आज के TV का कंटेंट देखकर बढ़ जाता है ब्लड प्रेशर

Posted by Ayman Jamal in Hindi, Media, Society
June 12, 2017
एवरेडी (पहले यूनियन कार्बाइड इंडिया लि.) के विज्ञापन में बॉलीवुड अभिनेता अक्षय कुमार

एक मित्र ने कहा कि ब्लड प्रेशर की परेशानी अब ठीक रहती है, जबसे TV हटा दिया है। इस एक वाक्य में इतना बड़ा फ़लसफ़ा है कि कई घंटों इस पर चर्चा की जा सकती है। ‘इडियट बॉक्स’ जो हमारे घरों का एक आधुनिक और महत्वपूर्ण सदस्य बना बैठा है, आज के परिवेश में घरों में क्या ला रहा है? कहा जाता है कि समाज मे जिस तरह का माहौल होता है समाज का हर हिस्सा उसको दर्शाता है। हमारे ‘इडियट बॉक्स’ पे भी जो कुछ चलता है वो भी हमारे समाज का एक हिस्सा बन बहुत कुछ दर्शाता है।

सास बहू के सीरियल्स अब बस सास बहू तक सीमित नही रहे, कई डेली सोप हैं जो समाज मे बदलाव की बात को आगे बढ़ाने की कोशिश भर करते दिखाई देते हैं। कोशिश इसलिए क्योंकि पितृसत्ता को तोड़ना वहां कम ही मुमकिन लगता है, जहां आज भी महिलाएं घर के अंदर भी साज सज्जा में दिखाई जाएं। महिला सुंदर ही हो और गोरी ही दिखे, ये वाला हिसाब हमारे TV पर चलने वाले लगभग हर कार्यक्रम में ही दिखाई देता है।

पितृसत्तात्मक दृष्टिकोण को आगे बढ़ाते ये TV कार्यक्रम समाज में सुधार का दावा करते हुए बडे खोखले जान पड़ते हैं। ऐसे में किसी सोशलिस्ट फेमिनिस्ट का ब्लड प्रेशर क्यों ना बढ़े?

विज्ञापनों की बात की जाए तो सीमेंट के विज्ञापन में भी जीरो फिगर वाली महिला का क्या काम है, समझ से परे है। सेलिब्रिटीज तो जैसे कुछ भी बेच डालेंगे। भोपाल गैस त्रासदी के लिए ज़िम्मेदार यूनियन कार्बाइड जैसी कंपनी तक के प्रोडक्ट्स के विज्ञापनों में हमारे महान कलाकारों ने काम किया और हमारे कान पर जूं तक नही रेंगी। वो महान कलाकार आज भी हमारे आइडल हैं और हम शान से उनके सोशल वर्क गिनाते हैं। लगता है हम एथिक्स (सिद्धांत) और सोशल वर्क को एक ही समझ बैठे हैं।

An image from ultratec cement advertisement
अल्ट्राटेक सीमेंट के एक विज्ञापन का एक दृश्य

शायद यही वजह है कि कोई कलाकार अपने वर्क एथिक्स की धज्जियां तक उड़ा दें तो भी हम सवाल नहीं करते। बस करोड़ों कमाए गए धन में से कुछ निकालकर आर्मी या गरीब को दे देने मात्र से वो हमारे रील लाइफ हीरो से रियल लाइफ हीरो बन जाते हैं। नायकों के नायक और महानायक बने बैठे लोग तो ऐसे चुप्पी साध लेते हैं, जैसे देश मे हो रहे उत्पातों पर मौन व्रत धारण किया हो और ये जनाब ही TV पर दिन में चार बार आकर कंपोस्ट के फायदे गिनाकर जाते हैं। एक तरफ़ा प्रोफेशनलिज्म क्या एथिकल है? या शायद हम कुछ ज़्यादा ही उम्मीद कर रहे हैं। खैर, अब जब बाजार मोबाइल फ़ोन पे आ गया हो तब विज्ञापनों का क्या रोना रोया जाए।

फेयरनेस क्रीम, लड़कियों को चुम्बक की तरह चिपका लेने वाले डियोडरेंट, स्लिम होने वाली चाय या सिरियल, सुंदरता का नकली मापदंड तय करते हुई ना जाने ऐसे कितने विज्ञापनों को हम अपने बच्चों को छुटपन से ही परोसने लगते हैं। ऐसे में ब्लड प्रेशर बढ़ ही जाता है जब समंदर से नहाती हुई लड़की निकल कर आती है और साइड में कोई प्रोडक्ट आके गिरता है स्क्रीन पे, जिसका उस लड़की से दूर-दूर तक कोई रिश्ता नही होता।

खैर, इन सबसे उकताकर जब म्यूजिक चैनल खोलो तो रैप कल्चर का हिंदुस्तानी वर्ज़न तो आग लगाए हुए है। शराब, शबाब का घमंड और गानो में महिलाओं का व्यवसायीकरण और उनका वाही घिसा-पिटा प्रदर्शन क्या सिखा रहा हमारे प्रोग्रेसिव समाज के युवाओं और बढ़ते बच्चों को? मर्दानगी का इंडियन वर्ज़न, गीत संगीत के नाम पे खूब परोसा जाता है। बहुत ही आसानी से ये सारी पितृसत्तात्मक अवधारणाएं युवाओं की मानसिकता में ठूस दी जाती हैं। ऐसे में विचारधाराओं, दर्शन, क्रांति और समाज को पढ़ने वाले विद्यार्थियों का कैसे न बढ़े ब्लड प्रेशर? फिर जब लगता है के चलो छोड़ो नाच गाना, डेली सोप, और आओ कुछ दुनिया की खबरें सुने, तब तो भैया वो भी नरक का द्वार ही खुलने बराबर होता है।

न्यूज़ रूम मीडिया के इस ज़माने में ट्रुथ फाइंडिंग टीम पे कौन पैसे लगाए? क्यों नहीं किसी एक तरफ़ा मत को सच बना कर पेश किया जाए? क्यों नही सनसनीखेज़ खबरों का नया कल्चर चलाया जाए? क्यों नही बेचना शुरू करे नफरत और डर इस बाजारपरस्त समाज को?

TRP के इस ज़माने में और ‘गोदी मीडिया’ के इस दौर में खबर वो नहीं है जो हुआ है, खबर वो है जो दिखाया और बेचा जा रहा। कानफोड़ू न्यूज़ रूम की बहसों में कौन क्या बेच रहा है, समझ से परे है। ऐसे में रवीश जैसे चंद पत्रकारों से ही उम्मीद कायम रहती है, वरना तो खबर का धंधा आज देश के हालात बिगाड़ने, माहौल बनाने, मत तैयार करने और हर मुद्दे पर सरकार के मत को सही साबित करने का काम बखूबी निभा रहा।

मीडिया ट्रायल करने वाले पत्रकार जो डेमोक्रेसी की धज्जियां उड़ा रहे हैं, अपने मीडिया हाउस को रिपब्लिक बुलाते हैं। ऐसी विडंबनाओं के बीच अब ब्लड प्रेशर क्यों न बढ़े? TV हटा देने से से रक्तचाप तो कंट्रोल में रहता है, पर जो बीमारी समाज को लगती जा रही उसका इलाज कैसे हो?

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