संत जरनैल सिंह भिंडरावाले (भाग 1)

Self-Published

शाम को अमूमन हर प्राइम टाइम न्यूज़ चैनल में, एक एंकर इंग्लिश कोट पेंट ओट टाई में सझ धज कर बैठता है, वैसे ये ड्रेस कोड आज उस मानसिकता के युद्ध की पहचान बन गया है जहाँ खुद को सही साबित करने का ही मापदंड विजयी होने का सबूत माना जाता है, यहाँ बड़ी चतुराई से एंकर के माइक्रोफोन की आवाज को ज्यादा रखा जाता है ता की अगर उसका गला बेठ भी गया हो तभी उसकी आवाज टीवी सेट के माध्यम से घर घर में गर्ज सके और उसका हर सवाल के बाद एक ट्रेड लाइन होती है Nation wants to know,  ये देश जानना चाहता है, लेकिन ये देश है किसका ? टीआरपी के इस जमाने में उसी को खबर बनाया जाता है और बहस का मुद्दा छेड दिया जाता है जिस पर हमारा देश का 80% बहुसख्यंक समाज हामी भरता हो और कही भी इस समाज की प्रतिष्ठा को चुनोती नही दी जाती, तो खबर क्या होगी ? पकिस्तान और आंतकवाद. और जून के पहले हफ्ते में, इसी समय दौरान हुये ब्लूस्टार के संदर्भ में जरनैल सिंह भिंडरावाला को एक क्रूरर आतंकवादी बताया जाता है जहाँ इस तरह छवि उभार दी जाती है कि कही भी इस किरदार में कोई ईमानदारी या नैतिकता बिलकुल भी मौजूद नही है, लेकिन शब्दो की इस खबर में सच का जामा नही पहनाया जाता क्योकि खबर को तथ्यों के रूप में नही बताया जाता फिर भी हमारा पूरा देश जरनैल सिंह भिंडरावाले को आंतकवादी की छवि के रूप में स्वीकार कर लेता है, आखिर क्यों ? (और इसी माध्यम से छुपे हुये शब्दो में एक सिख की मानसिकता को मारो काटो की छवि के रूप में उभार दिया जाता है.)

इसके लिये सबसे पहले सिख धर्म को जानने की जरूरत है जहाँ 14 वी सदी में गुरु नानक की अमृत बाणी से इसका विस्तार हुआ, ये वह समय था जब अंधविश्वास अपनी चरम पर था, जात पात का भेदभाव समाज को बाट रहा था, 1947 से पहले का भारत, कई रियासतो में बटा हुआ था, कही तुर्क का राज था तो कही हिंदू राजपूत समुदाय का, मसलन हिंदू और इस्लाम ये सबसे बङी दो आस्था इस जमीन पर मौजूद थी, गुरु नानक के एक साथी भाई मरदाना मुस्लिम समुदाय से तालुक रखते थे और एक भाई भाई बाला जो हिंदू समुदाय से, ये दोनों गुरु नानक के साथ बचपन से ही थे, गुरु नानक देव जी ने दोनों धर्म और चारो वर्णो को एक साँझा उपदेश दिया की परमात्मा एक है, वही संगत में बैठ कर गुरबाणी को जपने और पढ़ने की परंपरा को भी विकसित किया, गुरु नानक देव जी के बाद गुरु गोबिंद सिंह तक सारे सिख गुरु देह धारी हुये है, इन में से गुरु हरगोबिंद, गुरु तेग बहादुर और गुरु गोबिंद सिंह जी ने गुरबाणी के साथ साथ सिख समुदाय को शस्त्र विद्या से भी जोड़ा, वही गुरु गोबिंद सिंह जी ने अपने बाद देह धारी गुरु की परंपरा को रोक कर, ताउम्र गुरु ग्रंथ साहिब जी जो की एक ग्रंथ के रूप में है इन्हे सिख गुरु की उपाधी दी, गुरु ग्रंथ साहिब में सिख गुरुयो के सिवा संत कबीर, संत रविदास, बाबा फरीद ऐसे बहुत से संत फकीरों की गुरबाणी दर्ज है जो की समाज के अलग अलग समुदाय से आते है लेकिन परमात्मा को एक अकाल के रूप में स्वीकार किया जहां किसी भी तरह का अंधविस्वास या भेद भाव की कोई जगह नहीं है, इसी तरह पूरे मान समान के साथ गुरु ग्रथ साहिब जी को सुबह प्रकाश किया जाता है और शाम को सुहासन, और इनका निवास की जगह को गुरुद्वारा साहिब कहा जाने लगा, गुरुद्वारा साहिब में संगत के रूप में गुरु ग्रंथ साहिब की हजूरी में सिख संगत जहां गुरुबाणी का जाप करती है वही गुरुबाणी कीर्तन और विचार होते है, संगत ओर पंगत, ये फलसफा ऐसा है कि एक सिख गुरु ग्रंथ साहिब और गुरुद्वारा साहिब के साथ जज्बाती तोर पर जुड़ जाता है यही वजह है कि गुरुद्वारा साहिब या गुरु ग्रंथ साहिब पर जब भी कोई आंच या शब्दो का प्रहार होता है पूरी कॉम एक जुट होकर इसका सामना करती है, सिख विचार, इतिहास और गुरु ग्रंथ साहिब में दर्ज बाणी के अनुसार हथियार या शस्त्र, एक सिख को हमेशा साथ में रखना है और इसका इस्तेमाल कमजोर और गरीब की रक्षा के लिये ही करना है, कभी भी ताकत का जशन नही होना चाहिये, वही गुरुद्वारा साहिब का असूल है की यहाँ कोई भी किसी भी वर्ण और जाती से आ सकता है वही सिख धर्म में पुरुष और महिला में कोई फर्क नही है, एक सिख महिला वेश, भूषा, धार्मिक कारज, युद्ध में लड़ाई, वह हर जगह स्वीकार है और यहाँ सिख पुरुष और सिख महिला का एक ही स्थान है, सेवा और जाप, यही सिख धर्म के दो अग्रीम नियम है वही शस्त्र कमजोर और गरीब की रक्षा के लिये वह भी तब इसके इस्तेमाल करने की इजाजत है जब कोई और विकल्प ना रह जाये.

एक और तथ्य पांच पयारे, 1699 में गुरु गोबिंद सिंह द्वारा जब सिख पंथ को नीव रखी गयी तो गुरुबाणी का जाप कर, भीड़ में से पांच शख्स को बुलाया था जिनमें लाहौर के भाई दयाराम जो पेशे से व्यपारी थे, दूसरे  मेरठ से भाई धर्म दास जो पेशे से किसान थे, तीसरे जगन्नाथ पुरी, उड़ीसा से भाई हिम्मत राय जो की एक जल वाहक थे, चौथे द्वारका, गुजरात, से भाई मोहकम सिंह जो की पेशे से दर्जी थे और पांचवे कर्नाटका से भाई साहिब सिंह थे जो पेशे से एक नाइ थे, गुरु गोबिंद सिंह ने इन सभी को अमृत पान करवा कर, जात पात का हर सामाजिक बंधन तोड़ कर इन्हे सबसे पहले सिख मर्यादा के अनुसार सिख बनाया और बाद में इन्ही से अमृत पान करके, खुद सिख सजे. आज भी कही भी अगर गुरु ग्रंथ साहिब की शोभा यात्रा निकलती है तो पांच प्यारे के रूप में इनकी अगवाही आज भी पांच सिख करते हुये नजर आयेगे.

गुरु ग्रंथ साहिब को गुरु की गद्दी, संगत, पंगत, सर्ब सांझी गुरबाणी, हर तरह से जात पात, स्त्री पुरुष, अंध विशवास, सभी से मुक्त और किसी भी तरह किसी भी आकार मसलन मूर्ति, कबर, की नही बल्कि शब्द, की पूजा मतलब गुरु ग्रंथ साहिब की पावन गुरुबाणी, इन्ही सभी वजह के कारण आज सिख समाज कुछ 2.5 करोड़ आबादी होने के बावजूद अपनी एक न्यारी पहचान पूरी दुनिया में रखता है, सेवा का ये भाव है कि सीरिया के ग्रह युद्ध से लेकर दक्षिण अफ्रीका के गरीब देशों तक, सिख समुदाय द्वारा सेवा के भाव से मदद पहुचाई जाई रही है.

लेकिन, समय समय पर गुरु ग्रंथ साहिब और सिख धर्म पर हमले होते रहे है, 18 सदी में अब्दाली ने जहां हजारो की संख्या में कत्ले आम किया वही 17 वी सदी में मुगल साम्रज्य द्वारा, सिख के कटे हुये सर की कीमत चुकाई गयी, जहां गंगू तेली जो की जात से ब्राह्मण था, गुरु गोबिंद सिंह के छोटे साहिबजादे भाई जोरावर सिंह और भाई फतेह सिंह और गुरु गोबिंद सिंह की माता गुजरी कौर को मुगल हकूमत को चुगली कर इन्हे कैद करवा दिया, जहां मजहब इस्लाम को कबूल ना करने की वजह से छोटे साहिबजादो को दीवारों में चिनाव दिया गया और माता गुजरी कौर को शहीद कर दिया गया, सिख इतिहास कुर्बानियों से भरा पड़ा है लेकिन सेवा का ये भाव है की भाई कनैहया के रूप में जख्मी सिपाही को पानी भी पिला रहा है फिर वह चाहे सिख सिपाही हो या मुगल फोज का सिपाही, यही फलसफा है जिसके कारण आज एक सिख के मन में इर्षा और नफरत का कोई स्थान नही, और वह गुरुबाणी के इन पावन शब्द ” जिन प्रेम कियो तेन प्रभ पायो” के अनुसार इंसानियत प्रेम की ही भाषा को अपनाता भी है और यही उसे स्वीकार है.

लेकिन, आजाद भारत में भी सिख समाज की मर्यादा पर हमले होते रहे है लेकिन इस लोकतंत्र देश में जहाँ सरेआम हथियारों का प्रहार नही हो सकता, शब्दो की क्रूरता नही हो सकती लेकिन शब्दो के इशारों में, चिन्हों के रूप में, अलग अलग तरीके से इजहार किये गये.

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