राष्ट्रपति भवन की 7 रोचक जानकारियां जो आप नहीं जानते

Posted by Umesh Kumar Ray in Hindi, History
June 25, 2017

राष्ट्रपति चुनाव के लिए सरगर्मी परवान पर है। भाजपा की ओर से रामनाथ कोविंद और कांग्रेस की ओर से लोकसभा की पूर्व स्पीकर मीरा कुमार हाथ आज़मा रहे हैं। राष्ट्रपति चुनाव पर देशभर की नज़र है। राष्ट्रपति चुनाव को रायसीना हिल की रेस भी कहा जाता है क्योंकि राष्ट्रपति का पता रायसीना हिल है। आइये आपको देते हैं राष्ट्रपति भवन से जुड़ी कुछ रोचक जानकारियां-

राव सिंह का बिगड़ा रूप है रायसीना

अंग्रेज़ों ने कलकत्ता को भारत की राजधानी बनाया था, लेकिन कलकत्ता व पश्चिम बंगाल में अंग्रेज़ों के खिलाफ आंदोलन के तीव्रतर रूप लेने के बाद भारत की राजधानी दिल्ली को बनाने का फैसला लिया गया। वाल स्ट्रीट जर्नल में छपे एक लेख में रुद्रांशु मुखोपाध्याय की एक किताब का हवाला देते हुए लिखा गया है कि राष्ट्रवादी ताकत से बचने के लिए अंग्रेज़ों ने कलकत्ता की जगह दिल्ली को राजधानी का निर्णय लिया।

A View Of Rashtrapati Bhawan
राष्ट्रपति भवन

हालांकि इसके पीछे एक तर्क यह भी दिया गया था कि 1905 में चुनाव का अधिकार मिलने के बाद देश को चलाने के लिए एक ऐसी जगह की ज़रूरत महसूस होने लगी, जो देश के मध्य में हो और इसलिए दिल्ली का चयन किया गया।

बहरहाल सन 1911 में राजधानी को शिफ्ट करने के लिए प्लानिंग कमेटी बनायी गयी और रायसीना हिल के पास पुरानी दिल्ली के नज़दीक पांच किलोमीटर के भूखंड का चयन किया गया जहां तमाम प्रशासनिक भवन व वायसराय के रहने के लिए गवर्नमेंट हाउस बनाया गया। इस भूखंड पर 300 बस्तियां थीं जिन्हें अन्यत्र शिफ्ट कर ज़मीन का अधिग्रहण किया गया था।

असल में दिल्ली व उसके आसपास के क्षेत्र पर सन 1600 से 1700 तक जागीरदार कलदा राव का कब्ज़ा था। उस दौरान पूरे क्षेत्र को रायसीना कहा जाता था। उक्त जगह का असली नाम था- राव सिंह। वह नाम बिगड़कर कालांतर में रायसीना हो गया था।

बनना था 4 साल में, लग गये 17 साल

राष्ट्रपति भवन को तैयार करने के लिए तत्कालीन वायसराय ने 4 वर्ष का समय निर्धारित किया था, लेकिन इसको पूरी तरह तैयार करने में करीब 17 साल लग गये थे। यहां तक कि 17 साल के बाद भी कुछ हिस्सा बनता रहा। बताया जाता है कि प्रथम विश्व युद्ध के कारण निर्माण कार्य प्रभावित हुआ था। 6 अप्रैल 1929 को यह तैयार हो गया था।

23 हजार श्रमिकों ने खड़ी की थी इमारत

6 अप्रैल 1929 को तत्कालीन वायसराय व गर्वनर जनरल ऑफ इंडिया लॉर्ड इरविन ने इस इमारत में आखिरी पत्थर रखा था और वही इस भवन मे प्रवेश करनेवाले पहले गवर्नर जनरल थे। इस भव्य इमारत को बनाने में 700 मिलियन ईंट और तीन मिलियन पत्थर लगे थे। कुल 23 हजार श्रमिकों ने मिलकर इसे खड़ा किया था। उस वक्त वायसराय हाउस बनाने में एक करोड़ 40 लाख रुपये खर्च हुए थे।

विश्व का दूसरा सबसे बड़ा पैलेस

रोम में स्थित इटली के राष्ट्रपति के आधिकारिक आवास क्विरिनल पैलेस के बाद राष्ट्रपति भवन विश्व का दूसरा सबसे बड़ा आवास है। क्विरिनल पैलेस का निर्माण 1583 में किया गया था। राष्ट्रपति भवन अमरीकी राष्ट्रपति के आधिकारिक आवास ह्वाइट हाउस से 14 गुना बड़ा है।

राजेंद्र प्रसाद के राष्ट्रपति बनने पर इसका नाम हुआ राष्ट्रपति भवन

देश के आज़ाद होने के बाद भी इस इमारत को वायसराय हाउस ही कहा जाता था। 15 अगस्त 1947 को देश के आज़ाद होने के बाद वायसराय लुईस माउंटबेटेन को ही गवर्नर जनरल बनाया गया था। 21 जून 1948 को सी राजगोपालचारी को गवर्नर जनरल बनाया गया। 26 जनवरी 1950 तक वह गवर्नर जनरल के रूप में वायसराय भवन में रहे। इसी दिन देश में नया संविधान लागू हुआ और गवर्नर जनरल का पद समाप्त कर राष्ट्रपति पद शुरू किया गया। राजेंद्र प्रसाद पहले राष्ट्रपति के रूप मे वायसराय हाउस में पहुंचे व उसी वक्त वायसराय हाउस का नाम राष्ट्रपति भवन हो गया।

राष्ट्रपति भवन में हुई दो राष्ट्रपतियों की मौत

देश के दो राष्ट्रपतियों की मौत राष्ट्रपति भवन में हुई है। भारत के तीसरे राष्ट्रपति जाकिर हुसैन 3 मई 1969 को दफ्तर में ही अचानक बीमार पड़ गये थे और उनकी मौत हो गयी थ। वहीं, फखरुद्दीन अली अहमद की मौत 11 फरवरी 1977 को उस वक्त हो गयी थी, जब वह राष्ट्रपति भवन में अपने अपने दफ्तर में नमाज़ अदायगी की तैयारी में लगे हुए थे।

अगर कलकत्ता होता राजधानी, तो राजभवन बनता राष्ट्रपति भवन

ईस्ट इंडिया कंपनी ने जब देश पर कब्ज़ा जमाया, तभी कलकत्ते में राजभवन बनाया गया। बताया जाता है कि इसका निर्माण 1803 में किया गया था। उस वक्त इसका नाम गवर्मेंट हाउस था। 1858 में जब ईस्ट इंडिया कंपनी ने सत्ता की बागडोर ब्रिटिश क्राउन के हाथों में सौंपी, तो गवर्मेंट हाउस को वायसराय का आधिकारिक आवास बना दिया गया और इसका नाम वायसराय हाउस हो गया। 1911 में जब देश की राजधानी कलकत्ता की जगह दिल्ली करने का निर्णय लिया गया, तो वायसराय के रहने के लिए दिल्ली में ही जगह की तलाश की गयी और राष्ट्रपति भवन का निर्माण किया गया। इसके बाद वायसराय हाउस को बंगाल के लेफ्टिनेंट गवर्नर का आधिकारिक आवास बना दिया गया, जो आजादी के बाद राजभवन के नाम से जाना जाने लगा।

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