वोट के बदले चोट

Posted by Prateek Pandey
June 15, 2017

Self-Published

विकास की राह पर देश और प्रदेश को चलाने के नाम पर लोग से वोट माँगना तो नेताओं के लिए कोई नई बात नहीं है और ना ही हम जनता के सुनने के लिए कोई नई बात है| विकास के नाम पर जनता को बेचारी बनाने वाली सरकार अपने वादों के दम पर ही चुनाव लड़ती है |

एक दूसरे की कार्यप्रणालियों पर टिप्पणियां करना ही एक मात्र आखिरी कदम होता है जो हर सरकार के नेता करते हैं | पर क्या सिर्फ बातों के तीर चलाने से हम तरक्की की राह पर चल सकेंगे? इसका एक ही उत्तर अनेक जगहों से मिलेगा जो है ‘ना’|

सूबे में जहाँ एक ओर कई गांव अँधेरे से उजियारा पाए हुए हैं तो वहीं दूसरी ओर सड़कों की लचर स्थिति विकास के मार्ग में रोड़ा बनकर के बैठी हुई है | लड़कियां सुरक्षित बाहर नहीं घूम सकती व माँ बाप अपने जिगर के टुकड़ो को बाहर भेजने मे डरते हैं | सुरक्षा व्यवस्था से लेकर विकास की स्थिति, सब कुछ एक मोड़ पर आकर के रुक गया है ओर वहाँ से आगे बढ़ने का नाम नहीं ले रहा है | चाहे सरकार कोई भी आ जाये, लेकिन वो इस स्थिति को आगे बढ़ाने मे नाकाम है |

रोज़ सरकार द्वारा नई-नई योजनाये जनता के सामने लायी जाती है और कुछ ही दिनों तक हम प्रदेशवासियों का साथ निभाती हैं | 108 एम्बुलन्स ने तो मरीज़ो का साथ निभाते-निभाते अपना तेल ही त्याग दिया है | जी हां, अगर अब आपको कभी भी आपातकालीन स्तिथि मे एम्बुलेंस की ज़रूरत पड़ती है तो 108 को कॉल करके समय बर्बाद करने की जगह आपको खुद ही किसी निजी वाहन का इंतज़ाम कर लीजिएगा क्यूंकि 108 पर कॉल करने को आपको एक ही जवाब मिलेगा, “माफ़ कीजियेगा, गाड़ी मे तेल नहीं है “|

अन्य योजनाएं जैसे मिडडे मील, शिक्षा अभियान भी ठन्डे बास्ते मे पड़े हुए हैं | सरकार के ही सफेदपोश कानून व्यवस्ता को धता बताते हुए साड़ी सीमाएं लांग देते है और फिर अंत मे पुलिस की कार्यशैली पर सवाल उठाये जाते हैं | ‘जो वादा किया है निभाना पड़ेगा’ जैसे वाक्यों के द्वारा सरकार को उनके वादे याद दिलाए जाते हैं लेकिन नाकामी ही हाथ आती है |

अपराधों की बढ़ती तादाद जब सरकार का ध्यान अपनी तरफ खींचते है तो पुलिस अमले मे अफसरों की हेरा-फेरी की जाती है, निलंबित किये जाते हैं और अंत मे झूठे आश्वानों का दौर शुरू होता है जो जनता का गुस्सा शांत होते ही खुद भी शांत हो जाता है | मुआवजा देने का भी एक दौर आता है लेकिन क्या वो मुआवजे की रकम उन खुशियों को भर देगी जो हादसे मे छीन जाती है ? नहीं शायद कभी भीं नहीं |और अगर कोई भी सरकारी अफसर ईमानदारी से अपना काम करता है तो उसे इसका इंजाम भुगतना पड़ता है |

हर बार चुनावों के समय नेता लोग हमें कहते हैं कि अपने वोट से इस भ्रष्ट तंत्र को चोट दो लेकिन चुनाव होने एवं जीतने के बाद हमारे वोट के बदले हमें चोट मिलती है | इसलिए अब समय आ गया है सरकार तक अलग-अलग माध्यमों से अपनी बात पहुंचाने का और सरकार की आँखे खोलने का ताकि आने वाले समय में विकास, तरक्की और सुरक्षा के मामलो में हम भी अन्य देशों से कदम से कदम मिलाकर चल सके|

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