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योग सिर्फ व्यायाम और आसन नहीं बल्कि एक आध्यात्मिक ऊंचाई है

Posted by Abhishek Rai Sahab
June 21, 2017

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योग सिर्फ व्यायाम और आसन नहीं है। यह भावनात्मक एकीकरण और रहस्यवादी तत्व का स्पर्श लिए हुए एक आध्यात्मिक ऊंचाई है, जो आपको सभी कल्पनाओं से परे की कुछएक झलक देता है।”

योग एक प्राचीन भारतीय जीवन-पद्धति है। योग शब्द संस्कृत धातु ‘युज’ से निकला है, जिसका मतलब है व्यक्तिगत चेतना या आत्मा का सार्वभौमिक चेतना या रूह से मिलन। योग, भारतीय ज्ञान की पांच हजार वर्ष पुरानी शैली है । योग एक प्राचीन भारतीय जीवन-पद्धति है। जिसमें शरीर, मन और आत्मा को एक साथ लाने (योग) का काम होता है। योग के माध्यम से शरीर, मन और मस्तिष्क को पूर्ण रूप से स्वस्थ किया जा सकता है। तीनों के स्वस्थ रहने से आप स्‍वयं को स्वस्थ महसूस करते हैं। योग के जरिए न सिर्फ बीमारियों का निदान किया जाता है, बल्कि इसे अपनाकर कई शारीरिक और मानसिक तकलीफों को भी दूर किया जा सकता है। योग प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत बनाकर जीवन में नव-ऊर्जा का संचार करता है। योगा शरीर को शक्तिशाली एवं लचीला बनाए रखता है साथ ही तनाव से भी छुटकारा दिलाता है जो रोजमर्रा की जि़न्दगी के लिए आवश्यक है। योग आसन और मुद्राएं तन और मन दोनों को क्रियाशील बनाए रखती हैं।

हालांकि कई लोग योग को केवल शारीरिक व्यायाम ही मानते हैं, जहाँ लोग शरीर को मोडते, मरोड़ते, खिंचते हैं और श्वास लेने के जटिल तरीके अपनाते हैं। यह वास्तव में केवल मनुष्य के मन और आत्मा की अनंत क्षमता का खुलासा करने वाले इस गहन विज्ञान के सबसे सतही पहलू हैं। योग विज्ञान में जीवन शैली का पूर्ण सार आत्मसात किया गया है|

योग का इतिहास

योग की उत्पत्ति की बात करें तो वैदिक संहिताओं और वेदों में 900 से 500 बीसी के बीच तपस्वियों का जि़क्र मिलता है। योग करने वाले साधक को भी योगी ही कहा जाता है, योगी शब्द तपस्वियों के लिए भी इस्तेमाल होता है। धार्मिक मान्यताओं और ग्रन्थों में भी साधुओं और साधकों की तस्वीर में साधना के दौरान उन्हे योग मुद्रा में ही दिखाया जाता है। महात्मा बुद्ध से लेकर महावीर स्वामी और षिव को भी पद्मासन मुद्रा में दिखाया जाता है। मान्यताओं के हिसाब से योग का उपदेश सर्वप्रथम हिरण्यगर्भ ब्रह्मा ने सनकादिकों को और उसके पश्चात विवस्वान यानि कि सूर्य को दिया था। बाद में ये ज्ञान दो शखाओं में विभक्त हो गया। एक ब्रह्मयोग और दूसरा कर्मयोग। ब्रह्मयोग की परम्परा सनक, सनन्दन, सनातन, कपिल, आसुरि, वोढु और पच्चंशिख नारद-शुकादिकों ने शुरू की थी। ये ब्रह्मयोग लोगों के बीच में ज्ञान, अध्यात्म और सांख्य योग नाम से प्रसिद्ध हुआ।

वहीं कर्मयोग की परम्परा विवस्वान की है। विवस्वान ने मनु को, मनु ने इक्ष्वाकु को, इक्ष्वाकु ने राजर्षियों एवं प्रजाओं को योग का उपदेश दिया। उक्त सभी बातों का वेद और पुराणों में उल्लेख मिलता है। वेद को संसार की प्रथम पुस्तक माना जाता है जिसका उत्पत्ति काल लगभग 10000 वर्ष पूर्व बताया जाता है। वहीं पुरातत्ववेत्ताओं की मानें तो योग की उत्पत्ति 5000 ई.पू. में हुई। गुरु-शिष्य परम्परा के द्वारा योग का ज्ञान परम्परागत तौर पर एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को मिलता रहा। योग की सबसे आश्चर्यजनक खोज 1920 के शुरुआत में हुई। 1920 में पुरातत्व वैज्ञानिकों ने सिंधु सरस्वती सभ्यता को खोजा था जिसमें प्राचीन हिंदू धर्म और योग की परंपरा होने के सबूत मिलते हैं। सिंधु घाटी सभ्यता को 3300-1700 बी.सी.ई. पूराना माना जाता है। वेद, उपनिषद, भगवद गीता, हठ योग प्रदीपिका, योग दर्शन, शिव संहिता और विभिन्न तंत्र ग्रंथों में योग विद्या का उल्लेख मिलता है। सभी को आधार बनाकर पतंजलि ने 200 ई.पूर्व योग सूत्र लिखा। ये योग पर लिखा गया सर्वप्रथम सुव्यव्यवस्थित ग्रंथ माना जाता है।

योग के प्रकार

गीता में योग का कई जगह पर जिक्र मिलता है। कृष्ण ने योग के तीन प्रकार बताए हैं- ज्ञान योग, कर्म योग और भक्ति योग। जबकि योग प्रदीप में इसके दस प्रकार बताए गए हैं  1.राज योग, 2.अष्टांग योग, 3.हठ योग, 4.लय योग, 5.ध्यान योग, 6.भक्ति योग, 7.क्रिया योग, 8.मंत्र योग, 9.कर्म योग और 10.ज्ञान योग।

इसके अलावा धर्म योग, तंत्र योग, नाद योग का भी जिक्र कई ग्रन्थों में आता है। वेद, पुराण आदि ग्रन्थों में भी योग के अनेक प्रकार बताए गए हैं। अब आज के संदर्भ में हम जिस योग की बात करते हैं उसे अष्टांग योग का नाम दिया जाता है।

पतंजलि ने भी मुख्य रुप से योग के इसी रुप को महत्व दिया है। अष्टांग योग अर्थात योग के आठ अंग। यह आठ अंग सभी धर्मों का सार माने जाते हैं। ये आठ अंग हैं 1)यम (2)नियम (3)आसन (4)प्राणायम (5)प्रत्याहार (6)धारणा (7)ध्यान और (8)समाधि।

वर्तमान में योग

आज के युग में योग की परिभाषा बदल चुकी है, अब ज़माना आध्यात्म की प्राप्ति का नहीं बल्कि भौतिक सुखों के पीछे भागने का है। इसी भागदौड़ में लोग अपनी व्यस्त जीवन शैली में संतोष और स्वास्थ प्राप्ति के लिए योग करते हैं। तनाव और मानसिक शान्ति के लिए इसकी शरण में आते हैं। वर्तमान में योग को जन जन तक पहुंचाने का श्रेय बीकेएस अंयगर और बाबा राम देव को दिया जाता है। बाबा राम देव ने तो कठिन साधना माने जाने वाले योग का सरलीकरण कर इसे कस्बों और गांव में भी पहुंचा दिया। आज दूर दराज के अशिक्षित कहे जाने वाले इलाकों में भी लोग कपाल भाति और अनुलोम विलोम करते हुये नज़र आ जाते हैं।

और इस योग प्रसिद्धि के युग में एक नया अध्याय जोड़ा है देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने। पीएम मोदी ने पहली बार योग को दुनियां भर में फैलाने का बीणा उठाया। यूएन के समक्ष अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस मनाने का प्रस्ताव रखा और इस प्रस्ताव को भारी बहुमत के साथ स्वीकृति भी मिल गई। इसी 21 जून का पहला योग दिवस मनाया जा रहा है क्योंकि इसी योग की तलाश में दुनियां भर से लोग भारत आते हैं ऐसे में 21 जून पर भी दुनियां की नज़रें भारत पर ही होंगी और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी चाहते हैं कि इस दिन को यादगार बना दिया जाये हालाकि योग दिवस की सार्थकता तो तभी है जब योग को जन्म देने वाले देश में ही जन-जन को इसकी शक्ति का अहसास हो जाये और ये हमारे जीवन में एक बार फिर से रच बस जाये।

योग करें, स्वस्थ रहें

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