कानून क्यों एक अपराध की सजा अलग अलग तय करता है ?

Self-Published

नोट: सिख द्वारा किये गये हवाई जहाज अपहरण का मामला 36 साल बाद एक बार फिर नये सिरे से खोला जा रहा है, http://sikhsiyasat.net/2017/07/18/retrial-of-sikh-activists-in-36-years-old-hijack-case-a-travesty-of-justice-by-indian-judiciary/

 

क्या ये संभव हैं, की किसी अपराध को जिसे कानून के तहत सजा बनती हो लेकिन राजनैतिक पार्टी की रहनुमाई या संरक्षण के कारण, अपराधी को सजा ना देकर राजनैतिक फायदा किया जाये, घोटाला, दंगे, इत्यादि अपराधिक मामलों में हो रही जांच या कानूनी कार्यवाही में बरती जा रही ढिलाई तो जग जाहिर हैं की किस तरह अपराधी को बचाने की कोशिश की जा सकती हैं.  लेकिन जहाँ अपराध एक आइने की तरह साफ़ हो और अपराधी भी अपने अपराध का इजहार गर्व से कर रहा हो, परंतु  राजनैतिक पार्टी द्वारा बनाई गयी भारतीय व्यवस्था इन्हें सजा ना देकर, चुनाव के अंतर्गत अपना उम्मीदवार घोषित कर दे.

इमरजेंसी के बाद हुये लोकसभा चुनाव में इंदिरा गांधी और कांग्रेस को भारी हार का सामना करना पड़ा था, भारतीय समाज, इनसे इतना नाराज था की १९७१ में पाकिस्तान को युद्ध में हराने का श्रेय इंदिरा गांधी जिन्हें दुर्गा माँ कहकर सम्मान दिया गया  था, इन्हें  यहाँ जनता द्वारा भारत की केंद्र सत्ता से उखाड़ कर फैक दिया गया. जनता दल और बाकी पार्टी के संगठन द्वारा बनी गयी सरकार के प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई के हुक्म से इंदिरा गांधी को जेल भेज गया. जिसका पूरे देश में कांग्रेस पार्टी के कार्यकर्ता द्वारा उग्र रूप से विरोध किया जा रहा था.

इसी के तहत, तारीख २० दिसम्बर १९७८, भारतीय एयरलाइन्स का जहाज आई.सी.४१०, जो लखनऊ से दिल्ली, की अपनी तय उड़ान पर था, यहाँ दो व्यक्ति यात्री भोला पांडेय और इनके मित्र देवेंद्र पांडे के रूप में सवार थे  और इन दोनों ने हथियार की तरह दिखने वाले खिलौने मात्र से, हवाई जहाज को अपहरण करके इसे वाराणसी हवाई अड्डा पर उतारने में कामयाब रहे, इन्होने अपनी पहचान यूथ कांग्रेस के कार्यकर्ता के रूप में करवाई और  इनकी मांग थी की सरकार तुरंत इंदिरा गांधी को जेल से छोड़ दे, वही श्रीमती गांधी और संजय गांधी पर लगाये गये सारे आरोप के तहत दर्ज आपराधिक मामले वापस लिये जाये. मामला इतना पेचीदा था की उस समय के उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री और शीर्ष पुलिस अफसर, वाराणसी पहुच और बात चीत से, हवाई जहाज के सारे १३२ यात्रियों को रिहा करवाया और दोनों अपराधियों को पुलिस ने अपनी गिरफ्त में ले लिया.

इसी के पश्चात, २१ दिसम्बर १९७८, को कांग्रेस के कार्यकर्ताओं द्वारा श्री समर गुहा, के कलकत्ता स्थित निवास पर बम लगाने की धमकी देना और वही बंगलौर और हैदराबाद, में कांग्रेस कार्यकर्ताओं द्वारा हुल्लड़ में सार्वजनिक सम्पति को भी नुकसान भी किया गया जिसके तहत कई आम लोगो को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा था. लेकिन अगले दिन, इसी संदर्भ में और इंदिरा गांधी को जेल भेजने पर २३-दिसम्बर-१९७८, लोकसभा में हुई बहस के दरम्यान कांग्रेस के वरिष्ठ नेता श्री वसंत साठे और श्री आर.वेंकटरमण. ने हुल्लड़ पर तो दुःख प्रकट कर रहे थे  लेकिन हवाई जहाज के अपहरण को मात्र एक जोक कहकर, एक तरह से अपहरण कर्ता का बचाव करने की रणनीति अपना रहे थे. वही श्री आर.वेंकटरमण. ने बयान दिया “ये शिक्षा हमें गांधी जी से सीखनी चाहिये, जब वह अफ्रीका में थे या भारत की आजादी के दौरान, दांडी मार्च के तहत, नमक का कानून तोडना, इस तरह के आंदोलन नागरिक के स्वतंत्रता के अधिकार के तहत थे जिसे उन्होने अपनी असहमति के अधिकार की तरह प्रयोग किया था, इसलिये देश के नागरिक, ये महसूस करते हैं कुछ अपराध दंड अनुपात से बाहर हैं या अनुचित हैं. उनके पास असहमति का अधिकार हैं.”.

राजीव गांधी के केंद्र सरकार के कार्यकाल के दरम्यान श्री आर.वेंकटरमण. को भारत देश का राष्ट्रपति बनाया गया है वही हवाई जहाज के अपहरण कर्ता दोनों भोला पांडे और देवेंद्र पांडे, को कुछ समय बाद इनके हवाई जहाज अपहरण केस से अपराध मुक्त कर दिया गया. इसके विपरीत इन्हें १९८० लोकसभा चुनाव के समय, इन दोनों को कांग्रेस पार्टी से बतौर उम्मीद वार के रूप में टिकट दिया गया. लेकिन अपहरण हवाई जहाज के तहत इसके १३२ यात्री और क्रू कर्मचारियों की जान को खतरे में डालना, किस तरह अपराध मुक्त किया जा सकता हैं ? क्या ये महज़ मजाक था ?अगर, इन यात्रियों में कही कोई नामी व्यक्ति या नेता मौजूद होता तभी, ये बस एक मजाक होता ? क्या इस तरह केस वापस लेना, नागरिक को दो वर्ग आम और खास में नहीं बाट देता ? उसी तरह जमीनी हुल्लड़ में मारे गये, आम नागरिक को किस तरह न्याय मिल सकता हैं ? कुछ नकदी मुआवजा, आम नागरिक की जान की कीमत हो सकती हैं? शायद नहीं, जब व्यवस्था के शीर्ष नेता ही इस तरह के अपराध के क़सूर वार को सार्वजनिक रूप से प्रोत्साहित करते हैं,तो  भविष्य में इस तरह के अपराध होने की संभावना बढ़ जाती हैं वही आम नागरिक के न्याय की उम्मीद को ओझल भी करता हैं.

वही, इसी तरज पर भारत देश में एक और हवाई जहाज का अपहरण किया गया, यहाँ भी हथियार एक खिलौने के रूप में ही था. १९८१ में भारतीय एयर लाइन्स के हवाई जहाज जो दिल्ली से श्रीनगर की अपनी तय उड़ान पर था,जिसे अपहरण करके लाहोर ले जाया गया. इनकी मांग थी, उस समय कत्ल के केस में गिरफ्तार सिख जगत के नेता श्री भिंडरावाला की रिहाई की मांग की गयी थी. लेकिन, पाकिस्तानी फोर्स ने अपहरण कर्ता के सभी ५ सदस्यों को गिरफ्तार कर, इस अपहरण कर्ता के सरगना श्री गजिंदर सिंह के साथ-साथ सभी अपराधियों को पाकिस्तान में सजा दी गयी और इन्हें २००० में यहाँ से रिहा किया गया. कहा ये जाता हैं की ये सभी साल २००० में भारत वापस आये जहाँ इन्हें केद में ले लिया गया.लेकिन आज भी रुक-रुक कर इन पर  अदालती कार्यवाही होती रहती हैं. ()

व्यक्तिगत रूप से में किसी भी तरह की हिंसा के खिलाफ हु फिर वह चाहे आतंकवाद, नक्सलवाद, इत्यादि के रूप में हो या व्यवस्था द्वारा ही क्यों ना की गयी हो, जहाँ व्यवस्था द्वारा बल प्रयोग करने के पीछे सुरक्षा का कारण बताया जाता हैं वही इसके विपरीत कही ना कही इसी व्यवस्था से विद्रोह होता हैं. यहाँ, दो अपराध एक ही तर्ज पर किये गये, जहाँ इंदिरा गांधी जो की कभी व्यवस्था के शीर्ष पर थी, उनकी रिहाई के लिया किया गया अपराध एक जोक कहा जाता हैं वही अपराधियों पर ना कोई कानूनी कार्यवाही होती हैं और ना ही सजा, लेकिन इसके विपरीत व्यवस्था के मध्यनजर एक विवादित नेता को जेल से रिहा कराने के लिया किया गया अपराध को आतंकवादी घटना का नाम दिया जाता हैं,क्या पांडे दोस्तों द्वारा विमान का अपहरण, एक आतंकवादी घटना नहीं थी ?

अंत में, ऐसा क्यों होता हैं की व्यवस्था के शीर्ष पर बैठे लोगो पर सिर्फ आरोप लगते हैं जो कभी भी अपराध की तरह परिभाषित नहीं होते और ना ही उन्हें किसी भी तरह से कानून द्वारा सजा दी जाती हैं. क्या व्यवस्था, देश के कानून और संविधान से बड़ी हैं ? अगर ऐसे कई संजीदा अपराध में कानून द्वारा सख्ती की गयी होती तो हो सकता था की आगे ऐसे गुनाह को होने से रोका जा सकता, मसलन १९७८ में पांडे बंधुयो द्वारा अपहरण और १९८० में इन्हें लोकसभा का टिकट दिया जाता हैं, शायद इसी प्रोत्साहन ने इस सोच को जन्म दिया हो की विमान अपहरण एक अपराध नहीं हैं और १९८१ में एक बार फिर हवाई जहाज का अपहरण किया गया. मेरा व्यक्तिगत मानना हैं की अगर सच में,संविधान का स्वराज, भारत में लाना हैं तो सबसे पहले व्यवस्था को अपने भीतर कानून की मर्यादा का पालन सख्ती से करना होगा तभी एक आम नागरिक संविधान की गरिमा को समझ पायेगा और इसका संविधान में यकीन भी बरकरार रहेगा.

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