जिस शहर की ट्रैफिक व्यवस्था अच्छी नहीं, वहां नहीं हो सकता विकास

हाल ही में एक समाचार आया कि नीदरलैंड के एक शहर में सड़क की ज़मीन पर भी बत्तियां लगाई गयी हैं, क्योंकि पैदल चलने वाले लोग अपने फोन में इतने व्यस्त रहते हैं कि ऊपर सर उठाकर देखना नहीं चाहते। इससे शायद बहुत सारी दुर्घटनाएं टल जाएं। जिस गति से आबादी, वाहनों की संख्या और तकनीक का विस्तार हुआ है, उस गति से शहरों की ट्रैफिक व्यवस्था पर कार्य नहीं हुआ है। यह एक तथ्य है कि किसी भी शहर के विकास में वहां के यातायात की काफी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। पेरिस से न्यूयॉर्क, वाराणसी से दिल्ली और टोक्यो से बीजिंग तक जहां भी यातायात की व्यवस्था पर शहर के विकास का नक्शा बनाते समय ध्यान नहीं दिया गया, वह समय के साथ पिछड़ गया।

Heavy Traffic in an Indian mid size city

आज स्थिति यह है कि कई शहरों में चंद किलोमीटर की दूरी तय करने में कई घंटो तक का समय और पस्त कर देने वाले जाम का सामना करना पड़ता है। दिल्ली में यदि आज से बीस-तीस साल पहले इस पर ध्यान दिया गया होता तो फ्लाईओवरों और पुलों के निर्माण से वर्तमान में हो रही बहुत सारी परेशानियों से बचा जा सकता था। यह कहीं न कहीं बेतरतीब प्लानिंग और यातायात को प्लानिंग का हिस्सा न मानने का ही फल है।

बैसवारा क्षेत्र अभी शहरी विकास के मामले में अर्ध-विकसित या उससे भी निचले स्तर पर है। रायबरेली, उन्नाव और फतेहपुर ज़िले जनसंख्या, वाहनों की संख्या और स्थिति एवं यातायात तंत्र की दुरुस्ती के मामले में मध्यम से निम्न श्रेणी के ज़िले हैं। समय के साथ-साथ शहरों में रहने वालों की संख्या और घर/मकान का निर्माण बढ़ा ही है और आगे बढ़ेगा ही। क्योंकि अभी इन शहरों के विकास का खाका कच्चा है, यहां पर एक संभावना अभी दिखाई देती है।

बैसवारा क्षेत्र के यह तीन ज़िले धीरे-धीरे विस्तार ले रहे हैं। शहरी एवं ग्रामीण क्षेत्रों में आवागमन बढ़ा है और साथ ही शहर-कस्बों के भीतर वाहनों की संख्या काफी बढ़ गयी है। किसी स्थान के सम्पूर्ण विकास के लिए यातायात और संचार के साधन होना एवं संचार सुगम होना बहुत आवश्यक है। बड़े शहरों में तो संचार के साधन सुगम लगते हैं लेकिन अभी भी हमारे शहरों में इनका पूरा जाल नहीं फैला है। साथ ही, लालबत्तियों पर पैदल पार करने के लिए भी ज़ेबरा क्रॉसिंग और सिग्नल लाइट की व्यवस्था नहीं है।

एक तथ्य यह भी है कि यातायात और संचार से जुड़ी ये व्यवस्थाएं केवल तकनीकी बातें नहीं हैं, यह शहरों की संस्कृति का हिस्सा होती हैं। मीडिया के सहयोग से काफी कुछ किया जा सकता है। पुराने एवं ज़्यादा प्रदूषण फैलाने वाले वाहनों पर रोकथाम, रिक्शा-तांगा, टेम्पो आदि के लिए अलग से व्यवस्था बनाने और उनको सूचित करने की ज़रूरत है। शहरों के विकास का खाका खींचने में वहां के नागरिको की भागीदारी होना भी आवश्यक है। एक सोच का विषय यह भी है कि क्या यह केवल ट्रैफिक पुलिस के हिस्से की ज़िम्मेदारी है?

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