हे प्रजातंत्र के हत्यारे मीडिया, जनता को आपसे तनिक भी हमदर्दी नहीं है

Posted by Deepak Bhaskar in Hindi, Media
June 17, 2017

प्रजातंत्र के तीन स्तम्भ- विधायिका (आम शब्दों में नेतागण), कार्यपालिका (अधिकारीगण), न्यायपालिका (जज साहब लोग) में सबसे पहले अधिकारीगणों ने जनता के बीच अपना विश्वास खोया। एक समय आई जब जनता, सारे अधिकारियों को तिरस्कृत भाव से देखने लगी। फिर नेतागणों ने अपना विश्वास खोया और जनता यह जान और मान गई कि नेताओं पर विश्वास नहीं किया जा सकता। अभी जज साहब लोग के प्रति विश्वास था लेकिन उसमें भी बहुत तेज़ी से गिरावट हुई है। एक और स्तम्भ जिसे माना गया वो था मीडिया।

मीडिया ने विश्वसनीयता के पैमाने पर खूब तेज़ी से जनता में पैठ बनाई। ये पैठ गणेश शंकर विद्यार्थी जैसे लोगों के पदचिन्ह पर चलने वाले पत्रकारों की वजह से बनी थी। अधिकारीगण और नेतागण से परेशान जनता के लिए मीडिया एक नयी उम्मीद लेकर आया। लेकिन आज के मीडिया ने अपनी विश्वसनीयता सबसे ज़्यादा तेज़ी से खोई है।

Journalist & photographers

याद कीजिये! जब संसद पर आतंकी हमला हुआ था तो नेताओं के प्रति घृणा इतनी थी कि कितने लोग यह कहने से नहीं चूके कि ‘आतंकवादी अन्दर घुस जाता तो कुछ डकैत कम हो ही जाते।’ बहरहाल देश की संसद का मान किसी नेता (सांसद) से कहीं ज़्यादा होने के कारण सब चुप हो गए। आज एकदम वही स्थिति है जब लालू यादव जी ने पत्रकारों (पत्रकारिता के हत्यारे) को डांटा तो आम जनता के मन में, इन पत्रकारों के प्रति कोई स्नेह नहीं दिख रहा है।

खुलकर बोल नहीं पा रहे लेकिन मन में वही संसद वाला विचार चल रहा कि ठीक किया। नेता का क्या है वो एक बार चाह ले तो जनता का विश्वास जीतने में समय नहीं लगेगा, एक जनोन्मुखी नीति जनता का प्यार दिलाने के लिए काफी होती है। लेकिन पत्रकारिता को दशकों लग जाते हैं जनता का विश्वास जीतने में। उस वीडियो को देखना चाहिए, ध्यान से सुनना चाहिए, पत्रकारिता की आक्रामकता को देखना चाहिए, क्या हम ऐसे हो गए हैं?

उन्हें समझना चाहिए कि आरोपित व्यक्ति कैसे इतनी ताकत/शक्ति के साथ आपको सरेआम तिरस्कृत कर देता है। क्योंकि वो जानता है कि आप अपना विश्वास जनता के बीच खो चुके हैं। संभालिए, समय दीजिए क्या पता आप पर फिर लोग विश्वास करने लगें। ये समझिए कि आप किसी की आवाज़ नहीं रह गए हैं अब। अगर ऐसा होता तो आप सरकार को किसानों के मुद्दे की जानकारी, अपनी रिपोर्टिंग से करवाते। लेकिन ये नहीं किया आपने, नहीं पहुंचाई उनकी आवाज़ तो उन्होंने खुद खड़े होकर इन ‘बहरों’ को अपनी आवाज धमाकेदार रूप से सुनाई।

अब आप उनके हिंसक होने का रोना रो रहे हो। आप थे उनकी अहिंसक आवाज़ लेकिन आप तो अब खुद सरकार बन गए हो। अब तो जनता आपसे भी लड़ रही है। आपको कितनी बार ऐसा दंभ करते सुना है कि आपसे कोई ठीक से बात करे, क्यूंकि आप पत्रकार हैं लेकिन कभी सोचा कि आपको भी ठीक से बात करनी आनी चाहिए। आप कौन सी पत्रकारिता पढ़ रहे हैं, जिसमें इतना तक नहीं बताया जा रहा है कि आपका काम ओपिनियन देना नहीं बल्कि रिपोर्टिंग करना है।

आपने जनतंत्र के साथ वो धोखा किया है जिसके लिए आपको गाली-गलौच तो छोड़ो, फांसी पर लटका दिया जाए तो भी इस देश की जनता के मुंह से उफ़ तक नहीं निकलेगी। क्या आप भूल गए थे कि प्रजातंत्र में जनता सरकारें चुनती है और आपने ये अधिकार भी उनसे छीन लिया। अब सरकारें, जनतंत्र के हत्यारे आप जैसे पत्रकार चुनते हैं। आपको हंगामे की रिपोर्टिंग करने का काम इस देश के संविधान ने दिया और आप खुद हंगामा करने लगे।

कब आपने सही दिखाया है? जिससे जनता का सरोकार हो वो आपके चैनल के लिए खबर नहीं। सोचो! इस देश के रेलवे स्टेशन बेचे जा रहे हैं और आपके लिए ये खबर नहीं। इस देश में लगातार नौकरियां कम हो रही हैं लेकिन ये आपके लिए खबर नहीं। किसान की आत्महत्या आपके लिए दृष्टिकोण का विषय है, जैसे किसी नेता के लिए गरीबी मानसिकता में होती है। आप कौन सा ‘ज्योतिष-शास्त्र’ दिखाते रहते हो? क्या आपको पता नहीं कि जनतंत्र में राजनीति लोगों का भाग्य निर्माण करती है न की गृह-नक्षत्र।

क्या आपको पता नहीं कि अम्बानी को जो राजनीतिक प्रश्रय और योगदान मिला था वह किसी ग्रह-नक्षत्र का मेल नहीं था। आपको 125 करोड़ के देश में खबर नहीं मिलती और आप धारावाहिक ‘दिया-बाती’ न्यूज चैनल पर दिखाते हैं। वो जिस चैनल पर आता है वहां तो लोगों ने देख ही लिया होगा। आपका काम ‘दिया-बाती’ दिखाना नहीं बल्कि ‘दिया-बाती’ से महरूम इस देश की जनता का दर्द दिखाना है। एक-दूसरे का दर्द देखेंगे और समझेंगे तभी तो राष्ट्र में एक सी भावना आयेंगी, तभी तो राष्ट्रवाद मजबूत होगा। लेकिन आपको तो राष्ट्रवाद बेचना होता है। जब लोग आपस में दर्द बांटने लगे तो समझिये कि वो राष्ट्र उन्नति के चरम पर पहुंचने वाला है।

आप जो दिखाते हैं, उस पर लोग हंसते है और जब खबर लोगों को हंसाने लगे तब पत्रकारिता की हत्या हो चुकी होती है। मृत शरीर को कई बार ज़िन्दा होते आपने दिखाया है, जनता उस दिन का इन्तज़ार करेगी जब आप मृत पत्रकार अपने ज़िन्दा होने की खबर प्रमाणिकता के साथ दिखायेंगे।

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