हक के लिए लड़ती मेरी विधवा मां इस समाज के लिए चरित्रहीन थी

हमारे घर में सबकुछ सामान्य रूप से चल रहा था तब ही एक सुबह फोन की घंटी बजी। फोन पुलिस स्टेशन से था और ख़बर मेरे पापा की मौत की थी। पापा की मौत के समय मैं 10 साल की थी और मेरी छोटी बहन महज़ 7 साल की।

मेरी मां शर्मिली स्वभाव की एक घरेलू औरत थीं। पढ़ी-लिखी होने के बावजूद कभी बाहर निकलकर काम करने का कॉन्फिडेंस नहीं आया था उनमें। इन सबके बीच पापा का जाना हमारे घर के सामने ना सिर्फ इमोशनल बल्कि आर्थिक कमज़ोरी का कारण बना।

मां के माथे से बिंदी उजाड़ दी गई, रंगीन कपड़े छीन लिए गए। दो पल में ही वो विधवा बन गईं। एक ऐसी विधवा जिससे उसके जीवन का हर रंग छीन लिया जाता है। उस वक्त मां के लिए एक विधवा से ज्यादा दो बच्चों की मां का अस्तित्व मायने रखता था। शुरुआत में मां के लिए घर से बाहर कदम रखना भी आसान नहीं था, लेकिन आज मेरी उसी मां ने कोर्ट की लड़ाई भी जीती है और पापा की जगह सरकारी नौकरी में कार्यरत हैं।

लेकिन, ये सब इतना आसान नहीं था। एक घरेलू शर्मिली औरत से एक बोल्ड लेडी बनने का सफ़र काफी मुश्किल था। शुरुआत में हमें कई सालों तक पैसों के लिए संघर्ष करना पड़ा। लेकिन, कुछ लोगों ने सलाह दी कि पापा की जगह अनुकम्पा पर मां को नौकरी मिल सकती है। मगर, नौकरी के लिए तो सबसे पहले आवेदन की जरूरत होती है। मेरी मां को उस वक्त एक एप्लिकेशन लिखने तक का कॉन्फिडेंस नहीं था। मां ने हमारी चाची से मदद मांगी, मगर उन्होंने एक एप्लिकेशन लिखने तक के लिए मना कर दिया।

रबीन्द्रनाथ की लाइन है ना, ‘जोदी तोरे डाक शोने केऊ ना आशे तौबे ऐकला चॉलो रे।’ मतलब जब आपके बुलाने पर कोई ना आए तो आप अकेले ही चलो। मेरी मां ने भी वही किया। अकेले ही उन्होंने अपनी लड़ाई लड़ी। पापा के गुज़रने के तीन साल बाद भी अनुकम्पा वाली नौकरी मां को नहीं मिली थी। परिवार के कुछ लोगों ने तभी कहा कि उन्हें नौकरी के लिए केस करना चाहिए। शुरुआत में तो मां ने मना कर दिया। उन्होंने कहा, ‘हम एक ही वक्त की रोटी खाएंगे, लेकिन केस-वेस के चक्कर में नहीं पड़ेंगे।’

काफी समझाने-बुझाने के बाद मेरी मां ने केस के लिए हामी भर दी। कोर्ट केस के लिए कई बार मां को वकीलों के साथ देर रात तक रुकना पड़ता था। उस वक्त लोग मेरी मां के चरित्र पर सवाल उठाते थे। उन्हें कई बार गंदी गालियां भी सुननी पड़ी। मगर मेरी मां के लिए वो गालियां नहीं बल्कि हम दो बहनों का भविष्य मायने रखता था। ग्यारह सालों तक केस लड़ने के बाद कोर्ट ने मां को जल्द से जल्द नियुक्त करने का ऑर्डर दिया। नियति का फैसला देखिए, जब मेरी मां का ज्वाइनिंग लेटर घर आया तो वह मेरे पापा की ग्यारहवीं बरसी का दिन था।

पिता जी की मौत के करीब 7-8 महीने बाद मेरी छोटी बहन नीलू का रिजल्ट आने वाला था। मां उस वक्त तक घर से बाहर नहीं निकल रही थीं। नीलू के जिद करने पर वो बाहर निकलीं। नीलू उन्हें घर-से-स्कूल तक पहुँचने का रास्ता समझाते हुए ले जा रही थी। मां पहली बार नीलू के स्कूल गई थीं। मां आज भी उन दिनों को याद करते हुए बोलती हैं, ‘इसके बाद एक-एक कर मैं अनजान शहर से जान-पहचान बढ़ाने लगी और इसी क्रम में मैं कभी अपने बाबूजी के साथ बैंक तो कभी अपने जेठानी के साथ अस्पताल जाने लगी थी। मैं उसके बाद कहीं भी जाती तो मानसिक रूप से जागरुक होकर लौटती। मौहल्ले का नाम, रिक्शा भाड़ा कहाँ और कितना देने होंगे, इन सभी चीजों को समझने-बूझने लगी थी। मैं सिर्फ अपनी घर-गृहस्थी ही नहीं सम्भाल रही थी, मैं आत्मनिर्भर भी होने लगी थी। मुझे अब किसी की जी-हुजुरी करने की जरूरत नहीं पड़ती थी।’

मां हमेशा कहती हैं, अगर उस वक्त मैं कमज़ोर पड़ जाती तो मेरे बच्चे इतने मजबूत नहीं बन पाते। समाज भले ही कहे कि मां विधवा होने की वजह से अशुभ हैं। मगर हम दोनों बहनें चाहते हैं कि हमारी शादी की सारी रीति-रिवाज माँ के हाथों से ही हो।

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