अमरनाथ आंतकी हमला.

Posted by हरबंश सिंह
July 12, 2017

Self-Published

पिछले कुछ समय से घटना कर्म बहुत तेजी से बदल रहे है, कुछ दिन पहले किसानों की आत्म हत्या और उनके प्रति समाज और सरकार का निराहार स्वभाव सुर्खियों में था, फिर अचानक से दिल्ली में जुनेद पर भीड़ ने हमला कर दिया, ईद से कुछ दिन पहले हुये इस हमले ने सारे देश को झंझोड़ दिया और इसके विरोध में एक आम नागरिक जंतर मंतर से लेकर देश के हर शहर और कस्बे में इस भीड़ के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद करने लगा, इसी बीच हमारे प्रधान मंत्री अमेरिका की सरकारी यात्रा पर थे जिन्होंने भीड़ पर द्वारा किये जा रहे अपराध पर एक तरह से चुपी साध रखी थी लेकिन कुछ दिनों बाद साबरमती आश्रम में इन्होंने अपने व्यक्तव में भीड़ द्वारा किये जा रहे अपराधों की निंदा की.

इसी बीच प्रधान मंत्री की तीन दिन की इजराइल की यात्रा भी सुर्खियों में बनी रही लेकिन जून के मध्य तक आते चीन द्वारा भूटान की सीमा से सटीक सड़क निर्माण और इस पर भारत का इस तर्ज पर विरोध की भारत की सेना ने चीन द्वारा किया जा रहा सड़क निर्माण बंद करवा दिया, और दोनों ही सेनाये यँहा आमने सामने खड़ी हुई है, बीच बीच में दोनों तरफ से राजनीतिक ब्यान आते रहे है लेकिन सीमा पर दोनों ही पक्ष पीछे हटते हुये नही दिखाई दे रहे, इसी बीच 30 जून की मध्य रात्री को जीएसटी बील को लागू कर दिया, ऐसा कहा जा रहा है की ये टैक्स रिफॉर्म में एक क्रांति कारी कदम है, लेकिन एक आम व्यपारी अभी भी कसम कस में है, की जीएसटी को किस तरह से कार्यवंतीत करना है, इसी बीच सूरत शहर के व्यपारी खासकर कपड़ा व्यपारी जीएसटी का खुल कर, सड़क पर आकर विरोध कर रहे है, आम चर्चा भी छिड़ी हुई है की इससे मंहगाई में वृद्धि होगी और एक आम नागरिक पर इसका बोझ और ज्यादा पड़ेगा. मसलन, अगल पिछले 2 महीनो की घटना कर्म पर नजर रखे तो खबरों का बाजार बहुत गरमाया हुआ है और इसी बीच एक आम नागरिक भी इससे कही जुड़ रहा है, वह भी अपनी एक राय बना रहा है, आज आम नागरिक भूख, बेरोजगारी, अशिक्षा, सुरक्षा, मंहगाई, इन सभी मुद्दों पर सवेदनशील और चिंतित तो है, लेकिन देश की सुरक्षा और आंतकवाद के नाम पर वह सरकार और देश के साथ खड़ा है और उसका तर्क है की हम एक वक़्त भूखे रह लेगे, लेकिन देश की सुरक्षा से कही कोई कुताही, स्वीकार नही है.

तारीख 10/जुलाई/2017, दिनाक सोमवार, कुछ रात के 9 – 9.30 बजे होंगे अभी ऑफिस से घर ही पहुँचा था, की फेसबुक एक मैसेज आया की अमरनाथ की यात्रा के दौरान एक बस पर आंतकवादी हमला हो गया है, इस पर यकीन करने के लिये दो अलग अलग हिंदी न्यूज़ चैनल की वेब साइट को अपने फोन पर खोला, एक जगह इसे एक खबर के रूप में दिखाया गया था, सबसे ऊपर इस खबर में सामान्य से शब्द थे वही दूसरे न्यूज़ चैनल की वेब साइट पर विभिन्न प्रकार से 4-5 खबरे इसी संदर्भ में थी, मुझे समझ नही आ रहा था की असलियत में ये हमला कैसे और कहा हुआ, लेकिन व्यक्तिगत रूप से मैं किसी भी प्रकार से हिंसा को कही भी किसी भी संदर्भ में स्वीकार नही करता और इस हमले की कड़ी निंदा और अफ़सोस करने के साथ, व्यथित मन से कुछ समय के लिये इस खबर से खुद को अलग कर लिया.

लेकिन, मैं चाह कर भी इसी खबर से खुद को अलग नही कर पा रहा था, इसका कारण था पिछले कई समय में जिस तरह समाज बिखरा हुआ है, यँहा साम्प्रदायिक माहौल ऊबाल पर है, इस माहौल में एक छोटी सी घटना भी,आग लगाने के लिये चिंगारी का काम कर सकती है, मसलन समाज का तनाव सड़क पर नंगा नाच दिखा सकता है, इसी बीच इस घटना के मात्र कुछ घँटे के बाद हमारे देश के प्रधान मंत्री श्री नरेंद्र भाई मोदी जी का सेंदेश ट्वीटर और फेसबुक पर आ गया जँहा मोदी जी ने इस आंतकवादी हमले की कड़े शब्दों में कड़ी निंदा की थी, इस तरह की घटना के बाद भारत देश की सत्ता के लोकतातंत्रिक सर्वोच्च पद से दिया गया कड़ा सेंदेश सही मायनों में सरहानीय है जँहा किसी भी प्रकार हिंसा को स्वीकार ना करना और उसकी निंदा करना अपने आप में आंतकवादियो को दिया गया एक कड़ा सेंदेश है की इस हमले के खिलाफ भारत एक देश और समाज के रूप में एक जुट है, कुछ इसी तरह का सेंदेश तारीख 11/जुलाई/2017 की शाम जंतर मंतर पर भी #NotInMyNam के द्वारा दिया गया है, ये वही सेंदेश है और वही आयोजक है जो कुछ समय पहले इसी टैग के साथ साथ जंतर मंतर पर भीड़ द्वारा कत्ल किये गये जुनेद की हत्या के विरोध में एक जुट हुये थे.

मुझे अंदेशा था की अमरनाथ की यात्रा पर हुये हमले से साम्प्रदायिक माहौल बिगड़ सकता है, सुबह होते होते सोशल मीडिया पर पकिस्तान और पाकिस्तान के समर्थको का विरोध, बहुत ही भड़काऊ शब्दो में हो रहा था, पाकिस्तान तो समझ सकते है, की एक आम भारतीय, भारत देश में पकिस्तान द्वारा दिये जा रहे आंतकवाद समर्थन के कारण पकिस्तान के खिलाफ अपना उग्र विरोध दर्ज करवा सकते है लेकिन पाकिस्तान के समर्थक कोन है ? कुछ नाम पिछले दिनों भारत में पकड़े गये है जिन पर आरोप है की ये पाकिस्तानी गुप्तचर संस्था isi को सूचना मुहिया करवा रहे थे, लेकिन ये उस समुदाय से नही थे जिस पर अक्सर भारत देश में पकिस्तान को समर्थन करने का आरोप लगता रहता है, कुछ इसी तरह पिछले महीने पकिस्तान की क्रिकेट टीम द्वारा फाइनल मैच में भारत को हराने के बाद, मध्यप्रदेश के एक गाँव में कुछ मुस्लिम युवकों पर जशन मनाने के आरोप लगे थे जँहा उन्हे गिरफ्तार किया गया लेकिन थोड़े समय बाद ही सुभाष कोहली ने आकर इस खबर का खंडन किया और सुभाष ने मीडिया को बताया की उस दिन गावँ में किसी ने कोई नारा नही लगाया और ना ही जशन मनाया है, ये वही सुभाष था, जिसे पुलिस ने मुख्य फरयादी बताया था की इसने ही पुलिस को खबर की थी गावँ में पकिस्तान की जीत पर जशन मनाया जा रहा है. (http://indianexpress.com/article/india/no-one-knows-who-cheered-pakistan-win-sedition-charge-dropped-4717788/)

अमरनाथ यात्रा के हमले के दूसरे दिन, एक मुख्य गुजराती अखबार इसी खबर को प्रमुखता से दिखा रहा था, जिसके मुख्य पृष्ठ पर और आखरी पेज पर, विस्तृत रूप से इसी खबर को प्रकाशित किया गया था,  इसी खबर को पढ़कर मुझे ज्ञात हुआ की बस गुजरात प्रदेश की थी और जिनकी आंतकवादियो ने हत्या की है वह भी गुजराती समुदाय के नागरिक थे, गुजराती अखबार की खबर और बस पर आंतकवादी हमला, मुझे कुछ कुछ गोधरा में जलाई गयी साबरमती ट्रैन की याद दिलवा रहा था, मैं इस आंतकवादी हमले से तो दुखी हूँ ही लेकिन मन असमंजस में है की कही 2002 के दंगे, फिर ना भड़क जाये, हमेशा ड़र तो लगा रहता ही है. मुझे याद है, की जब श्री राजीव गांधी जी की हत्या एक आतंकवादी हमले में हुई थी, तो हमारा परिवार किस तरह सहमा हुआ था हमैं श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या के बाद भड़के दंगे याद आ रहे थे, हमारी जान में जान तब आयी थी, जब इस तथ्य का ज्ञात हुआ की इस हमले में कोई सिख शामिल नही था,  यँहा इस तथ्य को समझने की जरूरत है जब जब देश में कोई बड़ा नेता या बहुसंख्यंक समाज का नागरिक किसी आतंकवादी हमले में मारा जाता है तो अलप संख्यंक समाज का ड़र अपनी चरम सीमा पर होता है, उसे इस बात का अंदेशा होता है की कही ये आंतकवादी हमले का विरोध उसकी जान माल से ना चुकाया जाये.

लेकिन गनीमत रही, कुछ न्यूज़ चैनल ने इस खबर को बहुत तरजी दी की बस का ड्राइवर सलीम ने किस बहादुरी के साथ इस आंतकवादी हमलें का विरोध किया और किस तरह बस को तेज चलाकर, बहुत से यात्रियों की जान बचाई, सलीम की तरह हम सब को दुःख है की इस हमले में मारे जाने वाले बाकी 7 मुसाफिर भी काश इस आंतकवादी हमले से बच जाते, लेकिन सलीम की इस बहादुरी से, जँहा समाज को एक सेंदेश गया की आंतकवाद, एक हिंसा का नाम है और इसे किसी मजहब और धर्म से जोड़कर नही देखना चाहिये, इसी के तहत साम्प्रदायिक माहौल भी संभल गया, फेसबुक भी नफरत की पोस्ट कम हो गयी है.

अपने, अनुभव से मैं ये कहना चाहता हूँ की आज समाज का हर नागरिक चाहे वह किसी भी समुदाय से हो शांति और अमन पसंद है, वह अपने जीवन को सुखमयी बनाने के लिये, अपने परिवार, समाज, देश को पूरी तरह समर्पित है, हमैं समझना होगा की जब जब इस देश में आंतकवादी हमला होता है तब तब देश में कही भी मौजूद अलप संख्यक समाज का नागरिक भयभीत होता है, उसका किसी भी आंतकवादी हमले से कोई सरोकार नही होता लेकिन उसे इस बात का अंदेशा होता है की कही आंतकवादी हमले से किसी भी तरह का साम्प्रदायिक माहौल बिगड़ा तो उसकी आंच इसके घर, परिवार को जला कर दफ़न कर सकती है, ये अलप संख्यक समुदाय ड़र में जीता है. हमैं इसे समझना होगा की आंतकवाद का यही कथन है की किसी तरह से समाज को बाट दिया जाये, लेकिन हमैं भारत की अनेकता में एकता का मंत्र देकर इसे कामयाब होने से रोकना होगा, सरकार को जँहा इस आंतकवादी हमले की ईमानदारी से जांच करवा कर दोषियों को सजा देनी चाहिये वही हमैं आमिरखान की एक फिल्म सरफरोश देखनी चाहिये जँहा फिल्म का एक वतन पर निछावर होने वाला, एक ईमानदार छवि का किरदार कहता है “एक नही 10 हजार सलीम मिलेगे, अगर आप भरोसा करेगे तो, बस फिर किसी सलीम से मत कहना की मुल्क उसका घर नही”.

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