शहर बनारस, जहां हमने 100 रुपये में लस्सी में 50 रुपये में इमान बिकते देखा

Posted by Rachana Priyadarshini
June 28, 2017

Self-Published

जी हां, चौंकिए मत. यह सच है. कुछ रोज पहले पहली बार सपरिवार बनारस जाने का मौका मिला हुआ. वहां हमारे साथ ऐसे कई दिलचस्प वाकयात हुए. बनारस पहुंचने के अगले दिन सुबह हम सब काशी विश्वनाथ और अन्य मंदिरों के दर्शन के लिए निकले. हमें बताया गया था कि सुबह 9 बजे के बाद कुछेक रास्तों पर भीड़ को नियंत्रित करने के उद्देश्य से इंट्री क्लोज कर दी जाती है. सुबह उठ कर जल्दी नहा-धोकर तैयार होने के बावजूद पौने नौ बज गये. हमने फटाफट तीन ऑटो हायर किया और मंदिर के लिए निकल पड़े. बीच रास्ते में दो पुलिसवालों ने ‘नो इंट्री’ का बोर्ड दिखाते हुए जाने से रोक दिया. स्थानीय लोगों से पूछने पर पता चला कि मंदिर वहां से करीब दो किलोमीटर है. ऐसे में छोटे बच्चों और पापा-मम्मी को उतनी दूर पैदल चलवा कर ले जाना मुश्किल था. उस वक्त तक धूप भी तेज हो चली थी. हमने पुलिसवाले से बहुत मिन्नतें कीं, पर वह मानने को तैयार ही नहीं हुआ. अंत में हमारे दो ऑटोवालों ने उन्हें एक कोने में ले जाकर कुछ कहा, और फिर हमें आसानी से ‘नो इंट्री’ में इंट्री मिल गयी. रास्ते में हमने पूछा- ‘भइया, आपने ऐसा क्या उन पुलिसवालों से, जो वो इतनी आसानी से मान गये.’ जबाव मिला- ‘कहा कुछ नहीं मैडम. बस दोनों के हाथ में 50-50 रुपये के नोट थमा दिये. यह तो हमारा रोज का काम है. यहां बनारस में लगभग हर चौक-चौराहे पर ‘नो इंट्री’ को इन पुलिसवालों ने बस अपनी कमाई का जरिया बना रखा है.’ ऑटोवाले की इस बात पर मुझे तब और आश्चर्य हुआ, जब वापसी के दौरान हम कुल्हड़ वाली स्पेशल लस्सी पीने के लिए एक दुकान पर रूके. दुकानवाले से पूछा-‘लस्सी कितने की है भइया?’ उसने कहा-‘सौ रूपये में एक कुल्हड़!’

जब हम बाबा काशी विश्वनाथ के दर्शन को पहुंचे और हमें पता चला उस दिन वहां कोई नेता या मंत्री जी भी आनेवाले हैं, जिसे लेकर सिक्युरिटी कुछ ज्यादा टाइट है, तो बस यह सुनते ही हमें एक शरारत सूझ गयी. तय किया कि यूपी पुलिस की यह सुरक्षा व्यवस्था कितनी दुरूस्त है, इसका जायजा ले ही लिया जाये.
मंदिर जाने की लाइन में लगने से पहले आपको अपने सारे इलेक्ट्रॉनिक आइटम्स मसलन-घड़ी, मोबाइल, कैमरा आदि तथा पानी के बोतल वगैरह वहीं किसी दुकानवाले के पास जमा करने होते हैं. आप केवल अपना मनीबैग, पर्स और चढ़ावे की सामग्री ही भीतर तक लेकर जा सकते हैं. मेरी फैमिली मेंबर्स ने भी ऐसा ही किया, सिवाय मेरे. मैंने अपने स्मार्टफोन को साइलेंट मोड पर डाला और अपने पर्स में रख कर लग गयी लाइन में. सोचा आगे भोलेनाथ की मरजी…! मंदिर के गर्भगृह में पहुंचने से पूर्व तीन जगहों पर रोक कर चेकिंग होती है- मेटल डिटेक्टर से नहीं, बल्कि मैन्युअली. आपके पूरे शरीर पर ऊपर से नीचे हाथ फेर कर बड़े ही अजीबो-गरीब तरीके से. इस बारे में जब मैंने एक महिला पुलिसकर्मी से पूछा- ‘मैडम आपलोग मेटल डिटेक्टर क्यों नहीं रखते?’ यह सुन कर वह और वहां मौजूद अन्य कुछ और महिलाएं हंसने लगी. कहा- ‘क्यों आपको ऐसे चेक करवाने शर्म आती है क्या?’ मैंने कुछ नहीं कहा. इसे उनकी बेवकूफी कहूं या ढ़िठाई, पर यह बात सुन कर मुझे हंसी जरूर आ गयी. उसने मुझसे मेरा पर्स खुलवा कर भी चेक किया, पर अंदरवाले सेक्शन को नहीं देखा, जिसमें मैंने फोन छिपा रखा था. बाकी आगे दो जगहों पर मैंने खुद ही अपना पर्स खोल कर दिखाया और बड़ी आसानी से बच निकली. मंदिर सिक्युरिटी का ये हाल किसी वीआइपी विजिट के दिन था, बाकी दिनों में यह व्यवस्था कैसी होती होगी, इसका अंदाजा आप बेहतर लगा सकते हैं.
सुरक्षा की इस खामी के अलावा मंदिर की जर्जर हालत, मंदिर की प्रशासनिक अव्यवस्था और हर तरफ फैली गंदगी को देख कर मन बड़ा खिन्न हो गया. बाकी तो बस हर-हर महादेव…!

 

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