कतरा-कतरा खून बहा, भीड़ के हाथों जब कोई मासूम मरा

Posted by Dharmendra Singh DL
July 16, 2017

Self-Published

हाल ही के दिनों में किसी भी नेक इंसान की आँखों में आँसू ला देने वाली दो दर्दनाक घटनाएं हुई-
पहली घटना में- कश्मीर में गुरुवार(22 जून) को जम्मू-कश्मीर पुलिस के डीएसपी मोहम्मद अयूब पंडित की भीड़ ने पीट-पीटकर हत्या कर दी. पंडित जम्मू – कश्मीर सिक्योरिटी विंग में कार्यरत थे जो कि शब-ए-क़द्र के दौरान श्रीनगर की ऐतिहासिक जामा मस्जिद के बाहर सुरक्षा व्यवस्था देख रहे थे.

दूसरी घटना में- गुरुवार रात(22 जून) एक लोकल ट्रेन से दिल्ली से बल्लभगढ़ जा रहे एक 16 साल के युवक जुनैद हाफिज़ को ट्रेन में भीड़ ने पीट-पीट कर मार डाला.जुनैद बल्लभगढ़ के पास खंदावली गांव (हरियाणा) के रहने वाले थे.

अगर हम इन दो घटनाओं को हिन्दू-मुसलमान की नजर से देखें तो श्रीनगर वाली पहली घटना में ‘शब-ए-क़द्र की रात’, जिस रात को पवित्र कुरान के धरती पर अवतरण की मान्यता है उसी रात में मस्जिद के बाहर वो लोग जो अपने आपको मुसलमान कहते हैं पैगम्बर मोहम्मद का अनुयायी बताते हैं की उग्र भीड़ ने एक निर्दोष पुलिसवाले डीएसपी ‘मोहम्मद अयूब पंडित’ जो मस्जिद की हिफाजत के लिए तैनात थे को बेरहमी से पीट-पीटकर मार डाला.

दूसरी घटना में दिल्ली से बल्लभगढ़(हरियाणा) जा रहे एक युवक ‘हाफिज जुनैद’ को ट्रेन में वो लोग जो अपने आपको हिन्दू कहते हैं, गौ रक्षक बताते हैं की उग्र भीड़ ने पीट-पीटकर मार डाला.जुनैद 16 साल का था, मेरे छोटे भाई की उम्र का, मुझसे 4 साल छोटा था, उसका कसूर सिर्फ इतना सा था कि वो एक मुसलमान था.

इन दोनों घटनाओं में वहशीपन की सारी हदें पार कर दी गईं उन लोगों द्वारा जो अपने आपको मुसलमान कहते हैं, जो अपने आपको हिन्दू कहते हैं,
दरासल वो भीड़ न मुसलमानों की थी न हिन्दुओं की, वो भीड़ इंसानों के वेष में खूनी दरिंदों की भीड़ थी.

न कोई सच्चा मुसलमान किसी बेकसूर को मार सकता है, न कोई सच्चा हिन्दू किसी निर्दोष को मार सकता है. एपीजे अब्दुल कलाम कहते हैं – किसी भी धर्म में उसे बनाए रखने और बढ़ाने के लिए दूसरों को मारना नहीं बताया गया है.

अपने धर्म-मजहब के फेर में हम इंसानियत को भूल रहे हैं जबकि दुनिया का हर धर्म, मोहब्बत और इंसानियत का ही पैगाम देता है.

चाहे इस्लामिक कट्टरवाद हो या हिन्दू कट्टरवाद, हमारे देश को और इंसानियत को दोनों से खतरा है. हमें इसे समझने की जरूरत है ताकि हम ऐसी किसी वहशी भीड़ का हिस्सा न बनें और हमारे समाज में शांति, प्रेम और सौहार्द बना रहे.

भीड़ फैसले कब से करने लगी, ऐसा पहले तो कभी नहीं था हमारे भारत में, शायर इमरान प्रतापगढ़ी ठीक ही कहते हैं –

“आपकी नफरतों का जो मजनून है

उसमें स्याही नहीं खून ही खून है,

भीड़ जाने कब किसको कहां मार दे

मुल्क में आज जूतों के नीचे कानून है”

देश में आज साम्प्रदायिक उग्रवाद का जो माहौल है इसमें सरकार और राजनीति का बड़ा योगदान है,
पर हमें चाहिए कि-

“हम मंदिरों और मस्जिदों की पैरवी में मत उलझें,

दर्द के एहसास से जुड़ें और आदमी की बात करें”

#Hindi #Communalism #MobLynching

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