फ़ैसले का हक़

Posted by Pratiksha Shahi
June 6, 2017

Self-Published

प्राचीन काल में हर्षवर्धन नाम के एक राजा हुआ करते थे। एक बार राजा हर्षवर्धन युद्ध में हार गए और हथकड़ियों में उन्हें जीते हुए पड़ोसी राजा के सम्मुख पेश किए गए। पड़ोसी देश का राजा अपनी जीत से प्रसन्न था और उसने हर्षवर्धन के सम्मुख एक प्रस्ताव रखा…

यदि तुम एक प्रश्न का जवाब हमें लाकर दे दोगे तो हम तुम्हारा राज्य लौटा देंगे, अन्यथा उम्र कैद के लिए तैयार रहें।

प्रश्न है.. एक स्त्री को सचमुच क्या चाहिए होता है

इसके लिए तुम्हारे पास एक महीने का समय है।  हर्षवर्धन ने यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया..

वे जगह जगह जाकर विदुषियों, विद्वानों और तमाम घरेलू स्त्रियों से लेकर नृत्यांगनाओं, वेश्याओं, दासियों और रानियों, साध्वी सब से मिले और जानना चाहा कि एक स्त्री को सचमुच क्या चाहिए होता है  किसी ने सोना, किसी ने चाँदी, किसी ने हीरे जवाहरात, किसी ने प्रेम-प्यार, किसी ने बेटा-पति-पिता और परिवार तो किसी ने राजपाट और संन्यास की बातें कीं, मगर हर्षवर्धन को सन्तोष न हुआ।

महीना बीतने को आया और हर्षवर्धन को कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिला..

किसी ने सुझाया कि दूर देश में एक जादूगरनी रहती है, उसके पास हर चीज का जवाब होता है शायद उसके पास इस प्रश्न का भी जवाब हो..

हर्षवर्धन अपने मित्र सिद्धराज के साथ जादूगरनी के पास गए और अपना प्रश्न दोहराया।

जादूगरनी ने हर्षवर्धन के मित्र की ओर देखते हुए कहा.. मैं आपको सही उत्तर बताऊंगी परंतु इसके एवज में आपके मित्र को मुझसे शादी करनी होगी ।

जादूगरनी बुढ़िया तो थी ही, बेहद बदसूरत थी, उसके बदबूदार पोपले मुंह से एक सड़ा दाँत झलका जब उसने अपनी कुटिल मुस्कुराहट हर्षवर्धन की ओर फेंकी ।

हर्षवर्धन ने अपने मित्र को परेशानी में नहीं डालने की खातिर मना कर दिया, सिद्धराज ने एक बात नहीं सुनी और अपने मित्र के जीवन की खातिर जादूगरनी से विवाह को तैयार हो गया

तब जादूगरनी ने उत्तर बताया..

स्त्रियाँ,स्वयं निर्णय लेने में आत्मनिर्भर बनना चाहती हैं।

यह उत्तर हर्षवर्धन को कुछ जमा, पड़ोसी राज्य के राजा ने भी इसे स्वीकार कर लिया और उसने हर्षवर्धन को उसका राज्य लौटा दिया

इधर जादूगरनी से सिद्धराज का विवाह हो गया, जादूगरनी ने मधुरात्रि को अपने पति से कहा..

चूंकि तुम्हारा हृदय पवित्र है और अपने मित्र के लिए तुमने कुरबानी दी है अतः मैं चौबीस घंटों में बारह घंटे तो रूपसी के रूप में रहूंगी और बाकी के बारह घंटे अपने सही रूप में, बताओ तुम्हें क्या पसंद है

सिद्धराज ने कहा.. प्रिये,यह निर्णय तुम्हें ही करना है, मैंने तुम्हें पत्नी के रूप में स्वीकार किया है, और तुम्हारा हर रूप मुझे पसंद है ।

जादूगरनी यह सुनते ही रूपसी बन गई,उसने कहा.. चूंकि तुमने निर्णय मुझ पर छोड़ दिया है तो मैं अब हमेशा इसी रूप में रहूंगी, दरअसल मेरा असली रूप ही यही है।

बदसूरत बुढ़िया का रूप तो मैंने अपने आसपास से दुनिया के कुटिल लोगों को दूर करने के लिए धरा हुआ था ।

अर्थात, सामाजिक व्यवस्था ने औरत को परतंत्र बना दिया है,पर मानसिक रूप से कोई भी महिला परतंत्र नहीं है।

इसीलिए जो लोग पत्नी को घर की मालकिन बना देते हैं,वे अक्सर सुखी देखे जाते हैं। आप उसे मालकिन भले ही न बनाएं, पर उसकी ज़िन्दगी के एक हिस्से को मुक्त कर दें। उसे उस हिस्से से जुड़े निर्णय स्वयं लेने दें।

आज देश में सामाजिक और राजनैतिक स्तर पर तीन तलाक़ जैसे संवेदनशील मुद्दे पर बहस छिड़ी हुई है। पर क्या कुछ लोगों की सोच बदल जाने से हमारा समाज, जो कि  ख़ुद को एक आदर्श के तौर पर देखता है, वो औरत को बराबर का दर्ज़ा दे पायेगा। पहले की तुलना में महिला को पढाई और नौकरी करने की छूट देकर किस झूठे दम्भ में ये समाज आधुनिक होने का दावा करता है। औरत की रज़ामंदी के बग़ैर तलाक चाहे देश के कानून के अनुसार दिया जाए या धार्मिक मानदंडों के अनुसार, दूसरी शादी तो किसी औरत से ही की जायेगी न। एक तरफ़ औरत को आप परचून की दुकान पर बदल दी जाने वाली वस्तु की तरह देखते हैं और दूसरी ओर इक्कीसवीं सदी के प्रगतिशील नागरिक की उपाधि से ख़ुद को नवाज़ कर बेशर्मी की हर हद पार कर जाते हैं। ये दोहरा चरित्र नहीं तो और क्या है। शादी और तलाक़ – ये दोनों इंसान के जीवन के निजी मामले होते हैं। लेकिन अगर किसी धर्म विशेष की ही बात की जाए तो जब उपरवाले की नज़र में उसके सारे बन्दे एक समान हैं तो फिर शादी जैसे पाक़ रिश्ते में बिना किसी तर्कसंगत कारण के ऐसा हावी हो जाने का अधिकार सिर्फ़ एक को क्यों।

आमतौर पर दिन भर में महिला सशक्तिकरण वाले ऐसे कई मैसेज हमारी आँखों के सामने से गुज़रते हैं और हम उन्हें अपने चंद दोस्तों को फॉरवर्ड करके फ़िर से निजी और व्यवसायिक जीवन के उलझनों को सुलझाने में व्यस्त हो जाते हैं। पर इस मैसेज को पढ़ने के बाद मेरे मन में कुछ सवाल उठे जो मै आपसे बाँटना चाहती हूँ।

क्या आज भी औरत के एक या पूरे हिस्से को ये समाज मुक्त कर पाया है। और अगर औरत मुक्त हो चुकी है तो क्या इस मुक्ति को सकारात्मक्ता के साथ अपनाया गया है । क्या ये सच नहीं है कि अपनी योग्यता के बावजूद भी समाज द्वारा दी गयी मुक्ति को ही औरत की सफलता का मूलमंत्र माना जाता है। एक हिस्सा हो या पूरा, क्या हर बार औरत पर समाज या पुरुष द्वारा मुक्त किये जाने की मोहर लगना ज़रूरी है ।

बचपन में माँ के प्यार के साथ औरत को पिता का संरक्षण मिलता है। भाई के रूप में एक ऐसा दोस्त मिलता है जो जीवन के हर मोड़ पर पिता की सरंक्षणवादी रूप की छाया बनकर उसके साथ खड़ा रहता  है। समाज में एक सम्मानजनक ओहदा और अपने पैसे  होने के बावजूद भी औरत के लिए पति का घर दूसरा सबसे सुरक्षित स्थान माना जाता है। और इस सुरक्षित स्थान की महत्ता और गारंटी तब और ज़्यादा बढ़ जाती है जब औरत बेटे की माँ बनती है। बेटी की माँ बनना शायद इस सुरक्षाचक्र को और मज़बूत न बना पाए। ऐसा दो कारणों की वजह से हो सकता है। पहला ये कि मुक्ति के इंतज़ार में पूरा जीवन निर्भरता के सहारे बिताने वाली दूसरी औरत का जन्म हो चूका होता है और दूसरा बेटा – जो इस सुरक्षा घेरे का सबसे मज़बूत रक्षक होता है उसे पैदा करने के लिए औरत शायद ही कभी माँ के बजाये मादा बने रहने की ज़िम्मेदारी से मुक्त हो पाए।

हमारा समाज किस प्रकार के परिवर्तन से गुज़र रहा है, इसे समझना कई बार मुश्किल हो जाता है। कई बार परम्परावादी और आधुनिक सोच के बीच  झूलते इस समाज की नैतिकता और औरत के प्रति इसका दोहरा रवैया परेशान करता है। औरत के प्रति दोहरे मानदंडों का लिजलिजापन ये सवाल उठता है कि क्या आज तक समाज औरत के प्रति अपने दोहरे चरित्र से मुक्त हो पाया है। क्या ये समाज उन मानसिक और वैचारिक मानदंडों से मुक्त हो पाया है जो उसे औरत के एक या पूरे हिस्से को मुक्त करने की आज़ादी देते हैं। क्या ये समाज घर के हर मामलों में  पति और पत्नी को एक समान दर्जा दे पाया है। क्या ये समाज प्रोफेशनल  तौर  पर लिंगभेद से ऊपर उठ कर अपनी योग्यता के कारण औरत को एक कुर्सी समझते हुए उसके आदेशों को मानने के लिए ख़ुद को तैयार कर पाया है। क्या ये समाज आज भी औरत के द्वारा लिए गए फैसलों में असफ़लता की ज़्यादा संभावनाओं को ढूंढने के अपने अतिआत्मविश्वास से भरे नज़रिये को बदल पाया है।

एक औरत के तौर पर मै जितना इन सवालों के जवाब ढूढ़ने की कोशिश करती हूँ ,हर बार मेरे सामने कई और नए सवाल आकर खड़े हो जाते हैं। क्या ये समाज कभी भी अपनी दोहरी सोच के परिधि से बाहर आ पायेगा। आखिर कब तक़ आधुनिकता की चादर के अंदर रूढ़िवादी सोच का चोगा पहने ये समाज खुद को प्रगतिशील होने का दिखावा करता रहेगा।

आज भी हमारे समाज का एक वर्ग ऐसा है जिसे बहु चाहिए लेकिन बेटी नहीं। ये सच है कि आज पढाई और नौकरी को लेकर समाज के लगभग हर वर्ग में बेटे और बेटी के बीच का फ़र्क़ धीरे धीरे खत्म हो रहा है। लेकिन इस बात को नकारा नहीं जा सकता कि औरत के बेटी से बहु और पत्नी बनते ही उसके लिए सामाजिक मापदंड बदल जाते हैं। उम्र चाहे जो भी हो, संतुलित और समझदारी से भरे व्यवहार के लिए औरत पर बहु और पत्नी का लेबल लगना  काफ़ी होता है।  मांग में सिंदूर पड़ते मोबाइल सॉफ्टवेयर की तरह औरत भी मिनटों में बहु और पत्नी में अपग्रेड हो जाती है। अपग्रेड होने के बाद समाज औरत को बिलकुल उस नए मोबाइल फ़ोन की तरह देखता है जिसमे वो अपने मन चाहे फीचर अपलोड कर सके। ये सच है कि पहले की तुलना में आज औरत अपने अस्तित्व को एक मज़बूत छवि के तौर पर देखना शुरू कर चुकी है,लेकिन समाज उसे अपने हिसाब से ढालते रहने का प्रयास शायद कभी बंद न करे।

पहले लड़कियों का कमाना उनकी शादी में सबसे बड़ा अड़चन हुआ करता था। ससुराल पक्ष अपने बेटे की बोली लगाने के बावजूद भी ख़रीदार होने के दम्भ से बाहर नहीं आ पाते थे । आत्मनिर्भर होने की वजह से लड़की को रसोईघर और पति की हर ज़रूरत का ख्याल रखने जैसे अतिमहत्वपूर्ण कामों में पहले ही अयोग्य करार दिया जाता था। वर्तमान समय में भी ये मानसिकता पूरी तरह से नहीं बदली है। पर हाँ ,महंगाई बढ़ने के साथ समाज ने औरतों के लिए अपने कायदे कानूनों में कुछ बदलाव ज़रूर किये हैं। आज गृहस्थी की गाड़ी आराम से चलाने के लिए बहु के पैसों की ज़रूरत महसूस की जाने लगी है। लव मैरिज हो या ऐरेंज,लड़की की जॉब प्रोफाइल अब एहमियत रखती है। पर सारे बदलावों के बाद भी स्तिथि वही ढाक के तीन पात। औरत के लिए लेकिन शब्द को यथार्थ करना शायद इस समाज के लिए किसी अनजाने असुरक्षा की भावना से बाहर आने जैसा है।  बहु के पैसों की ज़रूरत तब अचानक से खत्म हो जाती है जब उसे अपने करियर और परिवार में से किसी एक को चुनना होता है। नौकरी और अपने उज्वल भविष्य के साथ समझौता करने का फरमान उस समय ही जारी कर दिया जाता है जब औरत बेटी से बहु और पत्नी बनने की प्रक्रिया में होती है। औरत का पूरा जीवन रसयानविज्ञान की तरह रूपांतरण में ही तो बीत जाता है, जहाँ अपने वास्तविक प्रकृति को खो कर वो समाज द्वारा तय किये गए हर नयी विशेषताओं को अपनाती चली जाती है। और कई बार तो ये कहने सुनने की बात भी नहीं होती। बिना कुछ कहे औरत से ये उम्मीद की जाती है कि परिवार के लिए करियर के चुनाव और नौकरी छोड़ देने के मामले में लचीला होने को वो अपना एकमात्र कर्तव्य समझे। आज भी ये समाज औरत के जीवन को तभी सार्थक समझ पाता है जब वो उसे इन कर्तव्यों की पूर्ति के बाद अपनी ओर से बेस्ट पत्नी, बहु और माँ का सर्टिफिकेट दे।

इन सारे दोमुहे बदलावों के बीच हमारे समाज ने औरतों के लिए अपने शख्त कायदे कानूनों में एक और बदलाव किया है। इस वैचारिक बदलाव को इसके रचियता शायद प्रगतिशीलता की ओर एक नायाब क़दम मानते होंगे। इस बदलाव को आप महंगाई के ज़माने में लगे डिस्काउंट ऑफर की तरह भी ले सकते हैं। जितनी जल्दी इसका फायदा उठा लिया उतना आपके लिए अच्छा। अगर आप कमाने वाली बहु नहीं हैं और शादी के 6 महीने से लेकर एक साल के अंदर ससुराल वालों को पोते /पोती की शक्ल दिखा देती हैं तो सच मानिये आप किसी कंपनी की लेडी सीईओ से ज़्यादा टैलेंटेड और सम्मान की हक़दार बन सकती हैं। और अगर आप बेटे की माँ बन गयीं तो खुद को सौभग्यशाली न समझने की भूल बिल्कुल भी मत करियेगा। इस समाज की नज़र में पुरुष को जन्म देना औरत के लिए आत्मनिर्भर होने से कहीं ज़्यादा बड़ी उपलब्धि होती है। उसके लिए भले ही आप जिस बौद्धिक विकास और सफलता की ऊंचाइयों का अधिकार रखती हैं,वो घुट घुट कर दम क्यों न तोड़ दे। अपने पैसे कमाते हुए आत्मनिर्भर होना शायद समाज की नज़र में आपको उतना योग्य न बनाए जितना सिर्फ बहु के रूप में बेटे की माँ बनना बना देता है। आज भी अगर किसी आत्मनिर्भर औरत की पहली संतान बेटी होती है तो घर वालों को छोड़िये, आस पास के लोगों की शक्ल ऐसे उतर जाती है मानो उनके बैंक खाते पर रैड पड़ गयी हो। लेकिन वहीँ अगर एक हाउसवाइफ बेटे को जन्म दे तो पूरे मोहल्ले और कॉलोनी में वो आदर्श महिला का उदहारण बन जाती है। अभी तक़ जो लोग उसकी योग्यता को हाउसवाइफ कह कर निचा दिखा रहे होते हैं,बेटा होते ही उनलोगों के लिए औरत की अकादमिक डिग्री की वैल्यू पहले से कहीं और ज़्यादा बढ़ जाती है। पुरुष की जननी बनते ही वो समाज के लिए ये कहते हुए आदर्श महिला बन जाती है कि उसने अपने परिवार और बच्चे के लिए करियर से समझौता कर लिया। मुझे ये समझ नहीं आता कि औरत को हाउसवाइफ,वर्किंग,नॉन वर्किंग जैसे कई श्रेणियों में बाँट कर हमारा समाज प्रगतिशीलता के किस रूप को दर्शाना चाहता है। एक औरत ऑफिस जाते हुए सीरियल देखे तो वो हाउसवाइफ नहीं कही जाती। लेकिन पति और बच्चों की सारी ज़रूरतें पूरी करने के बाद सीरियल देखने वाली औरत को सिर्फ इसलिए हाउसवाइफ कहा जाना सही है क्यूंकि उसके पास थोड़ा ज़्यादा वक़्त होता है और हर महीने अकाउंट में सैलरी नहीं आती। एक तरफ़ पुरुष की तुलना में औरत को हर मामले में कमज़ोर और असक्षम  समझा जाता है और दूसरी तरफ़ क्या ये समाज अपने आप को इतना योग्य भी नहीं मानता कि किसी की बेटी को अपने घर में लाकर पूरी ज़िन्दगी सम्मान से रख सके। उसकी एहमियत एक इंसान और उसकी अच्छाइयों की वजह से हो न कि वर्किंग या नॉन वर्किंग लेडी के तौर पर। ये कैसी दोहरी मानसिकता है कि परिवार में औरत की महत्ता या तो ज़्यादा दहेज़ लाने से बढ़ सकती है नहीं तो अपना पैसा कमाने से।

आज भी औरत के स्वतंत्र और स्वक्छंद रूप को वास्तविक तौर से अपनाने में ये समाज असफ़ल रहा है। मनोरंजन के लिए किसी एक्ट्रेस के बोल्ड सीन्स को इंटरनेट पर बार बार देखा जाना ग़लत नहीं होता, मिस वर्ल्ड और मिस यूनिवर्स जैसे प्रतियोगिताओं में बिकनी में रैम्पवॉक करने से हमारे देश की संस्कृति खतरे में नहीं पड़ती (बल्कि ऐसा करने से योग्यता में और ज़्यादा निखार आता है), लेकिन देश के प्रधानमंत्री से घुटनों तक़ के शॉर्ट ड्रेस में मिलना शर्मनाक हो जाता है। एक औरत जो हर परिस्थिति का सामना करते हुए अपनी प्रतिभा के दम पर खुद को इतने ऊँचे सम्मान का हक़दार बनाती हो, उसकी मज़बूत छवि की तुलना आज भी उसके कपड़ों की लम्बाई  से की जाती है। और ऐसा करते हुए ये समाज खुद को भारीतय संस्कृति का रखवाला सिद्ध करने से  पीछे नहीं हटता। बलात्कारियों को सज़ा दिलाने के लिए जितने ट्वीट्स और फेसबुक पोस्ट अपडेट नहीं किये जाते उससे कहीं ज़्यादा आत्मनिर्भर महिलाओं के कपड़े सुर्ख़ियों में रहते हैं। इस मुद्दे पर ऐसी बहस छिड़ती है जैसे मानो औरत की कपड़े की लम्बाई बढ़ते ही देश से आतंकवाद और बेरोज़गारी की समस्या खत्म हो जायेगी।

औरत को ये समझना होगा कि वो परतंत्र नहीं है और ये सामाजिक तंत्र उसे परतंत्र महसूस करवाने से कभी पीछे नहीं हटेगा। बड़े स्तर पर भले ही सामाजिक बदलाव मुमकिन न हो, लेकिन व्यक्तिगत तौर पर बदलाव ज़रूरी भी है और संभव भी। इसलिए आज हमे ख़ुद से कुछ सवाल करने की ज़रूरत  है। क्या मुक्त होने के लिए समाज या पुरुष की स्वीकृती का इंतज़ार करते रहना ज़रूरी है। क्या हम स्वयं को सामाजिक और मानसिक तौर पर बंधिनी बने रहने से मुक्त नहीं करा सकते। या हमने ख़ुद को इस झूठे सच का आदि बना लिया है कि जब तक़ समाज की ओर से मुक्ति की स्वीकृति नहीं मिलती हम आज़ादी और आत्मनिर्भरता का स्वाद चखने में सक्षम नहीं हैं।

मुक्त होने के लिए समाज की स्वीकृति का इंतज़ार करते रहना अपने जीवन के साथ नाइंसाफी करना है। एक अपनेपन का रिस्ता खुद से बनाइये। हमारा जीवन दूसरों को ख़ुश करते रहने के लिए नहीं होना चाहिए। ये समाज हमेशा आपको बहु, बेटी, पत्नी और माँ के नज़रिये से फ़ैसले लेने के लिए बाध्य करता रहेगा। होश सँभालते ही आपको गोल रोटी बनाने के लिए ट्रेनिंग मिलनी शुरू हो जाएगी। ये आप पर निर्भर करता है कि आप अपने जीवन को सिर्फ़ गोल रोटी बनाकर सार्थक करते हैं या अपनी क़ाबिलियत को पहचान कर। जीवन में शादी एक बहुत बड़ा फैसला होता है और साथी की ज़रूरत महसूस होना आपके व्यक्तित्व को कमज़ोर नहीं बनाता। पर प्यार में अंधे होकर या किसी तरह के दबाव में आकर ग़लत साथी का चुनाव आपके व्यक्तित्व को खत्म ज़रूर कर सकता है। आत्मनिर्भर होने और पैसा कमाने में फ़र्क़ है। आज के इस वैश्वीकरण के युग में अच्छी पढाई के बाद ठीक ठाक पैसा कमा लेना कोई बहुत बड़ी बात नहीं है। लेकिन अपने पसंद के क्षेत्र में अपनी योग्यता साबित करते हुए पैसा कमाना सही मायने में आत्मनिर्भर होना कहलाता है। रंग रूप, पैसा और फैमली स्टेटस जैसे भौतिकवादी मापदंडों के अनुसार साथी का चुनाव करके आप खुद को सिर्फ एक बिकने वाली बहु बनाएंगी, और ये समाज हमेशा की तरह अपने बेटे की बोली लगाने के बावजूद भी ख़रीदार होने के दम्भ से बाहर नहीं आ पायेगा। इसलिए तमाम सामाजिक बंधनों और रिश्तों के बोझ से ख़ुद को मानसिक तौर पर मुक्त करिये। अपने जीवन को संयमित रखते हुए अपना वजूद तलाशिये और ख़ुद को ख़रीदार के ओहदे तक पहुंचाइये। आप जितना अपने आप को ढूंढेंगी, उतना ही आपका विवेक और अनुभव बढ़ेगा और आप सही मायने में साथी के तौर पर एक पति नहीं बल्कि एक दोस्त को ढूंढ पाएंगी। और यकीन मानिये दोस्ती का रिश्ता हमेशा ही तनाव और दबाव से मुक्त होता है।

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