जून में YKA हिंदी के वो 10 लेखक जिन्होंने आवाज़ उठाई उसपर जो ज़रूरी है

Posted by Prashant Jha in Hindi, Staff Picks
June 30, 2017

जून के महीने में हमारे देश ने बहुत कुछ देखा और बहुत सारे मुद्दे हम सब से होकर गुज़रें। इन तमाम ज़रूरी मुद्दों पर देशभर से Youth Ki Awaaz हिंदी के लेखकों और पाठकों ने जमकर लिखा और अपनी बात कही। हमारे साथ इस महीने बहुत सारे नए राइटर्स भी जुड़ें और भारत पाकिस्तान मैच, समाज में फैल रहे तनाव से लेकर अपने निजी अनुभवों पर सबकुछ बेझिझक और बेबाकी से लिखते रहें। हम आज जून में YKA हिंदी पर लिखने वाले ऐसे ही 10 लेखकों से आपको रूबर करवा रहे हैं जिनके लेखों ने चैलेंज किया समाज के तय ढर्रे को और दिखाई बदलाव की एक राह।

1. अदिति शर्मा का DU एडमिशन में ब्राह्मणवाद का निजी अनुभव

अदिति ने जून महीने में पहली बार Youth Ki Awaaz पर लिखना शुरु किया। अदिति का ये लेख दिल्ली विश्वविधालय के हिंदी डिपार्टमेंट में दाखिले की प्रक्रिया में मौजूद ब्राह्मणवाद के निजी अनुभव को साझा करता है।

अदिति की पहली कहानी पढ़िए

रोल नंबर भेज देना DU में एडमिशन हो जाएगा, आखिर तुम ब्राह्मण हो

नॉर्थ कैम्पस, दिल्ली विश्वविद्यालय का हिंदी विभाग! मौक़ा था हमारे एम. फिल इंटरव्यू का, लिखित परीक्षा अच्छे अंकों से पास कर लेने पर अपनी पांच सालों की पढ़ाई पर थोड़ा भरोसा लेकर हम इंटरव्यू हॉल में पहुंचते हैं। वहां पांच पुरुष-प्रोफेसर्स के बीच सुशोभित अकेली महिला-प्रोफेसर आश्वस्त करती है कि संख्या कम है लेकिन है। उनकी मेज़ पर चाय बिस्कुट और समोसे !

हमारी पीढ़ी जो कि अपनी निजी, सामाजिक, राजनीतिक किसी भी प्रकार की समस्या से ग्रस्त होकर अवसाद या कुंठा का शिकार आसानी से हो सकती है, इस प्लेटफॉर्म की वजह से अपनी बात रख सकती है। Youth Ki Awaaz मंच पर उठी एक आवाज़ शायद दूसरों को भी साहस दे। – अदिति को YKA पर फॉलो करें।

2. निदा ज़हरा बुजुर्गों के अकेलेपन को सामने लेकर आईं

निदा ज़हरा ने भी YKA पर जून में ही लिखना शुरु किया। निदा ने अपने पहले आर्टिकल में अपने पड़ोस की एक बुजुर्ग महिला के अकेलेपन के ज़रिए हमारे समाज में उम्रदराज़ लोगों के प्रति रवैय्ये को बखूबी सामने रखा।

निदा की पहली स्टोरी पढ़िए

”किस्मत वाले हैं वो बुज़ुर्ग जो अपने बच्चों के साथ रहते हैं”

बुढ़ापा-आज नहीं तो कल सबको आना ही है। बेशक वो बुज़ुर्ग क़िस्मतवर हैं जो बुढ़ापे में अपनी औलाद के साथ रह पाते हैं। आज के समाज में तेज़ी से फैलते हुए ‘न्यूक्लियर फैमिली’ कल्चर ने ‘जॉइंट फैमिली’ के काँसेप्ट का जड़ से सफाया कर दिया है। छोटे शहरों में भी अब लोग अलग-अलग, अपनी फैमिलीज़ के साथ रहना ही ज़्यादा पसंद करते हैं। अपनी फैमिलीज़ यानी अपनी बीवी /अपना शौहर और अपने बच्चे!

Youth ki Awaaz हिंदी आज की जेनरेशन के मद्देनज़र एक बहुत ही बेहतरीन प्लेटफॉर्म बन चुका है। यहां पब्लिश्ड हर आर्टिकल की ख़ास बात ये है कि पाठक एक पल में लेखक द्वारा उठाये गए मुद्दे से ख़ुद को कनेक्ट कर लेता है, जो की सोते हुए ज़हन को जगाने के लिए बहुत ज़रूरी है। – निदा को YKA पर फॉलो करें

3. हरबंश सिंह ने किया भारत-पाकिस्तान के पुराने क्रिकेट मैचों से नॉस्टैलजिक

हरबंश सिह YKA के एक नियमित पाठक और लेखक हैं। हरबंश अलग-अलग मुद्दों पर बेबाकी से लिखते रहते हैं। 1984 दंगों पर हरबंश ने काफी लिखा है, और इस दौरान के उनके निजी अनुभव हम सबको पढ़ना चाहिए।

पढ़ें हरबंश सिंह की इस महीने की बेहतरीन स्टोरी

यादों की पिच पर भारत पाकिस्तान के क्रिकेट मुकाबले

बड़े-बड़े लोग कह गए हैं कि इतिहास अक्सर खुद को दुहराता है। कभी-कभी तारीख तो बदल जाती है लेकिन वक्त वहीं ला खड़ा करता है जहां से हम कभी होकर गुज़रे थे। घड़ी की सुई एकबार फिर उसी जगह आकर अटक गई है जहां 2007 में T20 वर्ल्ड कप की

फेसबुक से YKA के बारे में पता चला और मैं लिखता चला गया। लिखना मेरे लिये एक दवाई की तरह है, मैं जुनून की हद तक रात, दिन, लंच टाइम, हर जगह हर वक़्त लिखता हूँ, लेखन को प्रोत्साहित करने के लिये धन्यवाद YKA। – हरबंश को YKA पर फॉलो करें

4. अफ़ाक़ ले गए अपने बचपन वाले मुहल्ले की सैर पर

जून अफ़ाक़ के लिए भी, YKA पर लिखने की शुरुआत करने वाला महीना था। अफ़ाक़ ने देश में बढ़ते सांप्रदायिक माहौल को अपने बचपन की यादों से बड़े ही सहजता से कम करने की कोशिश की। एक मुस्लिम बच्चे का हिंदू मुहल्ले में बड़ा होना और इतने प्यार के साथ बड़ा होना।

एक नज़र डालिए अफ़ाक़ की कहानी पर

मेरा मुहल्ला हिंदू भी था मुसलमान भी था…

भगवा पाप-पुण्य, भगवा देशभक्ति, गाय का दूध, गोबर और मोदी-योगी सरकार: बचपन की बातों से शुरुआत करता हूँ जब बालमन निश्छल और पवित्र हुआ करता था। बचपन में जब गाँव छोड़कर पढ़ाई करने हम क़स्बे में रहना शुरू किए थे तो स्कूल से बाहर का जो समाज हमने देखा उसमें मोटे की चाय और कुन्ने की पान का अहम रोल है!

निहायत ही निष्पक्ष और सरल ढंग से उभरते लेखकों की पीड़ा और मर्म को जगह देने के लिए हम आपके आभारी हैं। उम्मीद है कि Youth Ki Awaaz हिंदी ऐसे ही समाज के प्रति अपने कर्तव्यों का सतत निर्वहन करती रहेगी। – अफ़ाक़ अहमद को YKA पर फॉलो करें

5. देश में जातिगत आरक्षण क्यों ज़रूरी है, बताया मयंक ने

आरक्षण के मुद्दे पर गंभीरता से अपनी बात रखते हुए मयंक ने लिखा कि कैसे जातिगत बंटवारे के सामाजिक भेदभाव से निपटने के लिए आरक्षण बेहद ज़रूरी है। मयंक ने आरक्षण खत्म करने की मांग करने वाले लोगों से कहा कि जबतक उंची जाती के लोग अपनी जातिगत विरासत को नहीं छोड़ेंगे तबतक आरक्षण खत्म करना आसान नहीं है।

पढ़िए आरक्षण पर मयंक का पक्ष

मैं आरक्षण छोड़ दूंगा, पहले तुम अपनी विरासत तो छोड़ो

आरक्षण एक शब्द जिसने देश की तस्वीर और तक़दीर ही बदल दी। बाबा साहब की इसी विरासत पर सियासत अपने उफान पर है। आज देश भर में उच्च जाति के लोग जो आरक्षण से वंचित हैं उनकी मांग है कि या तो हमें भी आरक्षण दो या फिर आरक्षण हटाओ।

मयंक को YKA पर फॉलो करें

6. निलेश भगत ने पूछा कि बीवी को शादी के गिफ्ट में टॉयलेट कौन देता है?

निलेश ने जून में YKA पर पहली बार टॉयलेट एक प्रेम कथा और टॉयलेट पर बनी अन्य फिल्मों के बारे में लिखते हुए ग्रामीण इलाकों में टॉयलेट की ज़रूरतों के गंभीर मसले पर बात की। गंभीर मुद्दे पर सहजता से कैसे बात की जा सकती है वो निलेश के इस आर्टिकल से बहुत हद तक साफ हो जाती है।

निलेश के सवाल का जवाब ढूंढिये उन्हीं के लेख में

बीवी को शादी के गिफ्ट में टॉयलेट कौन देता है भई!

एक फिलिम आ रही है, टॉयलेट-एक प्रेम कथा । हैं!! ई कइसन नाम हुआ बे? अब फिलमे अइसन है, त नाम का रहेगा? अच्छा!

Youth Ki Awaaz हिंदी जैसा एक मंच, जहां मेरे ब्लॉग के लिए लिखी रचना को जगह मिली, मेरे लिए बड़ी बात रही, क्योंकि यहां मिले मुझे ढेर सारे पाठक। – YKA पर निलेश से जुड़ें

7. राजीव चौधरी पूछ रहे हैं कि लड़के हमारे समाज में कोमल क्यों नहीं हो सकते?

ब्रिटेन के एक स्कूल में लड़कों द्वारा स्कर्ट पहनकर विरोध जताए जाने की घटना को आधार बनाकर राजीव ने बखूबी ये मुद्दा सामने रखा कि आखिर क्यों हम लड़कों को रफ एंड टफ वाले रोल में बांध कर छोड़ देते हैं? आखिर लड़कों के अलग रूप को क्यों नहीं स्वीकारा जाता?
पढ़िए राजीव चौधरी का लेख

स्कर्ट पहने इन ब्रिटिश लड़कों ने सामाजिक बराबरी पर भी सवाल खड़ा किया है

ब्रिटेन के डेवोन में स्कूल प्रशासन ने करीब 30 लड़कों को शॉर्ट्स पहनकर स्कूल आने से मना किया तो उन्होंने स्कर्ट पहनकर इसका विरोध जताया। दरअसल छात्रों ने बढ़ती गर्मी के कारण स्कूल से यूनिफॉर्म बदलने की गुज़ारिश की थी, लेकिन उन्हें मना कर दिया गया। विरोध प्रदर्शन में हिस्सा

Youth Ki Awaaz पर बिना किसी पूर्वाग्रह के एक खुली सोच को स्वीकार किया जाता है। YKA के रूप में आज हमारे पास एक मंच है जो हमारे हर अच्छे बुरे अनुभव को साझा करने के साथ हमारी आवाज़ देश और दुनिया तक पहुंचाने का कार्य कर रहा है। – राजीव से YKA पर जुड़ें

8. तस्नीफ हैदर लेकर आए उर्दू के बारे में वो जानकारियां जो कहीं और मिलना मुश्किल है।

अपनी रिपोर्ट में तस्नीफ ने उर्दू और हिंदी की समानता और भाषा की समझ को बेहतरीन ढंग से समझाया। इस लेख में भाषा को मज़हब से जोड़ने के गलत तर्क पर भी गहरा सवाल किया गया है।

अपनी भाषा की समझ को तस्नीफ की नज़रों से समझिए

क्या उर्दू वाक़ई कोई अलग भाषा है ?

इस वक़्त मेरे पास बहुत-सी किताबें नहीं हैं कि मैं अपना कहा सिद्ध करने के लिए मोटे-मोटे तर्क प्रस्तुत कर सकूं। यह ज़रूर है कि जो अब तक मैंने पढ़ा है और उर्दू भाषा और साहित्य के इतिहास जितना मेरा परिचय है वह मुझे अक्सर सोचने पर मजबूर करता है

तस्नीफ को YKA पर फॉलो करें

9. उमेश कुमार ने बैठे-बैठे सैर करवा दिया फ्रांस के राजा के टॉयलेट का

उमेश काफी मुखरता से लगातार YKA पर अपनी बात लिखते रहे हैं। राजनीतिक टिपण्णी से लेकर समसामयिक घटनाओं पर उमेश मज़बूती से अपना पक्ष रखते हैं।

पढ़ें उमेश कुमार की एक दमदार स्टोरी

फ्रांस के राजा, इंग्लैंड की रानी और महात्मा गांधी सबका टॉयलेट है यहां

11 जून को जारी ‘टॉयलेट: एक प्रेम कथा’ फिल्म के ट्रेलर को खूब सराहना मिल रही है। ट्रेलर रिलीज़ के बाद से फेसबुक पर अब तक 11 मिलियन लोग इसे देख चुके हैं। यूट्यूब पर इसे अब तक 12 मिलियन लोगों ने देखा है। श्री नारायण सिंह के निर्देशन में

Youth Ki Awaaz हिंदी के लिए लिखते हुए मुझे अहसास हुआ कि यह वैसे पत्रकारों के लिए भी बेहतर प्लेटफॉर्म है, जो काम तो एक बीट पर करते हैं, लेकिन दूसरे विषयों पर भी लिखने की हसरत रखते हैं। – जुड़ें उमेश से YKA पर

10. हितेश चौरसिया ने हिंदी भाषा के साथ हमारे व्यवहार पर हकीकत का तंज किया

अंग्रेज़ी को भारत में जो स्पेशल स्टेटस मिला हुआ है और हिंदी को जिस तरह से हम देखते हैं उसपर हितेश ने हिंदी मीडियम फिल्म के ज़रिए बेहतरीन तरीके से हमसे सवाल किए हैं।
पढ़ें हिंदी मीडियम पर हितेश का नज़रिया

क्या हिंदी मीडियम श्यामप्रकाश की कहानी हो सकती थी?

लेख का शीर्षक शायद थोड़ा अटपटा लगे, लेकिन एक अच्छी फिल्म की यही खासियत होती है कि उसके कई आयाम होते हैं या हो सकते हैं। हिंदी मीडियम, अंग्रेज़ी के प्रति आज़ाद भारत में बढ़ते दास भाव, और शिक्षा के व्यवसायीकरण जैसे गंभीर विषय को मनोरंजक ढंग से प्रस्तुत करती

Youth Ki Awaaz पर विषय को एक संपूर्णता के साथ प्रस्तुत किया जा सकता है। एक ही मंच पर इतने सारे विषयों पर लेख, प्राप्त होना सुखद अनुभव है। यह मेरा पहला लेख था और मैं आगे भी लिखना चाहूंगा। – हितेश को YKA पर फॉलो करें।

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