समाज जँहा महिला का सन्मान है.

Posted by हरबंश सिंह
June 29, 2017

Self-Published

अगर जिंदगी के कुछ साल को भुला दू, तो ताउम्र शहर में ही रहा हूँ, इस का मुझे किसी संदर्भ में गर्व या पश्यताप नहीं है, लेकिन हमारा परिवार किसान होने सेे अक्सर बहुत सामान्य ही रहा है चाहे घर के दीवार पर लगा हुआ रंग हो या जिंदगी का रंग, जैसा था वैसा ही हमने समाज में दिखाया है कही कोई मिलावट नही थी, लेकिन एक तथ्य हमारे घर में मौजूद था, शायद किसान होना चाहे फिर ताउम्र खेती ना की हो, इसी के कारण अक्सर घर पर एक मांग रखी जाती थी की दूध तो भेस का ही लाना है, थैली वाले दूध से अक्सर कुछ बदबू सी मारती रहती थी, जिसे मैंने और मेरे भाई ने व्यक्तिगत रूप में कभी महसूस नही किया लेकिन माँ और पिता जी, अक्सर इस तथ्य पर खुश होते थे की हमारे घर में दूध भेस का ही आता है, इसी के कारण थोड़ी दूर, कुछ घर थे जिनका पुश्तैनी पेशा पशुपालन ही था वहा से शाम को दूध को लाना शुरू हुआ, ये रिश्ता लगभग 1982 से लेकर 2014 तक, इसी तरह बिना रोक टोक चलता रहा, इसी वजह से इस गुजराती समुदाय से घर जैसे रिश्ते बन गये थे.

जब इस समुदाय को नजदीक से जानने को मिला तो काफी रोचक बाते पता चली, मुख्यतः इन्हे “रबारी” कहा जाता है, हिंदू धर्म को मनाने वाला ये समुदाय, इनका मुख्य वयवसाय पशुपालन ही है जिसे ये सदियों से करते आ रहे है, वैसे तो ये समुदाय लगभग उत्तर भारत के कई राज्यो में अपनी मौजूदगी रखता है लेकिन उत्तर गुजरात और राजस्थान के कई जिलो में इनकी आबादी बहुत ज्यादा है, टैक्सी चलाने के दौरान एक बार इन्हे पाटण भी लेकर गया था, पाटन गुजरात का उत्तरी जिला है, यँहा रबारी समुदाय अच्छी खासी आबादी में है, यँहा ये पशुपालन के साथ साथ खेती और दूसरे व्यवसाय भी करते है, शायद दरबार के बाद रबारी ऐसा दूसरा गुजराती समुदाय होगा जो अपनी मौजूदगी आर्मी और बाकी के सुरक्षा बल में भी करवाते है, मसलन जमीन से जुड़ा हुआ एक बहादुर और ताकतवर समुदाय की पहचान रबारी समाज आज भी रखता है, जिंदगी यँहा आज भी पुशतैनी लिबास और ढंग में देखने को मिलती है जँहा पुरुष धोती, कुर्ता और सर पर पगड़ी बांधते है वही महिलाये भी अपने पुश्तैनी साडी में रहती है, लेकिन समाज आधुनिकता कोभी अपना रहा है जिसके तहत व्यक्तिगत पुरुष लिबास में शर्ट,जीन्स, टीशर्ट ओर पेंट अपनाये जा रहे है वही महिला लिबास में शूट, सलवार, जीन्स, टीशर्ट भी आ गये है. मेने यहाँ कभी भी औरत को पर्दा करते हुये नही देखा, लेकिन जो सबसे ज्यादा सरहानीय तथ्य मुझे इस समाज में लगा वह था औरत की आजादी, बहुत से कथनों में यँहा औरत अमूमन बाकी के समाज से ज्यादा आजाद और अपने अधिकारों के प्रति जागृत है.

मैं व्यक्तिगत रूप से कई साल, रबारी समुदाय के घरों के सामने से जानेवाली गलियों से गुजरा हूँ, मेने यँहा कभी भी घेरलू हिंसा नही देखी, ना कभी ओरत पर हो रहे जुल्म को देखा है, यँहा शादी पर बारात भी साधारण आती है कही कोई ढोल नगाड़े नही सुने और ना ही इन घरों में कभी देखा है की बेटे के होने पर खुशी मनाई जाती हो वही बेटी के होने पर दुःख, संतान में फर्क नही है, इसलिये ही इस समुदाय में लिंग अनुपात कभी चिंता का विषय नही रहा, हर घर में बेटा और बेटी दोनों एक समान स्वीकार है. यँहा विषय से हटकर भी एक तथ्य रखना चाहता हूँ की आज गुजरात में भी लिंग अनुपात में काफी कमी आ रही है जँहा उत्तर भारत के कई राज्यो में ये एक गंभीर समस्या है वही गुजरात राज्य में पटेल समुदाय भी इसी की चपेट में आ रहा है, जँहा लिंग अनुपात कम होता जा रहा है वजह बेटी को एक संतान के रूप में कबूल ना करना, यही एक वजह है कि गुजरात का धनाढ्य समाज पाटीदार आज शादी के लिये दुल्हन की तलाश ओडिशा के गाँव, कस्बो और शहरों में कर रहा है (http://m.hindustantimes.com/india/not-just-quotas-sex-skewed-patel-community-also-long-for-brides/story-KbBjNWIbPV0ioGjyf3JxiM.html)

खेर हम वापस रुख करते है रबारी समाज की और, रबारी समाज में बचपन में ही शादी कर दी जाती है, अगर कानून का चश्मा लगाकर देखेगे तो ये भी गैरकानूनी है लेकिन समय रहते और शिक्षित हो रहा नोजवान इस कुरीति को भी अपनाने से मना कर रहा है, आज कई ऐसे नोजवान इस समुदाय में मौजूद है जो बाल विवाह के इस चलन पर अपनी नाराजगी भी व्यक्त करते है और वह परिपक्व उम्र में अपने जीवन साथी को चुनने में ही यकीन कर रहे है, समय रहते बाल विवाह की कुरीति हमारे समाज से दूर हो रही है. लेकिन बाल विवाह बस एक रिवाज ही है यँहा और दुल्हन का गोना, तभी किया जाता है जब लड़का और लड़की जवान हो जाये, शादी में बारात या गोना पर समुदाय की जमावट बहुत सिमित होती है मसलन कुछ 10 या 11 बाराती, स्वागत भी सामान्य, खाना भी घर पर बनाया जाता है, व्यक्तिगत रूप से मैंने नहीं देखा की यँहा शादियों में कोई हलवाई लगा हो या मंडप को सजाया गया हो, बस थोड़ी सी चहल पहल से ही इसका अंदाजा लगाया जा सकता है कि जस घर में शादी है या गोना है, लेकिन एक तथ्य जो सबसे ज्यादा अचंभित करने वाला है, वह है की यँहा दहेज नही है, वही कुछ राशि जो की मामूली और ज्यादा हो सकती है, वह लड़के वालों को लड़की के परिवार को देनी होती है, और लड़की मसलन दुल्हन कुछ 5 तोले से ज्यादा के चांदी या सोने के गहने ही पहन सकती है. वही सामूहिक विवाह की भी प्रथा है जिससे काफी खर्च कम हो जाता है, वही शादी में अनबन के चलते, लड़की को भी दूसरी शादी करने का उतना ही अधिकार है जितना की इस समाज के एक पुरुष को. और हर बार शादी पर लड़के वालों को एक तयशुदा या नकी की गयी रकम लड़की के परिवार को देनी होती है (http://m.indiatoday.in/story/in-a-rapidly-changing-world-rabari-tribals-cling-to-their-customs-with-defensiveness/1/372050.html)

अगर इसी संदर्भ में थोड़ा और गूगल करे तो तमिलनाडु के नीलगिरी जिलै में एक समुदाय है badaga, इस समुदाय में भी दहेज़ प्रथा नही है, आपसी सहमति से तलाक या जोड़े के अलग होना स्वीकार है वही एक औरत को फिर से शादी करने का अधिकार है जिसे समाज में कही भी अपमान जनक नही माना जाता. वही समाज में कही भी विधवा अस्वीकार नहीं है, एक विधवा आम औरतों की तरह अपना जीवन बसर कर सकती है, ये समुदाय मुख्यतः खेती प्रधान होने के कारण यँहा महीला घर और खेती दोनों जगह एक समान मेहनत में हाथ बटाती है. इस समाज एक तरह से महिला प्रधान समाज कह सकते है. (https://www.indiantribalheritage.org/?p=16376)

उत्तर पूर्वी राज्य, हमारे उत्तर भारत में देश के हिस्से के प्रति एक अलग ही छवि है लेकिन जिस तरह उत्तर पूर्वी राज्य की महिलाये हमारी राजधानी और देश के अलग अलग हिस्सो में रहती है, इनसे इनकी आजादी का अनुमान लगाया जा सकता है, ये महिलाये हर जगह कार्यगत है, मेट्रो हो या बस समाज में अकेली घूमती है, कही कोई ड़र की परछाई नही, अगर हम उत्तर पूर्व राज्य के समाज की रचना को देखेगे तो पता चलेगा की यँहा एक महिला बाकी के देश से बहुत ज्यादा आजाद, निडर और जागृत और शिक्षित है. और समाज के हर वर्ग में फिर वह सुरक्षा बल हो या राजनीति ये हर जगह मौजूद है. चाहे वह आसाम के चाय के बाग़ हो जँहा उत्तम चाय की पत्तियों की पैदावार होती है या मेघालय के चावल के खेत, यँहा महिला घर के साथ हर काम में बराबर की हिस्से दारी निभाती है, जँहा ये पुरुष के बराबर मेहनत कर पैसा कमाती है, परिवार को सहाई होती है वही ये किसी पर निर्भर ना रहकर खुद पर निर्भर रहती है, यँहा भी सामाजिक बुराइयां दहेज, हॉनर किलिंग, गर्भ में लिंग परीक्षण और शिशु की हत्या जैसे कथित घोर अपराध समाज में कही भी मौजूद नही है इसलिये यँहा पुरुष और महिला की जनसंख्य का अनुपात लगभग समान है. (http://www.indianyouth.net/women-in-northeast-india/)

आज हम अगर इन तीनो वर्ग कथन रखे जो रबारी समाज के रूप में गुजरात, हमारे देश के पश्चिम में मौजूद है वही दक्षिण में badaga समुदाय और भारत के पूर्वी राज्य की महिला आज सुरक्षित भी है और शिक्षित होने के साथ साथ जागृत भी है, इसके लिये अगर कोई बधाई का पात्र है तो समाज, जिसकी रचना ही ऐसी है जँहा महिला और पुरुष में कही कोई फर्क नही है, अब जब हमारे देश के बाकी के हिस्से में महिला असुरक्षित है, उसके बहुत से कारण हो सकते है जिसका अध्धयन करना बहुत जरूरी है लेकिन यहाँ इस तथ्य को भी सोचना होगा की हमारे समाज की रचना ही तो ऐसी नही जँहा महिला असुरक्षित है, अगर हां तो एक महिला को इस पर पहल करनी होगी क्योंकि पुरुष प्रधान समाज में पुरुष कभी नहीं चाहेगा कि समाज में कोई भी ऐसा बदलाव आये जिससे समाज पर उसके मालिकाना हक को कोई चुनोती दे सके.

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