खबर (काल्पनिक है)

Self-Published

सुबह का वक़्त था, दिल्ली निगम की डाउन फ्लोर बस, दिल्ली के धोला कुआ से होती हुई गुड़गावँ शहर की तरफ बढ़ रही थी, ये बस ऐसी थी जिसके कारण यात्री कम ही थे, मसलन सभी को बैठने के लिये सीट मिल गयी थी इसी बीच घोला कुआ से इसमे एक महीला टीवी पत्रकार और उनके सहयोगी कैमरा मैन भी उनके साथ इसी बस में यात्री के रूप में मौजूद थे, दरअसल इनकी कैब धोला कुआ पर खराब हो गयी थी और गुड़गावँ के पुराने शहर में हो रहे मंत्री जी के प्रोग्राम का समय हो रहा था, इसलिये इन्होंने आज दिल्ली सरकार की ऐसी बस का सहारा लिया था.

धोला कुआं, से निकलकर बस आगे राष्ट्रीय मार्ग 8 पर सरसराट, दौड़ने लगी, आगे जाकर, टोल बूथ पर, बाकी वाहनों की तरह एक कतार में लग गयी, इसी बीच पीछे से कई और निजी वाहन भी इसी कतार में जुड़ गये और बस के दोनों तरफ लगी कतार भी तेजी से बढ़ने लगी, लेकिन किसी तकनीकी कमी के कारण टोल बूथ पर वाहन आगे नही बढ़ पा रहे थे, इसी बीच गुड़गावँ में होने वाली रैली के संदर्भ में कई और वाहन भी बस के साथ बाकी की कतारों में लग गये, जिसमे बड़ी संख्या में पार्टी कार्यकर्ता मौजूद थे.

इसी बीच, बस बहुत तेजी से हिली और एक जोर दार आवाज कही नजदीक में ही गूंजी, मानो कोई बम्ब फटा हो, इसी को खबर बनाने के संदर्भ में महीला टीवी पत्रकार ने, अपने कैमरा के माध्यम से इसे एक ब्रेकिंग न्यूज़ बनाने की तर्ज पर अपने टीवी चैनल पर, टीवी के प्रवक्ता के साथ जुड़ गयी और ये खबर का लाइव प्रसारण होना शुरू हो गया:

महिला पत्रकार: “अभी अभी गुड़गावँ के टोल बूथ, एक बहुत भारी आवाज सुनाई दी है, ये आवाज इतनी भयानक थी की इस बस को पूरी तरह हिला दिया, आप देख सकते है ये कोई मामूल बस नही है, इस विशाल काय बस को इस तरह झझोंड देना, किसी अप्रिय घटना की तरफ इशारा कर रहा है, हमैं इसकी अभी पुष्टि नही कर रहे लेकिन ये एक आत्मघाती या आतंकवादी हमला हो सकता है, आप देख सकते है की बम्ब धमाके के बाद, यँहा बुरी तरह से जाम लग गया है, अगर आप आस पास की गाड़ियों को देखेगे तो उनके भी सीसै टूट चुके है…”

अक्सर, जँहा गाड़ियों का काफिला जमा हो वँहा कुछ गाड़िया ऐसी होती है जिनके कांच टूटे होते है या उनपर किसी भी तरह की लकीर आयी होती है मसलन टूटने की निशानी होती है.

महिला पत्रकार: “आप जैसा की देख सकते है अभी किसी भी तरह की जान माल की हानी की पुष्टि नही की जा सकती, सारी सवारियां और आस पास के वाहन में बैठे लोग सहमे हुये है, याद रखिये आत्मघाती या आतंकवादी हमला, एक साथ श्रेणी बंद होते है, तो क्या हम इस बात से क्या कयास लगाये की इस तरह के और भी धमाके यँहा या तो कही और इसी शहर में या देश के किसी और हिस्से में हो सकते है, आप आज चोकनै रहिये, आप की जान माल इस देश के लिये, आप के परिवार के लिये बहुत कीमती है …”

इस खबर को सुन रहा दर्शक अब ड़र जाता है, वह सबसे पहले अपने परिवार और दोस्त।मित्रो को फोन करके या whatsapp / सोशल मीडिया के जरिये इस खबर का प्रसारण करता है, वह पूछना चाहता है की सब कुशल मंगल है वही एक चेतवानी भी देता है की आज संभल कर बाजार और ऑफिस जाना, कुछ कमजोर दिल वाले जिनका ब्लड।प्रेशर अक्सर ज्यादा रहता है वह आज घर पर ही रहना पसंद करते है, इस खबर का असर हो रहा था की एक दर्शक इस टीवी चैनल से जुड़ रहा था वही तेज रफ्तार दौड़ रहा देश भी अब रुकने लगा था.

महिला पत्रकार : “आइये, इस बस के ड्राइवर से पूछते है, की उन्हे इस धमाके का कब ज्ञात हुआ और ये कैसे इस से बच पाये.”

महीला पत्रकार : “आप को कब लगा की कोई बड़ा धमाका हुआ ?”
ड्राइवर: “बस अभी यँहा ट्रोल पर रोकी ही थी की धड़ाम से आवाज आई जिसने इस बस को पूरी तरह से हिला दिया”
महीला पत्रकार: “आप को क्या लगता है की इस घटना के पीछे किसका हाथ है?”
ड्राइवर: “जी, भारत में जितने भी धमाके होते है वह सारे पाकिस्तान द्वारा ही किये जाते है.”
महीला पत्रकार: “हम इस जाबाज ड्राइवर को सलाम करते है, इस जज्बे की सराहना करते है की ये इस आतंकवादी हमले के बीच भी, अपनी सवारियों और बस के साथ मौजूद है, अगर ये चाहता तो इस बस को छोड़कर भाग सकता था”

असलियत, में बस के आस पास इतनी ट्रैफिक और वाहनों का जमावड़ा हो चूका था, की कीसी भी तरह से बस का दरवाजा खोल पाना और बाहर निकलना मुश्किल था

महीला पत्रकार: ” इसी घटना के संदर्भ में, हम कुछ और सवारियों से पूछते है.”

एक सवारी की तरफ इशारा करके

महीला पत्रकार: “आप को किस पर शक है?”
सवारी: “जी, जब बस यँहा रुक रही थी तभी मैंने एक दाढ़ी वाले इंसान को उस और भागते हुये देखा, उसके हाथ में एक बड़ा सा हरे रंग का कपड़ा भी पकड़ा हुआ था.”

इस गवाही ने, इस खबर में जान डाल दी, अब ये खबर से आगे बढ़कर एक चर्चा का विषय बन जायेगी

महीला पत्रकार: “जैसा की चस्मदिदो का ब्यान है, की उन्होंने अपनी आँखों से एक दाढ़ी वाले इंसान को, जो हटा कटा था, उसे उस दिशा में भागते हुये देखा जँहा से भागने का रास्ता आसानी से मिल सकता है, एक और खास बात की उसके हाथ में एक बड़ा सा कपड़ा पकड़ा हुआ था जिसे वह हवा में हिलाता हुआ जा रहा था और इस कपड़े का रंग हरा था.”

महीला पत्रकार, अब तक जोर जोर से बोल रही थी लेकिन अब उसने अपनी आवाज नीची करकर कहा

महीला पत्रकार: “क्या ये पाकिस्तान का झंडा तो नही था? अगर हां, तो ये हमारे देश की स्वायत्ता पर सवाल है जँहा भारत देश की राजधानी दिल्ली में ही इस तरह खुले आम पाकिस्तान का झंडा लहराया जा रहा है.”

इसी बीच इस खबर को एक फिल्म स्क्रिप्ट का लेखक रमेश और फिल्म निर्माता रूपेश, मुंबई में देख रहे थे, जो की अपनी आने वाली फिल्म की स्क्रिप्ट पर काम कर रहे है, और कानपूर में एक जुते की फैक्ट्री का मालिक नरेश बेदी इस खबर को देख रहा था जिसे अपनी कंपनी में नये मजदूरों की तलाश है. पूरा देश, एक तरह से इस खबर को देख रहा था.

इतने में ट्रोल ठीक हो गया और बस आगे, चल पड़ी, लेकिन इस खबर का असर था जिसके कारण गुड़गावँ में होने वाली मंत्री जी की सभा को स्थायी समय के लिये टाल दिया गया, वही इस सभा में आ रहे राजनीतिक कार्य कर्ता, जो की ट्रोल पर भी मौजूद थे, सभी ने राजनीतिक पार्टी के मुख्य दफ्तर की और रुख किया जँहा इन्होंने पाकिस्तान विरोधी नारे लगाये और पकिस्तान के झंडे को भी जलाया गया. और सत्ता में मौजूद विरोधी दल के नेता को इस पर कठीन से कठीन कार्यवाही करने के लिये चेताया गया.

इसी बीच, बाकी के न्यूज़ चैनल ने भी इसी खबर को प्रमुखता से दिखाना शुरू कर दिया, अब ये खबर, एक खबर ना रहकर चर्चा का विषय बन गयी थी, इसी बीच, घटना के दो दिन बाद, सुरक्षा दलों ने घटना स्थल का अध्धयन करके इस बात की पुष्टि कर दी की यँहा कोई बम्ब फटने के सबूत नही मिले, वही इन दो दिन तक यही खबर और चर्चा न्यूज़ चैनल पर चल रही थी की पकिस्तान को इस घटना का कीस तरह का जवाब देना चाहिये, क्या भारत को पकिस्तान पर हमला कर देना चाहिये और अगर हमला होता है तो सूरते आह्याल क्या होंगे? इसी बीच, दाढ़ी वाला, हटा कटा, जिसके हाथ में हरे रंग का बड़ा सा कपड़ा था, वह इंसान कोन था, बीच बीच में पुष्टि की गयी की ये हाफ़िज़ है, सईद फिरोज, इत्यादि अलग अलग नाम पर हमारा न्यूज़ चैनल का मीडिया मोहर लगाता रहा.

लेकिन इस बात की पुष्टि होने से की कोई बम्ब नही फटा, सभी न्यूज़ चैनल ने अपना रुख इस और कर लिया की ये क्या था, क्या इसके पीछे चाइना, अमेरिका का हाथ तो नही, तब तक ये खबर अपना प्रभाव जनता पर कम कर चुकी थी और इसी बीच न्यूज़ चैनल अब किसी और खबर को तलाश रहा था, मतलब ढूढ रहा था.

इसी खबर से प्रभावित होकर रूपेश और रमेश ने अपनी फिल्म का खलनायक एक दाढ़ी वाला हटा कटा इंसान की छवि को बना दिया, दरअसल इनके साथ कई वर्षों से गुलबर्ग नाम का व्यक्ति काम करता था, तो इन्होंने खलनायक का नाम भी गुलबर्ग दे दिया और नायक की श्रेणी में एक मुख्य नायक जिसका नाम राहुल था वही कुछ 11 और सहनायक, चुने गये जिनमे एक का नाम हरविंदर और दूसरे का नाम रहमान दिया गया लेकिन इन्हे फिल्म में ज्यादा जगह नही मिली वही बाकी के 9 सह नायकों का नाम मोहन, अंकित, इत्यादि नाम रखे गये.

फिल्म रिलीज़ हुई, इसके पोस्टर मैं एक तरफ फिल्म का खूबसूरत नायक था और दूसरी तरफ खलनायक, जो अपने रोल के हिसाब से कभी क्लीन सेव होता है लेकिन आखिर में जब वह अपनी असली पहचान नायक के साथ करवाता है तब वह उसकी असल शक्ल सूरत में होता है जिसमे गुलबर्ग है और बम्ब वाली खबर में हरे रंग को पकड़ कर दौड़ रहे इंसान का हुलिया बताया गया है, फिल्म रिलीज़ होती है और दर्शकों द्वारा बहुत सरहाई जाती है, फिल्म में जँहा दर्शक नायक को पसंद करता है वही खलनायक से इतनी नफरत हो जाती है की वह अब किसी भी प्रकार से समाज में किसी को भी दाढ़ी में देखना पसंद नही करता. उसे इस तरह की शक्ल सूरत से इस तरह की नफरत हो जाती है की अगर उसके सामने किसी दाढ़ी वाले का मसलन फिरोज, गुलबर्ग, इत्यादि का कत्ल भी कर दिया जाता है तो उसे इस बात का कभी भी बुरा नही लगेगा और ना ही उसके जज्बात कभी कत्ल हो रहे फिरोज या गुलबर्ग से जुड़ पायेगे, इसके विपरीत उसे इस कत्ल में खुद की सुरक्षा का एहसास होगा क्योंकि जिस तरह फिल्म में खलनायक को मार का समाज सुधार किया जाता है वही इस मानसिकता को जन्म देता है की इसी तरह असलियत में भी होना चाहिये.

अब इस बम्ब वाली खबर से प्रभावित होकर नरेश बेदी अपने यँहा किसी भी व्यक्ति को नोकरी नही देते जिनका हुलिया उस इंसान की तरह दीखता था जिसे बम्ब वाली खबर में हरा रंग के कपड़े को भागते हुये देखने की पुष्टि की गयी थी, इसी खबर का असर था की बेदी जी अब अपने यँहा सालो से काम कर रहे जहीर को भी शक की नजर से देख रहे थे.

बम्ब वाली खबर से, हमारे देश और इसके समाज में, दाढ़ी में दिखने वाले एक आम से इंसान की जिंदगी को मुश्किल कर दिया था, अब उसके लिये रोजगार भी कम हो गये थे वही समाज में अक्सर इसको शक की नजर से देखा जाने लगा था, समाज में कही भी कोई चोरी, कत्ल या लूट पाट की खबर आती तो, सबसे पहले एक आम इंसान के जेहन में यही दाढ़ी वाला मुल्जिम की छवि में उभरता था. सही मायनों ने बम्ब वाली खबर ने समाज को एक नायक और एक खल नायक की शक्ल में, दो चेहरों में बाट दिया था, एक नायक जो की क्लीन शेव है वही खलनायक दाढ़ी के रूप में मौजूद है.

लेकिन बम्ब की असलियत क्या थी? कुछ दिनों बाद ये बस सरकारी डिपो में गयी जिसकी सर्विस की गयी तो पता चला की बस का एक पीछे का टायर जो की बस के अंदर की तरफ था, वह फटा हुआ है, मसलन उस दिन बम्ब नही ये टायर फटा था, वही ये बस जिसमे अधिक किराया होने के कारण अक्सर सवारी कम ही होती है इसकी वजह से ये अपने पीछे के तीन टायर पर बिना किसी अवरोध के चलती रही, लेकिन बम्ब वाली खबर पुरानी हो गयी थी वही कोई मानना भी नही चाहता था की उस दिन बम्ब फटा था, इसलिये लोग बुक में लिखा गया की ये टायर कहा फटा है इसकी कोई जानकारी नही है.

वही वह दाढ़ी वाला इंसान, एक राधेश्याम नाम का कृष्ण भगत था, जिसने गावँ का कुरता पजामा और सर पर हल्का सा साफा बाँधा हुआ था, वह हरे रंग का कपड़ा अपनी गाड़ी से लेकर दूसरी गाडी एम्बुलेंस की और भाग रहा था जिसमे उसकी गर्भवती पत्नी को बच्चा होने का दर्द शुरू हो गया था, जँहा किसी भी कपड़े की ना मौजूदगी में वह एक हरे रंग की चादर को लेकर जा रहा था जिस से प्रसाव के समय अतरिक्त बह रहे खून को पोचा जा सके.

मसलन एक टायर के फटने को आंतकवादी घटना से जोड़कर एक दाढ़ी वाले आदमी की शक्ल में एक आतंक वादी को दिखाकर क्या न्यूज़ चैनल की खबर ने समाज को नही बाट दिया, जँहा दूर बैठे गुलबर्ग और जहीर को पता भी नही चला की वह कब खलनायक बन गये और कब वह देश और समाज के लिये खतरा बनकर उभर आये.

बस, यही है भीड़ का उग्र रूप जो गुलबर्ग और जहीर को मार रही है लेकिन उसे ये नही पता की इस रूप में कोई राधे श्याम भी हो सकता है.

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