किसानों पर बढ़ता अत्याचार: रणनीति क्या हो?

Posted by Krishna Singh
July 5, 2017

Self-Published

मैं कुछ ऐसे नए और कुछ पुराने दोस्तों से मिला जो किसानों के साथ मिलकर उनके हित के लिए लड़ रहे हैं। बहुत सारे संगठन भी हैं जो इस लड़ाई में शामिल है। कुछ तो अपना ही स्वार्थ साध रहे हैं लेकिन कुछ वास्तव में ईमानदारी से लड़ भी रहे हैं। रास्ता शांति का है पर लक्ष्य क्या है? कर्ज माफ़ी, वाजिब दाम पर बीज और खाद की पूर्ति, सिंचाई की समुचित व्यवस्था और अंत में उत्पाद की उचित मूल्य पर खरीददारी और ज़मीन अधिग्रहण का विरोध।

अधिकांश मांगें वाजिब हैं पर क्या यह सारी मांगें पूंजीवाद में पूरी हो पाएंगी, जहां हर उत्पाद बाज़ार के लिए है, मुनाफे के लिए है? एक बात और ये कि जब भी किसानों का संघर्ष विकराल रूप लेगा, कई मांगें पुरी होंगी। सरकार किसी की भी हो, वो चाहे पूंजीपतियों के लिए कितनी भी निष्ठावान हो, मजबूरन मानेगी। हां, जब किसानों की एकता और संघर्ष ढीला पड़ जाएगा सारी जीत, सुविधाएं और मांगें एक-एककर वापस ले ली जाएंगी! जो आज नज़र आ रहा है। ज़मीन अधिग्रहण कानून का प्रस्ताव कांग्रेस का ही था, आज किसानों के भारी विरोध और प्रदर्शन के बावजूद यह कानून बन चूका है।

दूसरी तरफ मजदुर वर्ग के हित के दर्जनों श्रम कानून ध्वस्त कर दिए गए, सैनिकों की वन रैंक वन पेंशन की मांग ठुकरा दी गई। रोज़गार ख़त्म किये जा रहे हैं। सार्वजनिक संपत्तियां बड़े पूंजीपतियों को बेची जा रही हैं। प्राकृतिक सम्पदा देशी और विदेशी वित्त पूंजी के अधीन गिरवी रखी जा रही हैं। शिक्षा संस्थानों को पूंजी और धार्मिक उन्माद के तहत बर्बाद किये जा रहे हैं. मिडिया पर कुछ भी कहने की जरुरत नहीं है. स्वास्थ्य तो पूरी तरह पूंजी के खुनी पंजे में आ चूका है. न्याय व्यवस्था, पुलिस, प्रशाषण, सरकार, राजनितिक दल सभी के सभी इस बहती गंगा में हाथ ही नहीं अपना पैर भी धो रहे हैं.

कहने का तात्पर्य यह है की जन चेतना, एकता और संघर्ष के गिरावट पर पूंजी और उसके चाटुकार, चाकर वह सारे सुविधाएँ जो जनता ने संघर्ष कर दसियों वर्षों में अर्जित किये थे, एक झटके में वापस ले लेती है, और दिख रहा है, उससे ज्यादा भी हड़प लेगी. भारत ही नहीं, पुरे विश्व में इसका इतिहास सैकड़ों बार गवाह है! आज तो यह घटना अमेरिका, युक्रेन, भारत, अरब देश, लैटिन अमेरिका, सारे अफ्रीका, यूरोप में दिख रहा है! विश्व के 8 इंसानों के पास उतना धन संकेंद्रित है, जितना की आधे पृथ्वीवासियों के पास.

तो क्या करें? पहले तो लक्ष्य बदलें. सुधार के लिए नहीं एक क्रन्तिकारी बदलाव के लिए लड़ें. सुधार प्रतिवर्ती है, और आज के जमाने में नाटक है, पूंजी के चमचों और चाकरों का. सुधार करना कोल्हू के बैल की तरह खटना है और अपने शोषित भाईओं को पूंजी के चक्रव्यूह में पिसने देना! अभी हाल में जबरदस्त किसान आन्दोलन हुए, 6 मारे भी गए, केवल क्षणिक राहत मिला. क्या इसीके लिए 6 किसानों ने बलिदान दी?

दुसरे एकता का आधार बड़ा करें. केवल किसान या केवल मद्जुर, दलित, आदिवासी, महिलाएं, अल्पसंख्यक, बाल मजदुर निदान पर एकता नहीं. बल्कि हर शोषितों की एकता. शोषकों के खिलाफ. दुश्मन का एक ही वर्ग और चरित्र है, जो मुनाफे के लिए किसी भी हद तक गिर सकता है, चाहे आतंकवाद हो या फिर युद्द. बेरोजगारी, महंगाई, भ्रष्टाचार, कालाबाजारी, वेश्यावृति तो सामान्य है.

यदि लक्ष्य और एकता में यह मुलभुत आधार बदलना है तो, अगला प्रश्न विचारधारा का होगा. एक क्रन्तिकारी विचार, जो हमारे बीच है, भगत सिंह और उनके दल हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन के समाजवादी विचारधारा.

यदि कुछ सच्चाई नजर आती है इन विचारों में तो आगे बढ़ें, अपने आपको एक नयी क्रन्तिकारी विचारधारा से जोड़ें, क्रन्तिकारी दल के साथ जुड़े और क्रांति के लिए आगे बढ़ें! किसानों, मजदुर वर्ग और बाकि सारे पीड़ित वर्गों को साथ जोड़ें. यह आबादी 90% से ज्यादा है. यह बात बुर्जुआ वर्ग और उसके सिद्धांतकार अच्छी तरह समझते हैं और उनकी पूरी कोशिश होती है इस संभावित खतरों को दूर रखने की. उन्हें यह भी मालूम है, जनता की एकता को कैसे तोड़े. धर्म, जाति, देश, व्यक्तिवाद, दुष्प्रचार से. वह भी दिख रहा है, अबतो फासीवाद ही हमारे बीच है. मजदुर बेरोजगार हो रहे हैं, किसान आत्महत्या कर रहे हैं, बेकसूर या तो जेल में डाले जा रहे हैं या आयोजित भीड़ द्वारा मारे जा रहे हैं!

दोस्तों, क्रांति कोई शौख या फिर मन की आकांक्षा नहीं बल्कि एक जरुरत है. यह एक ऐतिहासिक जरुरत है. पूंजीवाद तक़रीबन 500 वर्ष पहले, सामंतवाद को हटाकर स्थापित हुआ था. आज उसका ऐतिहासिक जरुरत ख़त्म हो चूका है. इसमे मानवता के लिए और कुछ भी प्रगतिशील नहीं बचा है, यह मरणासन्न है, प्रतिगामी है. इसका जीवन केवल युद्ध, आतंकवाद, उत्पादक शक्तियों के नाश पर बचा हुआ है. अभी तो केवल बुर्जुआ तानाशाही (या चाहें तो बुर्जुआ प्रजातंत्र भी कह सकते हैं), फासीवाद में तब्दील हो चुका है.

किसान, मजदुर और बाकि सारे अन्य शोषित वर्ग के सामने और कोई भी रास्ता नहीं है. समाजवाद ही एकमात्र रास्ता है. आओ, इस ऐतिहासिक क्रन्तिकारी संघर्ष में शामिल हो जाएँ!

इन्किलाब जिंदाबाद! भगत सिंह जिंदाबाद!!

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