास तौर पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ा और कुछ विश्लेषकों के अनुसार लगभग एक करोड़ श्रमिकों को इससे स्थाई या अस्थाई बेरोज़गारी का सामना करना पड़ा और इनमें से बहुतों को अभी भी वापस कोई रोज़गार नहीं मिला है।

पर नौकरियों पर यह संकट सिर्फ़ निजी क्षेत्र में ही नहीं है ख़ुद मोदी सरकार के नियन्त्रण वाली सरकारी नौकरियों में भी यही स्थिति है। सरकारी नौकरियों में भर्ती पिछले 3 साल में 89% घटी है। फिर भर्ती न करने की वजह से ख़ाली पड़े 2 लाख पदों को अब सरकार ने यह कहकर समाप्त कर दिया है कि इतने दिनों से काम चल रहा है तो इन पदों पर भर्ती की कोई ज़रूरत ही नहीं है। इसी तरह रेलवे में भी 20 हज़ार पद समाप्त कर दिये गये। अन्य सार्वजानिक ईकाइयों की भी यही स्थिति है। सरकारी बैंकों को आपस में विलय कर बैंकों को कम किया जा रहा है और इसके बाद इनकी कई हज़ार शाखाएँ बन्द की जानी हैं इसलिए वहाँ भी नयी नौकरियों की तादाद बहुत कम हो जाने वाली है। साथ ही वर्तमान कर्मचारियों को भी स्वैच्छिक रिटायरमेण्ट का प्रस्ताव दिया जा रहा है।

रोज़गार सृजन में भारी गिरावट और नौकरियों की कमी पर होने वाली आलोचना के बाद अब नरेन्द्र मोदी सरकार ने इस पर सोचना तो शुरू किया है। लेकिन उनके सोचने की दिशा रोज़गार सृजन के उपाय नहीं कुछ और ही है। इसे समझने के लिए नीति आयोग के उपाध्यक्ष अरविन्द पनगढ़िया का बयान आँखें खोलने वाला है, “नौकरियों पर हो रही बहस शून्य में हो रही है क्योंकि लेबर ब्यूरो के सर्वे के जिन तिमाही रोज़गार की स्थिति के आँकड़ों का ज़िक्र हो रहा है, उनमें गम्भीर समस्या है।” नीति आयोग का कहना है कि ख़ुद उनकी सरकार द्वारा जारी नौकरियों के आँकड़े भरोसे लायक़ ही नहीं हैं। पनगढ़िया ने यह भी कहा कि नीति आयोग जल्दी ही ऐसी पद्धति विकसित करने वाला है जिससे नौकरियों और रोज़गार के भरोसेमन्द आँकड़े प्रस्तुत किये जायें और इससे सिद्ध हो जायेगा कि भारत में ‘रोज़गार विहीन वृद्धि’ जैसी कोई स्थिति नहीं है! ज़ाहिर है कि नीति आयोग नौकरियाँ कैसे बढ़ाई जायें, इस पर विचार करने के बजाय इस पर विचार करने में जुटा है कि आँकड़े जुटाने का ऐसा कोई तरी़क़ा कैसे ईज़ाद किया जाये जो बताये कि देश में बेरोज़गारी की समस्या है ही नहीं और मोदी सरकार के दौर में नौकरियों की बहार आयी हुई है! (इकोनॉमिक टाइम्स, 14 जून 2017)

मार्क्स ने पूँजीवादी व्यवस्था के विश्लेषण में यह दिखाया था कि अपने प्रतियोगियों को पीछे छोड़ने और ज़्यादा से ज़्यादा मुनाफ़ा कमाने की चाहत पूँजीपतियों को निरन्तर नयी तकनीकों व प्रौद्योगिकी में निवेश करने पर मजबूर करती है, क्योंकि काम के घण्टे बढ़ाकर या काम की गति तेज़ करके मुनाफ़ा बढ़ाने की अपनी एक सीमा होती है। नयी प्रौद्योगिकी में निवेश करने से उत्पादकता में बढ़ोतरी होती है और थोड़े समय के लिए मुनाफ़े में भी वृद्धि होती है। इस प्रकार पूँजीपतियों की स्थिर पूँजी (मशीनरी, तकनीक, कच्चा माल आदि) परिवर्तनशील पूँजी (श्रमशक्ति) की तुलना में बढ़ जाती है जिसकी वजह से पूँजी का जैविक संघटन (स्थिर पूँजी व परिवर्तनशील पूँजी का अनुपात) बढ़ जाता है। श्रम की तुलना में पूँजी के पक्ष में आये इस झुकाव का अन्तरविरोधी परिणाम दीर्घावधि में मुनाफ़े की दर में आयी कमी के रूप में सामने आता है, क्योंकि श्रमशक्ति ही मूल्य का स्रोत होती है। मार्क्स ने इसे मुनाफ़े की दर में होने वाली कमी की प्रवृत्ति की संज्ञा दी थी जो पूँजीवाद में अन्तर्निहित है।

8 जून को इकोनॉमिक टाइम्स में प्रकाशित रिपोर्ट मार्क्स के उपर्युक्त सिद्धान्त की पुष्टि करती है कि आर्थिक संकट के चक्र में घिरे पूँजीपति वर्ग के सामने एक ही रास्ता बचता है कि वह ज़्यादा पूँजी लगाकर नयी तकनीक लाये और उत्पादन में श्रमशक्ति का हिस्सा कम करे। इसके लिए ही नवउदारवादी अर्थशास्त्री यह सिद्धान्त लेकर आये कि पूँजी की लागत कम होने से आर्थिक वृद्धि होती है। इसलिए जब भी आर्थिक संकट हो केन्द्रीय बैंकों द्वारा बाज़ार में और नक़दी लाओ, ब्याज़ दर को कम करो, जिससे पूँजीपति सस्ती ब्याज़ दरों  पर पूँजी जुटाकर निवेश कर सकें। जापान में तो ब्याज़ ख़त्म ही हो गया है और अमेरिका-यूरोप में ब्याज़ दर लगभग शून्य के पास पहुँच गयी है, इस दर पर वहाँ के केन्द्रीय बैंकों ने खरबों डॉलर/यूरो वहाँ के पूँजीपतियों को मुहैया कराये – ख़ूब पूँजी लगाओ, नयी तकनीक से श्रमशक्ति पर होने वाला ख़र्च कम करो अर्थात श्रमिकों की संख्या कम करो। नतीजा, और बेरोज़गारी, बाज़ार में माँग में और कमी।

भारत में भी इस वक़्त यही चल रहा है। एक रिपोर्ट कहती है कि पिछले 35 साल में रोज़गार 2% से कम सालाना बढे़ हैं, जबकि पूँजी का उपयोग सालाना 14% की दर से बढ़ा है। नतीजा बड़े उद्योगों में भी प्रति फ़ैक्टरी श्रमिक 80 से घटकर 60 ही रह गये जबकि प्रति फ़ैक्टरी पूँजी औसतन 50 लाख से बढ़कर 10 करोड़ रुपये हो गयी, क्योंकि जहाँ पहले पूँजी बढ़ाना श्रमिक बढ़ाने से महँगा पड़ता था, अब पूँजी बढ़ाना सस्ता पड़ता है। ऊपर से निजी क्षेत्र लगातार ब्याज़ दरें घटाने और नक़दी तरलता (उपलब्धता) बढ़ाने का दबाव बनाये ही रहता है, 7 जून को मौद्रिक नीति की समीक्षा में भी रिजर्व बैंक ने ऐसे ही कुछ क़दम उठाये। इसलिए इकोनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट साफ़ कहती है कि मोदी कुछ भी कहते रहें, नये रोज़गार सृजन को भूल ही जाइये। पर यह सब करने के बाद भी पूँजीवादी व्यवस्था में इस संकट का कोई समाधान नहीं है। लेकिन समस्या है मुनाफ़ा फिर भी नहीं बढ़ता तथा संकट और तीव्र होता जाता है। मिण्ट की 8 जून की ही एक रिपोर्ट के अनुसार कम्पनियों का प्रति शेयर मुनाफ़ा बढ़ नहीं रहा है। अर्थव्यवस्था में तेज़ी की उम्मीद में शेयर बाज़ार तो चढ़ रहा है लेकिन असल में मुनाफ़ा नहीं बढ़ रहा! मतलब इस संकट से बाहर निकलने का कोई उपाय सामने नहीं है।

यही वजह है कि जैसे-जैसे छँटनी और बेरोज़गारी के काले बादल भारत के उद्योग, आईटी सेक्टर व अर्थव्यवस्था के अन्य सेक्टरों पर मँडराते जा रहे हैं, वैसे-वैसे शासक वर्ग के बुद्धिजीवी और प्रचार माध्यम हमें यह समझाने में अपनी पूरी बौद्धिक ऊर्जा झोंक रहे हैं कि ऐसी गम्भीर परिस्थिति के लिए मुख्य रूप से रोबोट तथा स्वचालन की अन्य प्रौद्योगिकी जि़म्मेदार हैं। यह सही है कि कई तकनीकों में हाल में हुई खोजों में उत्पादन की प्रक्रिया में रूपान्तरण की सम्भावना निहित है जिसके परिणामस्वरूप बड़ी संख्या में लोग उत्पादन व्यवस्था से बाहर हो जायेंगे क्योंकि उनके वर्तमान कौशल की अब कोई ज़रूरत नहीं रह जायेगी। परन्तु यथार्थ के इस पहलू पर ज़ोर देते समय अक्सर यह सच्चाई पर्दे के पीछे छिपा दी जाती है कि ऐसा केवल पूँजीवादी उत्पादन सम्बन्धों के तहत होता है कि ऑटोमेशन की वजह से लोगों की आजीविका ख़तरे में पड़ जाती है। इसका असल कारण है कि आवश्यकताओं की पूर्ति न होते हुए भी क्रय क्षमता के अभाव में लोग उत्पादों को ख़रीद नहीं पाते और पूँजीवाद में एक कृत्रिम अतिउत्पादन का संकट पैदा हो जाता है अर्थात बाज़ार में माँग से अधिक उत्पादन। इसलिए उत्पादन के विस्तार में असमर्थ पूँजीवाद अपने मुनाफ़े के लिए ऑटोमेशन द्वारा छँटनी का रास्ता ही अपनाता है। जबकि उत्पादन के साधनों पर सामूहिक स्वामित्व की समाजवादी व्यवस्था में सामाजिक आवश्यकताओं की पूर्ति के मक़सद से उत्पादन के लिए एक और तो नयी तकनीकों का प्रयोग उत्पादन के विस्तार हेतु किया जा सकता है, दूसरी और काम के घण्टे कम कर लोगों का जीवन और उनकी आजीविका कठिन होने की बजाय पहले से सुगम करने के लिए। ऐसी व्यवस्था में न सिर्फ़ सभी काम चाहने वालों हेतु रोज़गार होगा, बल्कि सबके लिए काम करना भी अनिवार्य करना होगा, निठल्ले बैठकर खाना नहीं।

इसलिए जहाँ निश्चित रूप से ही मज़दूरों को पूँजी के इस हालिया हमले के ख़िलाफ़ एकजुट होकर अपनी नौकरी की सुरक्षा की माँग उठाने की ज़रूरत है वहीं यह भी ध्यान में रखना होगा कि जब तक कि उत्पादन के साधनों पर समाज के मुट्ठी भर परजीवियों का क़ब्ज़ा है, प्रौद्योगिकी में आयी किसी भी प्रगति का लाभ मुख्य तौर पर समाज की बहुत छोटी सी आबादी को होगा, जबकि समाज की बहुसंख्यक मेहनतकश आबादी की ज़िन्दगी की तकलीफ़ें बढ़ती ही जायेंगी। इसलिए मेहनतकश आबादी को एकजुट होकर इस शोषणकारी व्यवस्था को उखाड़ फेंककर उत्पादन के साधनों पर सामूहिक स्वामित्व की ऐसी व्यवस्था के निर्माण की ज़रूरत है जिसमें तकनीक व प्रौद्योगिकी में आयी किसी भी प्रगति का इस्तेमाल उत्पादन को और विस्तृत तथा श्रमिकों के काम के घण्टों में कमी करने में किया जा सके।

मूलत: मज़दूर बिगुल, जून 2017 अंक में प्रकाशित

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