और फिर मुर्दे बोलेंगे … । (कहानी आजकल की)

Posted by Ek Aam Aadmi
July 29, 2017

Self-Published

अब तक तो वो लाश हो चुका होगा। लोगों ने उसे  मोटी लाठी और लोहे की छड़ों  से सरेआम तब  तक मारा जब तक कि कोई आह भी निकली हो।  वह एक सीधा -सादा आम आदमी था जिसकी जीते जी सरकार को कोई खबर नहीं थी। अब उसकी  खबर बनेगी। अख़बार- टीवी वाले पूछेंगे क्या यह असहनशीलता नहीं है, कि किसी को खाने के कारण-लिखने के कारण  मार  दिया जाय, कुछ डरे छुपे लोगों में प्रतिरोध का माहौल देख सरकारी उपेक्षा के शिकार बुद्धिजीवी और कलाकारों में थोड़ा साहस आएगा,  वो जोर  जोर  से चिल्ला उठेंगे, हाँ हाँ घनघोर असहनशीलता है, हम सरकार से इसका जवाब मांगते हैं, और कुछ लोग तैश में पुरानी सरकारों  के दिए हुए जंग खाए तमगे लौटा देंगे,  फिर सरकार थोड़ी सुर्सुरायेगी, मरने वाले का दोष ढूँढा जायेगा, मारने वालों को थोड़ी नसीहत दी जाएगी। और फिर भी नाराज़ लोग न मानें तो सरकार अपने चहेते बुद्धिजीवियों, कलाकारों को बुलवायेगी। वो गवाही देंगे, हम भी तो थे वहां , हमने भी तो खबर सुनी , वीडियो फुटेज  भी देखी, हमें तो कुछ बुरा नहीं लगा। सरकार के चहेते  बुद्धिजीवी कहेंगे कि ये नकली बुद्धिजीवी हैं जो औरों के दर्द पे कराहते हैं, बूढ़े लेखक, ढ़ीठ  समाजसेवक और विधर्मी  की भी हत्याएं नहीं बर्दास्त कर सकते।  घनघोर रूप से असहनशील हैं ये बुद्धिजीवी, तनिक भी तमीज नहीं है, देश का नाम ख़राब कर रहे हैं, जांच का इंतज़ार नहीं कर सकते,  और, लाशों पे राजनीति करते हैं ।  और फिर प्रतिरोध के प्रतिरोध में देश के मुख्य द्वार से मार्च शुरू कर देंगे। मुर्दों  के शुभ -चिंतक तब निराश  हो लेंगे, छुप  के गुटबंदी करें, या शायद डर के खामोश भी होलें, या एक -दूसरे को हौसला दें कि यही चलता रहा तो एक दिन मुर्दे खुद अपने लिए आवाज़ उठाएंगे, अब हम अपनी जान तो दे नहीं देंगे इस बात के लिए।  सरकार सन्नाटे से घोर सन्तुष्ट हो लेगी, और चहेते बुद्धिजीवियों , कलाकारों को  प्रायोजित अत्याचारों  के लिए अनपेक्षित सहनशीलता दिखाने के लिए तमगों से सम्मानित करेगी, और वो आह्लादित हो जयजयकार कर उठेंगे । तब तक  मारने वाले और कई लाशों  के लिए प्रबंध कर चुके होंगे। नए मुर्दों के लिए फिर कोई बात नहीं की जाएगी। कोई प्रतिरोध सभा या जुलुस  न होगा। बुद्धिमान लोग सरकार प्रायोजित विकास अभियान में दिल खोलकर सहयोग और एवज में निजी जीवन का आनंद ले रहे होंगे। सरकारी जांचों में अपनी हत्या के लिए ख़ुद मुर्दों को दोषी क़रार दिया जायेगा।जो सहमत होंगे बोलेँगे और असहमत खामोश रहेंगे। मुर्दों के हक़ में लिखना, बोलना, पढ़ना, बात करना  देशद्रोह करार  दिया जायेगा। और फिर एक दिन, सत्य और न्याय की इस धरती पर, न्यायवीरों की मुर्दा शांति से तंग आकर  मुर्दे  ही खुद के लिये कुछ बोलेंगे।

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