संत जरनैल सिंह भिंडरावाले (भाग 2)

Posted by हरबंश सिंह
June 27, 2017

Self-Published

ब्लूस्टार, इस घटना को 1984 के जून महीने के पहले हफ्ते तक ही सीमित कर दिया जाता है, लेकिन इस घटना की समीक्षा करना बहुत जरूरी है जिसमे कई ऐसे छिपे हुये तथ्य है जिनका कभी इस घटना के संबध में कभी उलेलख तक नही होगा, मसलन 1947 का हिंदुस्तान बटवारा, पंजाब राज्य का संघर्ष, शिरोमणि अकाली दल और कांग्रेस की राज्य इकाई की राजनीति, निरंकारी समुदाय और इमरजेंसी के बाद बनी जनता दल की केंद्र सरकार.

1947, के बटवारे में ऐसा कहा जाता है कि अंग्रेज सरकार ने सिख समुदाय को भी ख़ालिस्तान बनाने का न्योता दिया था लेकिन भारतीय कांग्रेस और पंजाब के शीर्ष सिख नेता गण में हुई आपसी सहमति से इसे ठुकरा दिया गया, व्यक्तिगत रूप से इतना आसान भी नही था क्योंकि सिख समुदाय पूरे भारत वर्ष में फैला हुआ था, इसकी आबादी बटी हुई थी, अगर आज भी अध्धयन करे तो पंजाब की तुलना में सिख समुदाय पंजाब से बाहर अपना जीवन बसर कर रहा है, ये आज हरयाणा, हिमाचल प्रदेश, जम्मू कश्मीर, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, गुजरात, मध्यप्रदेश में एक किसान के रूप में भी खेती से जुड़ा हुआ है, लेकिन बटवारे के समय सही मायनों में लकीर ने जँहा पंजाब और बंगाल को बाटा वही बंगाली समुदाय से ज्यादा कई गुना में पंजाब के दोनों तरफ पलायन हुआ, दोनों तरफ से लोग अपना घर, जमीन, जायदाद, सब कुछ छोड़कर हमेशा के लिये जा रहे थे, एक तरफ पंजाबी मुसलमान भारत को छोड़ कर पाकिस्तान का रुख कर रहे थे वही पाकिस्तान की और से पंजाबी सिख और हिंदू, भारत की और आ रहे थे, बटवारे की एक चिंगारी ने दोनों तरफ ऐसा आंतक मचाया जहां ओरतो की इज्जत लूटी गई, बच्चो का कतल हुआ वही लाखो की तादाद में जाने गयी, आज भी बाघा बॉर्डर पर जहां परेड होती है वहां एक बोर्ड लगा रखा है की इस पलायन में कुछ 10 लाख लोगों की जाने गयी थी.

लेकिन, इसी के पश्चात भारत में स्थापित केंद्र सरकार ने एक सिख बहुमत सूबा बनाने से भी इंकार कर दिया, जहां एक पंजाब का मतलब आज का पंजाब, हरयाणा, हिमाचल प्रदेश, चंडीगढ़, शामिल थे, यँहा सिख समुदाय को खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहा था, जहां बटवारे के जख्म अभी ताजा थे वही पंजाब राज्य की मांग जोर शोर से उठने लगी, लेकिन नेहरू का मंत्रिमंडल इस पर खामोश रहा, दरअसल एक बटवारे की मार झेल चूका भारत देश, ऐसा कुछ नही करना चाहता था जहाँ एक और लकीर इस नक़्शे पर खीचने की सूरत बन जाये, इसलिये सिख बहूसंख्यंक राज्य की मांग को अक्सर ठुकराया गया, लेकिन इस मांग ने राजनीतिक मोड़ पंजाब में ले लिया था, इसी बीच 1962 और 1965 की लड़ाई में सिख फौजियों द्वारा दिखाई गयी बेमिसाल बहादुरी के कारण केंद्र की सरकार पंजाब राज्य की मांग पर नर्म पड़ रही थी वही इसी बीच पंडित नेहरू और शास्त्री जी का देहांत हो गया, सत्ता पर काबिज हुई इंदिरा गांधी जिन्होंने 1 नवम्बर 1966 को पंजाब राज्य की मांगों को मान लिया लेकिन भाषा के नाम पर हुये इस राज्य बटवारे ने पंजाब के साथ हरयाणा और हिमाचल प्रदेश अपनी होद में आये और चंडीगढ़ पर हरयाणा और पंजाब का मालिकाना हक अलग रखकर इसे एक केंद्र शाशित प्रदेश बना दिया गया, वास्तव में यहां ऐसा कुछ नही था जिसका जशन पंजाब में मनाया जाता, क्योकि भाखड़ा नँगल डेम के साथ कई पावर प्रोजेक्ट को पंजाब से बाहर रखा गया, वही अंबाला जैसे कई प्रदेश जहां पंजाबी सबसे ज्यादा बोली जाती थी उसे राज्य हरयाणा का हिस्सा बना दिया गया, यँहा पंजाब राज्य का नागरिक खासकर सिख इसे एक और बटवारे के रूप में समझ रहा था, उसके जज्बात आहात थे, 1947 के वक़्त ख़ालिस्तान की मांग को ठुकराना, कही एक पश्याताप की शक्ल ले चुका था. (http://www.tribuneindia.com/mobi/news/comment/punjabi-suba-what-s-there-to-celebrate/292265.html), इस दौर में जब भारत में होने वाली अमूनन हर घटना के लिये अमेरिका को दोषित ठहराया जाता था, उसी तर्ज पर शिरोमणी अकाली दल पार्टी, राज्य के हितों के लिये केंद्र को कोसती थी और अपनी राजनीतिक जगह को तलाश रही थी जहाँ से इसका मार्ग सत्ता तक पहुच सके इसी तर्ज पर पानी का बंटवारा, इत्यादि मुद्दों का जन्म हुआ जहां खेती प्रधान राज्य का किसान नागरिक जज्बाती रूप से जुड़ रहा था.

इसी बीच, पंजाब के उस नेता की बात करनी भी जरूरी है, जिसने अमूमन 70 साल तक पंजाब की राजनीति पर अपना परोक्ष या अपरोक्ष वर्चस्व रखा है, लेकिन जब इनको राजनीति का अध्धयन करते है तो इस तरह के राज नेता की छवि उभर आती है जिसने अक्सर पानी की धारा के साथ साथ अपना बहाव बदल लेता है, सरदार प्रकाश सिंह बादल, बादल इनके गावँ का नाम है और ये एक रईस जिमीदार मसलन किसान है और इनका गोत्र ढिल्लों है, भारत की आजादी के बाद अपने ही गावँ से बतोर सरपंच, अपनी राजनीति का सफर शुरू करने वाले, बादल, 1957 में कांग्रेस की टिकिट से पहली बार विधायक बने थे, 1969 में ये एक बार फिर विधायक चुने गये लेकिन इस बार अकाली दल (संत) के विधायक के रूप में और अपनी सरकार में मंत्री बने, लेकिन तीथी को कुछ और ही मंजूर था, अकाली दल की इस सरकार को जिसे जन संघ का समर्थन था, 1970 में गुरुनाम सिंह को हटाकर, सरदार प्रकाश सिंह बादल पंजाब राज्य के सबसे युवा मुख्यमंत्री बन गये, लेकिन ये सत्ता कुछ महीनों तक ही रह सकी और राजनीतिक दांव में माहिर जन संघ ने सरकार यह कहकर गिरा दी की राज्य सरकार हिंदी भाषा को प्रफुलित नही कर रही वही गुरुनाम सिंह प्रांत ने अकाली दल (संत) में बगावत कर दी जिससे राज्य में राष्ट्रपति शाशन लगा दिया गया और इस के पश्चात चुनाव में कांग्रेस सरकार का गठन हुआ, 1975 में उस वक्त के राष्ट्रपति ने देश में इमरजेंसी की घोषणा कर दी, इसके पश्चात 1977 के लोकसभा चुनाव में मोरारजी देसाई भारत के प्रधान मंत्री बने जिसमे सरदार बादल बतोर मंत्री शामिल हुये, इसी के पश्चात 1977 में पंजाब राज्य चुनाव में अकाली दल और जन संघ गठबंधन को जनता ने चुना और इस सरकार के मुख्यमंत्री बने प्रकाश सिंह बादल जिनका कार्यकाल 1980 तक रहा, में बादल साहिब की राजनीतिक यात्रा का यहाँ थोड़ा रोकना चाहूंगा जिससे इसका संदर्भ ऑपरेशन ब्लूस्टार से किया जा सके.

1970, में बतोर मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल पर भरष्टाचार के आरोप लगे, जिस के कारण राज्य में स्थापित्त 1972 में कांग्रेस सरकार, जिसके मुख्यमंत्री ज्ञानी जैल सिंह थे, इन्होंने सरदार बादल पर लगे, भरष्टाचार के आरोप के तहत एक जांच कॉमिशन घटीत कर दिया जिसकी पैरवी पहले जस्टिस डी.ऐस. दवे नी की और बाद में जस्टिस एल.ऐन. छगनी ने की, इस कमसिन ने 1973 और 75 के बीच अपनी तीन रिपोर्ट को पेश किया जिसमें ऐसा कहा जाता है की सरदार बादल पर कई गंभीर आरोप लगाये गये(http://punjabimusic.xyz/PFL0M_jJ_nM/Badals%3A-A-History-of-Corruption.html), लेकिन पहले इमरजेंसी और बाद में मोरारजी देसाई की केंद्र में सरकार के चलते सरदार बादल को कही ना कही राजनीतिक सरक्षण मिलता रहा, मसलन 1977-78 में बतोर पंजाब राज्य के मुख्यमंत्री सरदार बादल जिनकी सरकार को जनता दल का समर्थन था कहने को ये जनता दल था लेकिन एक समय के सभी नेता जो जन संघ से जुड़े थे वह जनता दल में शामिल थे. और केंद्र में मोरारजी की सरकार, भरष्टचार पर कॉमिशन की रिपोर्ट, यहाँ बादल साहिब ऐसा कुछ नही कर सकते थे जिस से जन संघ मतलब जनता दल या तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री मोरारजी की नाराजगी को मोल लिया जा सके.

लेकिन अकाली दल में भी सब कुछ ठीक नही था, एक तरफ सरदार गुरचरण सिंह तोहड़ा जो लगातार 25 साल तक शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबधंक कमेटी के अध्य्क्ष रहे, इस माध्यम से ये पंजाब में राज्य सरकार के बाद दूसरी सबसे मजबूत सत्ता पर विराजमान थे ये 1984 में जिस समय ब्लूस्टार की कार्य वाही हुई थी, उस समय सरदार तोहड़ा, संत लँगोवाल और पेशे से वकील बलवंत सिंह रामूवालिया जो खुद एक राजनीतिक पहचान को तलाश रहे थे ये ब्लू स्टार के समय हरमिंदर गुरुद्वारा साहिब की परिक्रमा के बाहर बने यात्रियों की रुकने की जगह एक सराय में मौजूद थे,  वही सुरजीत सिंह बरनाला भी उस वक़्त अपनी राजनीतिक जमीन को तलाश रहे थे, ये सभी नेता गण कभी ऐसा मौका हाथ से नही जाने देते थे जब सामने वाले खेमे को नीचा ना दिखाया जा सके. (http://m.indiatoday.in/story/akali-dal-leader-prakash-singh-badal-sounds-battle-cry-against-punjab-cm-barnala/1/348661.html)

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