एक कहानी दिल्ली मेट्रो की

Posted by पर शांत
June 20, 2017

Self-Published

आंकड़ों की नज़र से दिल्ली मेट्रो जितना एक दिन में सफ़र करती उतने में तक़रीबन पृथ्वी का चक्कर लगाया जा सकता  है. इस तरह एक दिन मेट्रो में घूमना  बिलकुल वैसा ही है जैसे आप सारी दुनिया घूम रहे हो.  टेक्निकली तो शायद ये पॉसिबल नहीं लेकिन बावजूद इसके कुछ हद तक मेट्रो का सफ़र दुनिया की सैर जैसा ही है. अलग अलग रंगों में रंगे मेट्रो रूट, अपनी एक अलग पहचान लेकर पटरियों पर दौड़ते है. रोज़मर्रा दफ्तर की भीड़ से लेकर नए नवेले लोग जिनके कदम एस्कलेटर की सरकती सीढियों पर ठिठक जाते है. हर कोई इस मेट्रो के सफ़र का एक अभिन्न हिस्सा है. हर शख्स अपनी एक कहानी के साथ इस पर चढ़ता है. ऑफिस जाने वाला हर एक व्यक्ति को  सिकंदरपुर और राजीव चौक जैसी भरकस भीड़ में भी कैसे लाइन के साइड से निकलते हुए स्टील के पोल से पीठ सटा के कैसे हाफ-गर्लफ्रेंड और बाहुबली के मज़े लेने है, बखूबी पता है. टांगो के बीच में लैपटॉप बैग को सहेजना का हुनर भी महीनों की मेहनत के बाद ही निखर के आता है, यह किसी की एक दिन की कमाई नहीं. बचपन से पढ़ा है समय बहुत कीमती है इसे बर्बाद न करें लेकिन इसका अहसास तब होता है जब बढ़ते एस्कलेटर पर दौड़ लगाने के बावजूद आपके आँखों के सामने हौले से ट्रेन दरवाज़े बंद होते नज़र आयें और आप महज़ कुछ इंच दूर होकर भी उन दरवाज़ों  के उस पार अपनी मौजूदगी दर्ज नहीं कर सकें. अंत में अगली मेट्रो का इंतज़ार करना ही सही निर्णय लगता है. जिस तरह से हर रोज़ मेट्रो का सफ़र एक किस्से की तरह है ठीक वैसे ही हर मेट्रो स्टेशन भी अपने आप में एक कहानी समेटे बैठे है. ऐसे ही कुछ मेट्रो स्टेशन की कहानियां कुछ ऐसी है…

 

 

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