भारत के 3 राजनैतिक पंथ – नेहरू , सिंह और अडवाणी

Posted by Bibhav Kumar
June 2, 2017

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भारतीय राजनीति में हो रहे फेर बदल ने मुझे काफी प्रभावित किया। मैं इसे समझने की  कोशिश कर रहा हूँ। अवश्य ही , मेरा नजरिया थोड़ा भिन्न हैं , मैं इन राजनेताओं को वर्गीकृत करने का प्रयास कर रहा हूँ। वर्गीकरण का आधार हैं राजनैतिक मूल्य और नीतियाँ। मैं किसी राजनैतिक विद्यार्थी या राजनीति के ज्ञाता के हैसियत से नहीं बल्कि एक राजनैतिक प्रेक्षक या समीक्षक के रूप में यह लेख लिख रहा हूँ। आशा करता हूँ मैं अपने विचारों को रखने में सफल रहूँ।

आर्थिक संदर्भ में राजनैतिक पंथो की विवेचना

1947, भारत की राजनीतिक आज़ादी का वर्ष, भारत के मजहब के आधार पर विभाजित होने का वर्ष। नेहरू की प्रधानमंत्री बनने की लालसा और दूसरी तरफ अड़े हुए जिन्ना। इस बात को मैं आज भी पचा नहीं पाता हूँ कि गांधी जो स्वयं को सत्य-अहिंसा का पुजारी कहते थे, इतने बड़े राष्ट्र को मजहब के आधार पर क्यों बाँट दिया। और जब इसके फलस्वरूप भीषण उत्पात मच गई तो हिंदुस्तान को धर्म-निरपेक्ष कह दिया। गांधी जी के इस कृत्य से नेहरू प्रधानमंत्री तो बन गए।

जब वक्त आया भारत की आर्थिक नीतिओं के निर्धारण का तो नेहरू ने भारत के गांव वाले ढांचे को नजरअंदाज़ कर भारत को Globalization के सड़क पे दौड़ा दिया। भारत को पश्चिमी सभ्यता के रंगीन सपने दिखाए गए। भारत तो अभी-अभी आज़ाद हुआ था, अभी तो आम लोग जश्न मना रहे थे कि अब हम आज़ाद हो गए हैं। हम शोषण से मुक्त हो गए हैं। उनको खबर भी नहीं था कि वो एक बहुत बड़ी आर्थिक गुलामी की ओर बढ़ रहे हैं। आम लोग इस बात को समझ ही नहीं  पा रहे थे कि तंत्र में कोई परिवर्तन नहीं होने वाला हैं बस शोषक वर्ग बदलने वाला हैं, पहले कुछ मुठ्ठी भर गोरे थे अब कुछ भारत के तथाकथित बुद्धिजीवी और कुछ रसूखदार लोग। ध्यान से समझिए तो लगेगा की गुलामी हस्तांतरित हो गई।

गाँवों के देश कहे जाने वाले भारत में छोटे-बड़े शहर बनने लगे। ऐसी लत लगी प्रव्रजन की जो दुर्भाग्यवश आज भी जारी हैं। जो कुछ लोगों ने जो उच्च  ज्ञानार्जन किये वो गाँव को ऐसे छोड़े कि फिर उधर दोबारा नहीं लौटे। जो गाँव नहीं छोड़ पाए मज़बूरी वश तो स्वयं को कोसते रहते हैं। गावों में एक कहावत भी काफी प्रचलित हैं ‘बी ए कके बकरी चरावता’। गावों के बारे में किसी भी सरकार ने स्थायी कदम नहीं उठाये , जो भी थोड़े बहुत काम किये गए उनका प्रभाव अल्पकाल तक के लिए ही रहा।

किसी भी राजनैतिक पार्टी ने गावों के सतत विकाश की कोई योजना नहीं अपनाई। किसी भी पंचवर्षीय योजना में गावों के देश भारत के गावों को कोई ठोस आधारभूत संरचना देने की बात नहीं की। अफ़सोस कि आज तक की सारी सरकारों ने नेहरू के उसी घिसी -पिटी आर्थिक नीतियों पर अपनी -अपनी सरकार चला रहे हैं। उसी मिश्रित अर्थव्यवस्था को ढो रहा हैं भारत और समय के साथ -साथ बस सार्वजनिक – निजी क्षेत्रो का अनुपात घटता बढ़ता रहता हैं बस।
हाँ परन्तु बीच -बीच में कभी -कभी थोड़े ठोस कदम उठाये गए जिनमें समग्र विकास वाली बात दिखी जैसे कि लाल बहादुर शास्त्री जी की नीतियाँ जो भारतीय कृषि व्यवस्था को सुदृढ़ करने का प्रयास करती हैं , परन्तु वह बहुत कम समय के लिए था।

अगर आर्थिक नीतियों के सन्दर्भ में देखें तो 2015 तक नेहरू वाला ही भारत चल रहा हैं। जिसमे मुठ्ठी भर लोग हर साल करोड़पति बनते हैं और उससे हजारों गुणे ज़यादा लोग गरीबी रेखा के नीचे जाते हैं। यह पूरी व्यवस्था ‘अपवाद के सामान्यीकरण ‘ पर आधारित हैं और बढ़ रही हैं।

एक अंतिम बात और, भारत के परिपेक्ष्य में आर्थिक सन्दर्भ में मैंने कम्युनिस्ट और समाजवाद को एक अलग पंथ नहीं समझा हैं क्योंकि नेहरू ने जिन नीतियों पर भारत को दौड़ाया वह समाजवाद से ही प्रेरित थी। तो ये भी नेहरू वाले पंथ में आ जाते हैं।

सामाजिक संदर्भ में राजनैतिक पंथो की विवेचना

इस सन्दर्भ में बात करे तो पहला पंथ तो पुनः नेहरू वाला ही हैं , जिसने या तो धर्मनिरपेछता की बात करते हैं या ग़रीबी की। बहुत बड़ी विडम्बना हैं, मैं तो दुर्भाग्य कहूँगा कि इस पंथ के लोगों ने ही इन दोनों विषयों को समय-समय पर जिन्दा किया और समय-समय पर सुला दिया। हाँ अवश्य ही अगर गरीबी रहेगी तभी तो गरीबी के नाम पर जनाधार का बनेगा , इसीलिए इनलोगों ने ग़रीबी उन्मूलन के लिए कुछ नहीं किया ताकि यह उनके लिए एक ज्वलंत मुद्दा बना रहे। करते भी क्या जिस विचारधारा पर इस राजनैतिक पंथ के लोग सफर कर रहे हैं , उसके पास इसका उपाय भी नहीं हैं। उसी प्रकार इन्होने जरुरत पड़ने पर सांप्रदायिक सौहार्द को बिगाड़ते रहे ताकि धर्म-निरपेछता वाला मुद्दा भी ज्वलंत रहे।

एक समय आया 1989 का वर्ष , वी पी सिंह ने मंडल कमीशन के रिपोर्ट को अपनी चुनावी मैनिफेस्टो का हिस्सा बनाया। इससे उनकी पार्टी को काफी फायदा हुआ। उनकी सरकार ने जाति के आधार पर जनाधार बनाने काअभूतपूर्व प्रयास किया और सफ़ल भी रहे। इसी पंथ में कई सारी क्षेत्रीय पार्टियां आती हैं जिन्होंने खुलेआम किसी खास वर्ग का हिमायती होने का दावा पेश किया। इसीलिए मैंने इसे एक राजनैतिक पंथ माना , क्योंकि यह नया प्रयोग था और सामाजिक स्तर पर सफल हुआ।

एक साल बाद ही एक नया राजनैतिक पंथ का उदय हुआ जिसे हम हिन्दू -राष्ट्रवादी भी कह सकते हैं। एल  के आडवाणी जी को मैं इस पंथ का वरिष्ठ राजनेता और सूत्रधार भी मानता हूँ। सोमनाथ से अयोध्या तक उनका रथयात्रा बहुत ही प्रशिद्ध हुआ, उन्हें सामाजिक स्तर पे जनाधार का ध्रुवीकरण करने का प्रयास सफल रहा और एक अन्य राजनैतिक पंथ का उदय हुआ।

एक बात मैं स्पष्ट कर दूँ अंतिम दोनों पंथ बस सामाजिक स्तर पर ही पहले से भिन्न हैं। इन सबने एक ही आर्थिक नीति पे काम किया जो आर्थिक नीति भारत जैसे देश के लिए पूर्ण-रूपेण एक विफलता हैं। आये दिन हम सुनते रहते हैं कि विकल्प क्या हैं ? विकल्प क्या हैं ?

लेखक : – बिभव कुमार

नोट : – उपरोक्त लेख , लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं।

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