अधूरे सपने-न जाने और क्या-क्या गुज़रती होगी उस परिवार पर जब कोई फ़ौजी तिरंगे में लिपटकर आता

Posted by sat_ender
July 20, 2017

Self-Published

Fiction (A Short Story of a Soldier’s Family)-

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लीला की शादी को एक महीना हुआ है अभी तक उसके हाथों की मेहँदी नहीं उतरी वैसी ही सुर्ख़ लाल है। बाल बिखरे हुए हैं, उसके आसपास कुछ चूड़ियाँ पड़ी हैं बिल्कुल वैसी ही जैसी उसने शादी के दिन पहनी थी। लीला एक कोने में बैठी सर झुकाए सिसक-सिसक के रो रही है, तभी फ़ोन की घंटी झनझना के बजती है और लीला की आँखों में एक ख़ुशी की लहर दौड़ जाती है। हेलो हेलो लीला सुन रही हो मैं शशिधर बोल रहा हूँ, हाँ सुन रही हूँ लीला आँसू पोंछते हुए एक लम्बी साँस लेकर बोली कैसे हो ? तुम्हारे बिना कैसा हो सकता हूँ, बस कुछ दिन और मैं जल्दी वापस आ जाऊँगा, बस बॅार्डर के हालात सुधरने वाले हैं और जब मैं लौटू्ँ तो तुम वही सुहागरात का जोड़ा पहनना ताकि जो लम्हा मैं छोड़कर आया हूँ वो फिर से जी उठ्ठे। और मां के घुटने के दर्द का क्या हुआ ? कुछ ख़ास नहीं वैसा ही है, मैं रोज़ मालिश कर देती हूँ तो थोड़ा आराम मिल जाता है, पर तुम्हें बहुत याद करती हैं कहती हैं । कहती हैं इस बार जब शशिधर आएगा तो उससे बोलूँगी की हमें गंगा सागर घुमा लाए न जाने कितने दिन बचे हैं अब मेरे पास !  मुझसे तो माँ का ये हाल देखा नहीं जाता ! ओके माँ से कहना इस बार हम सब गंगा सागर चलेंगे।

अच्छा गुड्डी कैसी है पढ़ाई वढ़ाई ठीक से करती है या नहीं ? हाँ करती है और दिन रात रट लगाए रहती है भइया कब आएंगे मुझे एक लेपटोप लेना है, एक मोबाइल भी लेना है । उसे बोलना जल्द ही आ जाऊँगा, लीला की आँखों से फिर आँसू छलक गए और भरे गले से बोली मैं भी इंतज़ार करूँगी । अरे पगली रोती क्यों हो, तुम तो जानती हो अभी सीमा पर हालात ठीक नहीं है पर चिंता मत करो मैं जल्द लौटूँगा । और मैं तुम्हारे मन का हाल जानता हूँ,  तुम्हारे भी तो कितने सपने है मैं वादा करता हूँ आते ही सबसे पहले पहले मैं तुम्हारा दाख़िला बीएड में करवा दुंगा ताकि तुम्हारा टीचर बनने का सपना पूरा हो सके। चलो अब रोना बंद करो चुप हो जाओ, मैं रखता हूँ अपना ध्यान रखना ।

रुको एक बात कहनी है जिस दिन तुम लौटो तो वो गुलाबी रंग की कमीज़ पहन कर आना लीला सिसकते हुए बोली । गुलाबी रंग की  कमीज़ शशिधर ने सोचते हुए कहा ? हाँ तुम्हारे बैग में मैंने एक गुलाबी रंग की कमीज़ रख दी थी, और मैं चाहती हूँ जब तुम मेरे सामने आओ तो वही कमीज़ पहन कर आओ। ठीक है लीला जी मैं वही कमीज़ पहन कर आपसे मिलूँगा अच्छा अब मैं रखता हूँ।

फ़ोन रखते ही लीला के आँसू फिर छलक पड़े न जाने क्यों आसमान उस दिन गुलाबी था और पूरे आसमान में एक अजीब सी ख़ामोशी छाई हुई थी। लीला दहाड़े मार मार कर रोने लगी और हाथ ज़मीन पर पटकने लगी और उसकी शादी के चूड़े से कुछ और चूड़ियाँ उसके चारो तरफ़ बिखर गई । केप्टन शशिधर का मृत शरीर तिरंगे में लिपटा उसके सामने पड़ा था और उसके दिमाग़ में बस फ़ोन की घंटी बज रही थी वो पागलों की तरह बार बार बस फ़ोन उठाकर शशिधर से बात कर रही थी तमाम वो बातें जो कल हुई थी शशिधर को गोली लगने से पहले।

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सतेन्द्र कुमार ‘मनम’

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