अधूरा ख़त :- उड़ चली चिरैया

Posted by shivam nahar
July 17, 2017

Self-Published

पर्दे को सरकाके,सेहमी सी,डरी सी, आँखों को मीचती,किरणों को आने का मौका दे रही थी। ये उन सात महीनों में पहली बार था,जब उसने अपने आपसे किसीको मिलने का मौका दिया था। पलकें वो नम थी,उंगलियों में कुछ हड़बड़ाहट थी, लफ़्ज़ों को कैद करना चाहती थी उस कागज़ पे। भला करती भी क्या :- उसकी चीखें सुनने वाला बचा ही कौन था, उस अन्याय को
बयां करने वाला अब बचा ही कौन था। सब मस्तमग्न थे,क्योंकि उनके घर के कोनों ने कभी
महफ़िल के मौन को नही सुना था, उनकी चौखट से कभी रिश्ते और इज़्ज़त के जनाज़े नहीं निकले। वो महफ़ूज़ हैं अपने शबिस्तान में, उन मखमल के गद्दों पे, उन्होंने कभी महसूस ही कहाँ की उस चादर की सिलवटों की चुभन।

अब कैसे कहे वो, अब कैसे सहे वो, कैसे उस खोई हुई आबरू को वापस से पाए वो। अब कदम से ज़्यादा, कलम उसकी चलती है, मोहब्बत से ज्यादा, वो माफी को लिखती है। गलती कुछ नही बस इतना सा पाप था, उन रोज़, उस रात में, उसे मोहब्बत से इनकार था। हश्र कुछ ऐसा किया उन दरिंदो ने नादान का, परछाईं से भी डरने लगी खुद की, उस अंधेरे में। पहले जो निहारते थे,उसे अपनी ज़ुबान से-उन शब्दों में, आज टेड़ा मुख किये निकल जाते हैं मौन में।

बदल चुके हैं सब यहां घड़ी के काँटों से,पुकारता अब कोई नहीं, उसे मोहब्बत भरे अल्फ़ाज़ों से। रुकी हुई कलम और फैली हुई रक्त की स्याही के उसे पास पाया। उस खून से लधपत ख़त को जिसे मैंने अभी आपको सुनाया। वो आसुंओ से सराबोर, सदाकत को बताना चाहती थी। कुछ कह भी ना सकी अपनी आप-बीती। उस खिड़की के जरां इस ख़त को जब लिखा था, उसी के जरां अपना दम तोड़ दिया। दुखी तो इतना थी कि उन किरणों की साँझ का इंतज़ार भी ना किया और अंधकार की उस रात को, उस उजाले में,अपनी बाहों में ले लिया। फिर उस साँझ का सूर्य कभी उदय न हुआ। आखिर ये क्यों हुआ..??
©shivamnahar

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