गाय हमारी माता है, हमको कुछ नही आता है।

Posted by Ayman Jamal
July 1, 2017

Self-Published

गौ रक्षा के नाम पर देश मे बन रहा माहौल पिछले तीन सालों में, इस समय अपने चरम पर है। गाय के नाम पर जो हिंसा परोसी जा रही समाज मे वो सरकार की विफलता का प्रतीक बनती जा रही।
बाबा रामदेव के गोनाइल का ऐड देख कर समझ आता है के कैसे गाय को कारोबार के लिए इस्तेमाल कर इस माहौल का राजनीतिक ही नही, कारोबारी फायदा भी उठाया जा रहा है। जहां एक तरफ बाबा रामदेव स्वदेसी का परचम लेके लोगो को बेवकूफ बना रहे, वहीं दूसरी तरफ सरकार FDI में ढील देती जा रही। समझ नही आता दो तरह की बिल्कुल विपरीत बातों को कैसे इस देश की जनता आराम से एक ही समय पर पचा ले रही।
क्या जनता में ही कमी है? या के जनता को ऐसे माहौल में फसाया जा रहा के सोचने, समझने और सवाल करने की क्षमता को धीरे धीरे खत्म किया जा सके।
गाय के नाम पर मानो कुछ भी हो सकता है अब इस देश मे। गाय माता हैं, तो क्या माता के नाम पर नरसंहार माता का अपमान नही?
ये जो नया ट्रेंड है एकल हिंसा का, ये सरकार के लिए संभाल पाना ज़्यादा आसान है। बड़ा दंगा होने पर सरकार की किरकिरी होती है। लेकिन जब एक ट्रेंड के तहत, ऐसी एकल हिंसा राजनीतिक फायदे के लिए उपयोग की जाए तो  सीधी जवाबदेही से बचना सरकार के लिए थोड़ा आसान ही रहता है।
ईद पे हुए शांति पूर्वक विरोध, प्रोफ. प्रेम सिंह जी का उपवास, और नॉट इन मय नेम का बड़ा प्रदर्शन जो हुआ देश भर में 28 जून को, उसकी रिपोर्टिंग अच्छे पैमाने पर केवल NDTV ने ही कि, बाकी न्यूज़ चैनल और मीडिया हाउस तो बस अपने डिप्लोमेटिक, पैसिव तरीके से माहौल बनाने में लगे रहते हैं। उनके लिए ये खबरें कम महत्व रखती हैं। इससे ज़्यादा वक़्त तो वो सास बहू के सीरियल में क्या हुआ दिखाने में लगा देते हैं।
बात इस ईद की है, और दिल मे फिर बात उठी के बकरीद में क्या होगा। बकरीद पर मुसलमान अपने धर्म के अनुसार जानवर की कुर्बानी देते हैं। हर जानवर की नही दे सकते। कुछ विशेष जानवरों की ही दे सकते हैं जैसे कि बकरी, बकरा, ऊंट, भेड़ आदि। रीत अनुसार कुर्बान किये जानवर का मास गरीबों में बांटा जाता है। कुछ रिश्तेदारों के यहां जा के भी दिया जाता है। ऐसे में मास बांटने निकले लोगो की जान माल की सुरक्षा की क्या गारंटी रह जाती है? ट्रेंड के अनुसार मास चाहे बकरे का हो, गाय का नाम लेकर भीड़ जान से मार दे रही है। ऐसे में मास लिए हुए, भीड़ के आगे कौन ये साबित कर पायेगा के मास गाय का नही बकरे का है? क्या सरकार लॉ एंड आर्डर बनाए रखने में सक्षम है?
क्या भारत का मुसलमान बकरीद बिना मानसिक भय के मना पायेगा?? या के जबरन थोपे जा रहे शाकाहार का असर धार्मिक त्यौहारों पर भी चढ़ने लगेगा??
लोगों को ये समझना होगा की शाकाहारी या मांसाहारी होना किसी पे भी थोपा नही जा सकता। सबका धार्मिक और सांस्कारिक परिवेश भिन्न होता है। नार्थ ईस्ट स्टेट का हिन्दू भी मास खाता है। वहां का कल्चर अलग है। और ऐसा भी नही है के हर हिन्दू शाकाहारी है। ऐसे ही हर धर्म से जुड़ा कल्चर भी अलग होता है। पर जब बकरीद आती है तो इंटरनेट पर खून भरी सड़कों की तस्वीरें वायरल करके लोग माहौल बनाने में जुड़ जाते हैं। दलीलें भी हिंसक अंदाज़ में देते हुए नज़र आते हैं। शाकाहार की दलील हिंसा के साथ देने वाले बहुत कुछ भूले बैठे होते हैं, और उनमें से सबसे महत्वपूर्ण इंसानियत, सहिष्णुता और साझा विरासत होती है।
इस ईद तो काली पट्टी से विरोध जता कर मुसलमानों ने आवाज़ उठाई है, अब बकरीद के लिए प्रसाशन को भी कुछ ऐसा इंतेज़ाम करना होगा कि मुसलमान बिना भय के इस देश मे जी सकें।

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