हिंदी को नही, हिंदी की मानसिकता को नकारा जा रहा है.

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नोट: हिंदी भाषित प्रदेश का नागरिक इस लेख को धैर्य से पढ़े, बहुत ध्यान से पड़ने से मानसिकता को ठेस पहुच सकती है, रक्त चाप बढ़ सकता है, माथे पर पसीना आ सकता है, बजाय मुझे नकारने के, तथ्यों पर ध्यान दे. धन्यवाद.

मैं कौन हूँ ? अगर इस सवाल के साथ-साथ बैक ग्राउंड म्यूजिक के रूप में विशाल भारद्वाज द्वारा निर्देशित फिल्म कमीने के एक गीत की मुख्य धुन “धैटैंन धैटैंन …” बजा दी जाये जिस को संगीत भी विशाल।भारद्वाज ने दिया तो क्या गुन्हा है? वैसे इस फिल्म का नाम एक अपशब्द की तरह लगता है लेकिन इसी फिल्म में एड्स के खिलाफ काफी जागरूकता दिखाई गयी है वही भाषा के दम पर हो रहे भेद भाव पर भी चुटकी ली गयी है, 2009 में आई इस फिल्म को एक बार तो जरूर देखना चाहिये।

खेर मैं मेरे सवाल पर वापस आता हूँ कि मैं कौन हूँ? मेरा ये सवाल व्यक्तिगत नही है, यहाँ मैं भाषा के माध्यम से ये सवाल करना चाहता हूँ कि मैं भाषा कौन हूँ ? तो ज़ाहिर सा तथ्य है हम यही कहेंगे की भाषा मुख्यतः सवांद का जरिया है जो अक्सर कम से कम दो व्यक्ति या किसी समहू में दो से ज्यादा व्यक्ति इसे सवांद के माध्यम में उपयोग करते है ता की अपने विचार, सोच , कथन दूसरे व्यक्ति तक आसानी से भाषा के माध्यम से कह पाये वही दूसरी तरफ सुनने वाला व्यक्ति भी इसे भाषा के माध्यम से ही आसानी से समझ पाये, ये भाषा ही है जो हर रिश्ते में सवांद का काम करती है मसलन विद्यालय में शिक्षक और विद्यार्थी, घर पर माँ और संतान, बहन और भाई, पत्ती और पत्तनी, इत्यादि हर रिश्ते में भाषा मौजूद है वही मंदिर में हो रही आरती, मस्जिद में अंजान, ग्ररूद्वारा साहिब में गुरबाणी, इन सब का उच्चारण भी भाषा के माध्यम से हो रहा है.

इन्ही सभी तथ्य से ये कहा जा सकता है की भाषा ही समाज का अक्स है, हमारी मानसिकता ही शब्दों के माध्यम से भाषा का आकार लेकर हवा में गूंजती है, वैसे तो भारत वर्ष में अनेकों प्रदेशिक भाषा बोली जाती है लेकिन भारत की पहचान हिंदी से ही है, अगर सही अर्थों में कहे की हिंदी ही भारत की मानसिकता, अक्स है तो गलत नही होना चाहिये, व्यक्तिगत रूप से मैं सोचता भी हिंदी भाषा में हूँ, लेकिन जिस तरह से आज हिंदी को हमारे ही देश, समाज, शिक्षा,  में नकारा जा रहा है क्या वास्तव में इसके लिये हिंदी भाषा जवाबदार है या वह देश, समाज जिसकी पहचान हिंदी है, वह जवाबदार है और हिंदी के माध्यम से इसी समाज को आज नकारा जा रहा है. क्या हिंदी बोलने वाले व्यक्ति से लोग इसलिये कन्नी कतराते है की हिंदी भाषा के माध्यम से वह हमारे समाज की दोहरी मानसिकता को कबूल नही करते जहाँ मौजूद पितृसत्ता, जात-पात, अंधविश्वास, पुरुष प्रधान समाज जँहा औरत को देवी की उपाधि देकर पूजनीय बनाया जाता है लेकिन वास्तव में वह इज्जत के नाम पर गुलाम ही है जहाँ वास्तव में औरत के लिये समाज और घर में बंदिशे ही है, और इसका सबसे कठोर सच जिसे हम कभी स्वीकार नहीं करते की वास्तव में हिंदी भाषा और बाकी की प्रदेशिक भाषा में दी जाने वाली गालिया / अपशब्द ****, *******, जहाँ औरत को ही अपमानित किया जाता है और उसका शोषण भी होता है लेकिन इन सभी अपशब्दों को बोलने का अधिकार सिर्फ पुरुष समाज के पास है अगर इन्हे एक औरत ने कहना शुरू कर दिया तो वह हमारे समाज को स्वीकार नही होती, सही शब्दो में कहे तो बरदरसाता नही होती, ये सारे तथ्य समाज की मानसिकता को खोखला बताने के लिये काफी है. मसलन हिंदी नही हमारी समाज की।मानसिकता को आज संभलने की जरूरत है.

फिल्म हिंदी मीडियम आज काफी वाह वाही बटोर रही है लेकिन वास्तव में ये कहानी एक सरकारी स्कूल और प्राइवेट स्कूल के बीच सिमट कर रह जाती है और इसी केंद्र बिंदु में समाज के दो प्रतिपक्ष मतलब क्लास उभर कर आते है एक वह क्लास जो अमीर है
हिंदी प्रदेशीत नागरिक को एक दर्शक के रूप में इस फिल्म से जोड़ने के लिये यहाँ इंग्लिश को बोल रहे वर्ग में हिंदी को घृणा का पात्र बताया गया, जो अमूमन इतना सच नही है.

लेकिन यहाँ पुरुष और महिला को एक समान आदर मिल रहा है, कही भी बेटे और बेटी में फर्क नही होता, यहाँ कही भी कोई भी सामाजिक बंदिश नजर नहीं आती, और छुपे हुये शब्दो में इनका मानना है की ये वास्तव में आजाद है, अपने जीवन को समर्पित है इसलिये ही ये कामयाब है शायद इसलिये ही यहाँ बच्चो को हिंदी बोलने से रोका जा रहा है इसके पीछे का तथ्य यहाँ गैरमौजूद है लेकिन ये हिंदी के माध्यम से या किसी और प्रदेशिक भाषा के माध्यम से सामाजिक कुररीतियो को अपनाना नही चाहते. ये उसी तथ्य की तरह है की इंग्लिश अखबार में छपी खबर पर अक्सर जनता सच्चाई की मोहर लगा देती है परंतु हिंदी अखबार की खबर पर शंका बनी रहती है.

वही समाज का एक दूसरा तबका है जहाँ गरीबी अपना उग्र रूप दिखा रही है, चिकन गुनिया और डेंगू के मच्छर यहाँ आम है, रोज दिहाड़ी करता मजदूर वर्ग, फिल्म में दिखाया गया हैं की जब फिल्म के मुख्य किरदार इस बस्ती में आते है तो किस तरह लोग उनकी मदद के लिये दौड़तै है, वास्तव में यहाँ खुद की मौजूदगी दर्ज करवाने की कोशिश है. अगले ही सीन में फिल्म की सहकलाकार फिल्म की नायिका को बताती है कहाँ लड़ना है और कहा नहीं, मसलन पानी की लाइन में लड़ाई जायज है वही राशन की दुकान पर खाखी वर्दी के साथ नहीं, यहाँ फिल्म के माध्यम से बताया गया है कि आज भी यहाँ औरत पल्लू में रहती है और फिर चाहे गरीबी ही क्यों ना हो लेकिन औरत का बाहर जाकर काम करना मंजूर नहीं है, पितृसत्ता, व्यवस्था की गुलामी, अंधविश्वास, पुरुष प्रधान समाज, यहाँ वह सब मौजूद है जो एक जिंदगी की मानसिकता को गुलाम बना कर रख सके. यहाँ इतना सा भी उजाला नही दिखाया गया जहाँ यहाँ पर रहने वाला इंसान अपने नागरिक अधिकारों के लिये जागरूक हो.

एक समझदार दर्शक के लिये छुपे हुये शब्दो में फिल्म चोट तो करती है मसलन एक दृश्य में श्याम प्रशाद कहता है की वह पुश्तैनी गरीब है उसके पिता जी, दादा जी, सभी गरीब थे, व्यंग के माध्यम से यहाँ दर्शक मुस्कुराकर इस तथ्य को नही समझ पाता की क्यों ये पुश्तैनी गरीब है? आज हलात एक मानवीय जीवन के लिये कठिन हो सकते है लेकिन सदियों से ऐसे हालात तो नही थे, फिर भी गरीबी क्यों ? शायद इसका जवाब होगा की मानसिकता की गुलामी. लेकिन श्याम प्रशाद इस गरीबी से निजात पाने के लिये जो रौशनी देख रहा है वह है उसके बेटे की शिक्षा लेकिन प्राइवेट स्कूल में पढ़ाई जाने वाली विद्या इंग्लिश भाषा में. यहाँ वह दबी जुबान में अपनी गरीबी के लिये हिंदी भाषा मसलन हमारे समाज की ही मानसिकता को बता रहा है.

क्योकि हिंदी भाषा में परोसा जा रहा ज्ञान हिंदी समाज की ही मानसिकता तक सीमित रह जाता है वही इंग्लिश में ज्ञान का मतलब पूरे विश्व की अच्छाई और बुराई, सबका ज्ञान, शायद इसलिये आज हिंदी पढ़ने और लिखने वाले व्यक्ति से ये सहज मान लिया जाता है कि वह हमारे समाज की रूढ़िवाद सोच को स्वीकार कर रहा है वही इंग्लिश में लिखना और पड़ना समाज को स्वीकार होने के साथ-साथ इसकी व्यक्तिगत सोच को भी पहचान दिलवाती है और ये सोच हमारे सामाज की रूढ़िवाद सोच से बिलकुल विपरीत है.

इस लेख की शुरुआत फिल्म के उदाहरण से थी तो इसका अंत भी फिल्म के उदाहरण से ही करूँगा, फिल्मकार गुलजार की अमूमन हर फिल्म समाज की कुरीतियों को कटाक्ष करती है ऐसी ही इनकी एक फिल्म थी हु-तू-तू जहाँ फिल्म की नायका तब्बु फिल्म के नायक सुनील शेट्ठी से एक सवाल करती है की हमारे कहे जाने वाले सारे अपशब्द एक औरत पर ही क्यों कटाक्ष करते है, पुरुष पर क्यों नही? इसी सवाल का जवाब है की आज हिंदी को नही नकारा जा रहा अगर नकारी जा रही है तो हमारे समाज की रूढ़िवाद सोच, यहाँ इस सोच, मानसिकता को बदलने की जरूरत है, हिंदी भाषा अपना मान सम्मान अपने आप पा लेगी.

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