सूटकेस और हवाईजहाज के टैग का फेविकॉल वाला जोड़ है, टूटेगा नहीं

Posted by पर शांत in Hindi, Society
June 10, 2017

सफ़र चाहे ट्रेन का हो, बस का हो, दिल्ली की खचा-खच भरी DTC का हो या फिर मेट्रो का, बेतरतीब निगाहें घूमते-टहलते, कुछ धूल लगे झुके कन्धों पर टंगे एक ऐसे बैग से टकरा ही जाती है। इस बैग में तक़रीबन ढाई इन्च की एक गन्दी सी सफ़ेद सुतली के मुहाने पर छोटा सा कागज़ का टुकड़ा लटका होगा, जिस पर ‘सुनहरे’ अमिट अक्षरों से लिखा होता है ‘Indigo’। बैग पर लगा यह टैग उस शख्स की गरिमा और शोभा बिलकुल वैसे ही बढ़ाता है, जैसे उसको 1962 की भारत-चीन की लड़ाई में कोई मेडल मिला हो। इस टैग का अहसास भी उसके लिए कुछ-कुछ ऐसे ही है, दिल के करीब, दिलेरी के पास!

“इसका टूटना नहीं आसां बस इतना समझ लीजिये, एक बार लग गया है और अब जिंदगी भर चलाना है”

बीते दिनों हवाई चप्पल पहनने वाले लोग भी अब हवाई यात्रा कर सकें, इसके लिए मोदी जी ने रियायती दरों पर कुछ योजनाएं लागू कारवाई। लेकिन उसके कुछ ही दिनों बाद हवाई यात्रा करने वाले एक सज्जन राजनेता ने अपनी हवाई चप्पल का जोर, एयरलाइन्स एक वरिष्ठ अधिकारी पर दिखा दिया।  मेरे ज़ेहन में आज तक ये सवाल कौंधता है आखिर स्काउट-गाइड में न सिखाई जा सकने वाली ये कौन सी गांठ है, जिससे ये हवाई कंपनियां टैग को ऐसे बांधती हैं कि एक बार यात्रा करने के बाद वह शख्स कुछ दिन और कुछ महीने क्या, सालों बाद भी इस टैग को हटा नहीं पता है।

व्यापारियों को चाहिए कि इन हवाई जहाज़ के अधिकारियों से बातचीत करके ये राज़ निकलवाएं। आखिर ये धागा लाते कहां से हैं कि किसी भारतीय के लिए इसे तोड़ना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन सा हो गया है? अच्छे और किफायती चीजों के मामलें में वैसे भी हम भारतीयों की पकड़ थोड़ी पक्की है। ऐसे में अगर इस टिकाऊ रामबाण डोर का अगर कहीं से कोई नुस्खा मिल जाए तो समझो इससे बने नाड़े से, वक़्त बेवक्त गिर जाने वाली भारतीयों की अगली कई पुश्तों की पतलून टाइट हो जाएगी। इसके साथ ही उत्तर भारत के प्रमुख खेल में शुमार पतंग के कारोबार को काफी इजाफा होगा। एक ओर जहां अभी मुलायम धागों पर कांच की पोलिश कर धागों का मज़बूत बनाया जा रहां है, वहीं एक बार इस धागे की सप्लाई होने के बाद, हर पतंग बाज़ के हाथो में एक मज़बूत डोर होगी। वैसे भी देश की मज़बूत डोर तो नेताओं के हाथों में है, युवाओं के हाथ में कम से कम पतंग की मज़बूत डोर तो होनी ही चाहिए!

फेविकोल की पैरेंट कंपनी ‘पीडिलाइट’ का इतिहास बहुत पुराना है, नए से नए अनोखे एड इसकी कोख से निकले है। इतिहास गवाह है मजबूती एवं बेहतर जोड़ के लिए इससे बेहतर शायद कुछ नहीं। लेकिन मुझे लगता है घर के कोने में पड़े धूल भरे बैग की हैंडल पर झूलते इस टैग पर शायद आज तक किसी की नज़रें नहीं पहुंची, वरना ये कब का सबको मात दे चुका होता। सात फेरे, रात भर की शादी और पंडित जी के अनगिनत मंत्रों के बाद पति-पत्नी की शादी सात जन्म चलेगी इसकी गारंटी कोई नहीं ले सकता। लेकिन एक बार एअरपोर्ट के बैगेज काउंटर से निकलने के बाद बैग पर लगे इस टैग के न निकलने के गारंटी कोई भी ले सकता है!

शायद सालों की विकट तपस्या दिन-रात मेहनत करके प्राप्त अलौकिक शक्ति एवं करोड़ों देवी-देवताओ के अपार अर्शीवाद के बाद ही यह टैग निकाला जा सकता होगा। वरना कौन ही मूर्ख होगा जो इसे इस कदर टांग कर घूमेगा! वैसे भी नयी टी-शर्ट और जीन्स जब हम बाज़ार से घर लेकर पहुंचते हैं तो भले ही वह 300 की हो या 3000 की, घर में घुसने के साथ ही टैग ऐसे उखाड़ कर फेंकते है, जैसे टैग का रंग रिस का नई टी-शर्ट पर चढ़ जाएगा। अगर भूलकर कभी यह टैग लगा रह जाए और हम किसी पार्टी या बाहर शर्ट पर लगे हुए टैग के साथ पहुंच जाएं तो उस समय इतनी शर्मिंदगी महसूस होती है कि घर पहुंच कर खुद भी पंखे पर इस टैग की तरह बस लटक जाएं।

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