#भूगर्भ_में_दफन_हो_गई_जिंदिगियां #लेकिन_मौत_का_सौदागर_कौन ?

Posted by Raghav Mishra
June 23, 2017

Self-Published

राजमहल परियोजना की त्रासदी को घटे एक सप्ताह हो चुके लेकिन एक सवाल सबके जेहन में आज भी टिस मार रहा है कि आखिर मौत के सौदागर कौन?
कौन है वो सौदागर जिसने चंद रुपयों को मुवावजे में देकर लाश का सौदा किया?ये एक बड़ा सवाल तो आपको लगेगा ही क्योंकि राजमहल त्रासदी भारत की ओपन कोलमाईन्स की सबसे बड़ी त्रासदी है ,और सात दिन बीत जाने के वावजूद कोई कार्यवाई नजर नही आई बावजूद इसके रेस्क्यू में भी ढील बरती गई जिसे आप “ऊंट के मुह में जीरा का फोरन कह सकते”इस हादसे में तकरीबन 93 लोग दबे हैं जिनमे 18 की लाश की पुष्टि की गई कुछ लोगों के जिन्दा होने की भी बात महालक्ष्मी द्वारा कहि जा रही है,अब बिजली की समस्या को देखते हुए ब्लैक आउट की डर दिखाकर रेस्क्यू भी स्थिर कर दी गई ,जहाँ लाशें दफन थी वहां 4लेन सड़क बन चूका,एनडीआरएफ की टीम भी आई लेकिन सिर्फ लाशें ढोने के लिए क्योंकि इन एनडीआरएफ वाले को सिर्फ बाढ़ से निपटने का अनुभव ही था ,इस परिस्थियों से निपटने के लिए भारत सरकार को क्या मुक्कमल रेस्क्यू की व्यवस्था करनी थी ये तो सरकार ही जाने ,लेकिन दफन जिंदगी आज भी चीख रही है उस काले हीरे की कोख में की आखिर मेरी मौत का सौदागर कौन ?घटना से पहले भी मजदूरों द्वारा काम को रोकने की सलाह दी गई थी ,वावजूद डर देकर काम कराया गया क्यों?ठीक तीन दिन पहले सीएमडी ने निरक्षण किया था फिर उनके द्वारा क्लीन चिट कैसे ?पी.एम.ओ से लेकर डीजीएमएस तक Ashutosh Chakraborty ने पत्र लिखकर खतरे से आगाह किया था इसपर डीजीएमएस के द्वारा पत्र के जवाब में यह था कि यह यह तथ्य विहीन है खदान पूरी तरह सुरक्षित है ।और तो और खदान को 2015 से पर्यावरण नियंत्रण से अनापत्ति प्रमाण पत्र प्राप्त नही ….और जब घटना घट चुकी तो अब आपको सिर्फ अधिकारी से लेकर मंत्री से एक बात सुनने को मिलेगी की दोषियों पर शख्त कार्यवाई होगी,इसके अलावा कुछ भी कहने से मुकर रहे हैं सभी लोग ,सरकार संवेदना देकर मुवावजे में कुछ पैसे की घोषणा भले ही कर दे लेकिन सरकार को चाहिये कि उन परिवारों को जिनका बेटा,पति,भाई इसमें दफन हो गया है उसे उसकी अस्थि भी मिल जाए ,बाहर से जो भी हो लेकिन पर्दे के पीछे भी एक अलग खेल खेला जा रहा है ..इसे आप रंगीन या हंसीन भी कह सकते हैं बाहर लोग मातम मना रहे हैं और अंदर के गलियारे यानि ईसीएल के आला अधिकारियों में लजीज व्यंजन के साथ विदेशी कीमती शराब की मांग पर मांग बढ़ रही है ,मंत्री सवालों से भाग रहे हैं …मजदूर कराह रहा है …ईसीएल अधिकारी मस्ती में हैं और प्रशासन आदेश का इंतिजार कर रही है ..यह खेल पर्दे के पीछे की है जहां इस खेल को ” मैनेज ” नाम दिया गया है ।इतनी बड़ी त्रासदी पर कुछ लोग भी पहले हरकत में आये थे ,अपनी भूमिका बाँधी थी पर ईसीएल ऐसी कम्पनी इस एक सप्ताह के खेल में सबको लाइन पर लाकर खड़ा कर दी है ,और सरकार मौन है ?सवाल यह है कि क्या मजदूरों की कीमत ऐसे ही लगाती है सरकार? या न्याय भी दिलाती है ?यह त्रासदी एक मौत का आउटसोर्सिंग की कहानी बना डाली ..लेकिन जवाब आज भी नदारत है उस सवालों का की मौत का सौदागर कौन ?
इन सवालों के जवाब ढूंढने में सरकार को कई वर्ष भी लग सकते हैं ,क्योंकि इसके बाद की कहानी कुछ ऐसे चलेगी …जाँच टीम की अलग अलग टुकड़ी मुआयना करेगी ..फिर ज्यादा दवाब आने पर इसे सीबीआई जांच का आदेश देकर अपना पल्ला झाड़ लेगी .और फिर अंततः सिर्फ कागजों पर दब कर रह जायेगी यह काला अध्याय, और फिर शुरू होगा संवेदना और श्रद्धाजंलि जिसे मोमबत्ती जला कर शांत कर दिया जायेगा …….लेकिन न ही गगन के पिता को उनके पुत्र की अस्थि मिलेगी और न ही उन परिजनों के आत्मा को शांति जिन्होंने अपना सबकुछ लूटा दिया इस खदान में ।परिजनों को भी खदान तक पहुँचने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा या वो भी इस रंगीन दुनियां के हंसीन शाम के लपेटे आकर अपने भवनाओं का भूर्ण हत्या कर दे रहे हैं ।
यह त्रासदी जितनी बड़ी है उससे भी बड़े खेल ईसीएल के अधिकारी अंदर बैठे खेल रहे हैं ।और कुछ लोगों के मन में अब भी यह बात चल रही है कि……………
“चाहता हूँ देश की धरती तुझे कुछ और भी दूँ ”
लेकिन इस खेल में चाहे जितनी भी लीपा पोती की जाय एक बात तो तय है की यह कलम तबतक नही रुकेगी जबतक आपकी हंसीन शाम को जमीन पर न ला दूँ ।

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