अब भीड़ से डर लगने लगा है

Posted by Kundan Kumar
July 3, 2017

Self-Published

पहले एकांत रास्तो में चलने से डर लगता था, अब भीड़ से डर लगने लगा है

चाहे वो रेलवे स्टेशन के इकट्ठा भीड़ हो, या चाहे वो गौ रक्षको की भीड़ हो, चाहे वो जुम्मे के नमाज़ के बाद मस्जिदों से निकली भीड़ हो, चाहे वह किसानों की भीड़ हो, चाहे वह बंगलुरु के नए साल का जश्न मनाने वाले शिक्षितो की भीड़ हो या फिर झारखण्ड के कम जागरूक ग्रामीणों की भीड़ हो, अब भीड़ से डर लगने लगा है।

ये घटनाये (भीड़ द्वारा की किसी को जान से मारना) इसलिए बढ़ी है क्योंकि भीड़तंत्र में शामिल लोगो को लगता है कि भीड़ में रहने से उनको कोई पहचान नहीं पायेगा एवमं क़ानूनी करवाई से बच जाएंगे। उनका यह सोचना काफी हद तक सही भी है क्योंकि इस तरह के अपराध में आजतक मैंने किसी को सजा पाते हुए नहीं सुना है।

2007 में बिहार के वैशाली में 10 नट समुदाय के लोगो को भीड़ ने मार दिया था, पर उस गुनाह पर किसी को सजा मिली है कि नहीं, आज तक पता नहीं चल पाया | इसी तरह का हाल अन्य घटनाए में है |

लेकिन क्या कानून के द्वारा सजा देने से ये अपराध रुकेंगे ? नहीं, ये अपराध होते रहेंगे जब तक हमारी अभिवृति में बदलाव नहीं आता है| जब तक लोग पूर्वाग्रह से ग्रस्त रहेंगे एवं दुसरे को निचा समझते रहेंगे एवं स्वयं को सर्वश्रेष्ठ समझते रहेंगे, ये अपराध होते रहेंगे | लोगो की अभिवृति तुरन्त तो नहीं बदलेगी, लेकिन जब प्रशासन (न्यायपालिका एवं कार्यपालिका )अपना काम  ईमानदारी से करेगी तो बहुत हद तक इस पर लागम लगाया जा सकता है |

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