गोपाल कृष्ण गाँधी: उप-रास्ट्रपति पद के स्वयंभू “सिटीजन कैंडिडेट”

Posted by Hitesh chaurasia
July 16, 2017

Self-Published

जी हाँ स्वघोषित नहीं स्वयंभू. क्यूंकि भारत में स्वयंभू मंदिरों और देवी देवताओं  की एक प्राचीन परंपरा है. हमने अक्सर स्वयंभू महादेव, गणेश, हनुमान और देवी मंदिर देखे हैं. कहा जाता है की इस मंदिर की मूर्ति अपने आप वहां प्रकट हुई.( रास्ट्रीय पुरुस्कार प्राप्त मराठी फिल्म देउल स्वयंभू मंदिरों के मायाजाल और गोरखधंधे  को बखूबी दर्शाती है.)   इसी तरह कई हिन्दू संगठन स्वयंभू हिन्दुओं के प्रतिनिधि, कई राजनैतिक पार्टिया दलितों, पिछड़ों और मुस्लिमों की प्रतिनिधि हैं. यहाँ तक की सभी न्यूज़ चैनल्स स्वयंभू जनता की आवाज़ हैं.

इसी तरह गोपाल गाँधी खुद को विपक्ष का राजनैतिक उम्मीदवार कहलाने की वजाय सिटीजन कैंडिडेट घोषित करने का प्रयास कर रहे हैं. ये अपने मुह मिया मिठ्ठू बनने जैसी बात हुई.

भारत के सबसे लोकप्रिय राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने, चुनाव के दौरान या चुने जाने के बाद भी  कभी खुद को जनता का उम्मीदवार नहीं कहा. लेकिन जिस तरह उन्होंने राष्ट्रपति के पद पर रहते हुए आचरण किया और आम जनता से घुले मिले तब लोग उन्हें पीपल्स प्रेसिडेंट या जनता का राष्ट्रपति कहने लगे.

गोपाल गाँधी पढ़े-लिखे व्यक्ति हैं. कई उच्च पदों पर उन्होंने काम भी किया है. भारतीय प्रशासनिक सेवा और सार्वजनिक जीवन में उनका एक लम्बा अनुभव है. पश्चिम बंगाल के राज्यपाल के तौर पर उन्होंने जिस तरह नंदीग्राम, सिंगुर हिंसा के बारे में खुलकर अपने विचार प्रकट किये उससे राज्यपाल के पद की गरिमा बढ़ी है. मुझे उम्मीद है की, उन्हें ज्ञात है की भारत के राष्ट्रपति उप-रास्ट्रपति के चुनाव राजनैतिक पार्टियों के निर्वाचित प्रतिनिधि करते हैं. उनका जनता से सीदे सीधे कोई सरोकार नहीं होता. यहाँ तक की उप-रास्ट्रपति का चुनाव तो केवल संसद सदस्य करते हैं. यहाँ तक की प्रधानमंत्री का चयन भी चुने हुए सांसद करते हैं. बीजेपी ने २०१४ में मोदी को प्रधानमंत्री का उम्मीदवार घोषित किया था. लेकिन विपक्षी दलों ने किसी को उम्मीदवार नहीं बनाया था.

गोपाल गाँधी जैसे पढ़े लिखे व्यक्ति को ये सब बहुत अच्छे से पता है फिर आखिर अपने आपको सिटीजन कैंडिडेट कहने का क्या प्रयोज़न हो सकता है?
क्या वे सत्ता पक्ष द्वारा घोषित किये जाने वाले उम्मीदवार को राजनैतिक और खुद को अराजनैतिक दिखाना चाहते हैं? ताकि उनका कद बढ़ा लगे. जब भारतीय संविधान निर्माताओं ने देश की ज़िम्मेदारी राजनेताओं को सौपी है तो क्यों उन्हें हेय दृष्टी से देखा जाता है? आखिर राजनैतिक होने से दिक्कत क्या है? क्या प्रशासनिक अधिकारी, डॉक्टर, इंजिनियर, शिक्षक भ्रष्ट नहीं होते. आज देश जिस हाल में है. क्या उसका सारा जिम्मा मुट्ठी भर नेताओं पर देना ठीक है? क्या बाकी लोगों की कोई जिम्मेदारी नहीं?  खासतौर से स्वघोषित बुध्हिजीवी वर्ग  जो हमेशा राजनीती को अछूत घोषित करते रहते हैं. हालांकि उनसे लाभ लेने में इन्हें कभी कोई संकोच नहीं रहता. आखिर राज्यपाल का पद भी एक राजनैतिक नियुक्ति है.

राष्ट्रपति चुनाव से ठीक पहले तक प्रणव मुख़र्जी विशुद्ध राजनैतिक व्यक्ति थे. मगर जिस तरह से उन्होंने राष्ट्रपति पद पर कार्य किया वह आपने आप में एक मिशाल है. वो भी तब जब उनके कार्यकाल का ज्यादा हिस्सा बीजेपी सरकार के साथ गुजरा. गंभीर विषयों पर उन्होंने बहुत मजबूती के साथ अपने विचार प्रकट किये. जीएसटी के कार्याक्रम में उनका भाषण दलगत राजनीति से बहुत ऊपर उठकर था.
वहीँ हामिद अंसारी एक पढ़े लिखे अनुभवी प्रशासनिक और शिक्षाविद हैं लेकिन जब यूपीए सरकार भ्रस्टाचार के आरोपों से घिरी हुई थी और पुरे देश में लोकपाल के लिए अराजनैतिक जन आन्दोलन हो रहा था. ऐसे समय में लोकपाल बिल पर चर्चा के दौरान हामिद अंसारी ने अचानक राज्य सभा स्थगित करके सरकार को बचाया.

तो यह कहना की अराजनैतिक उम्मीदवार राजनितिक उम्मीदवार से बेहतर होते है ये बुद्धिजीवी वर्ग द्वारा बनाया गया एक छ्लाबा है. ताकि उनके बीच के लोग भी इन महत्वपूर्ण पदों पर पिछले दरवाज़े के रास्ते पहुँच सके.

या उन्हें पता है की वो हारने वाले हैं, इसीलिए वे बड़ी चतुराई वे इस विशुद्ध राजनैतिक चुनाव को विचारधारा और मूल्यों के चुनाव में बदलना चाहते हैं. ताकि उप-रास्ट्रपति चुनाव हार के के बाद भी वे, भारतीय राजनीति में अपने लिए कोई सम्भावना बना सके? खासतौर से राहुल गाँधी के निराशाजनक प्रदर्शनक और नितीश कुमार की महागठबंधन से चल रही अनबन के चलते विपक्ष को मनमोहन जैसे एक चेहरे की तलाश होगी. फिर इनके पास तो गाँधी उपनाम भी हैं.

उन्होंने कहा की वे  ये चुनाव विचारधारा के लिए लड़ रहे हैं. देश में भय का माहौल है. और भी ना जाने क्या क्या?

आखिर किस विचारधारा की बात कर रहे है वो? वही विचारधारा जिसने राष्ट्रपति पद के लिए उन्हें सिर्फ और सिर्फ जाति के आधार पर अयोग्य घोषित कर दिया? उनका सारा अनुभव, सारा ज्ञान सिर्फ जाति के नाम पर धरा का धरा रह गया. खैर गोपाल गाँधी ने सोचा होगा भागते भूत की लंगौटी ही सही. क्या उनमे हिम्मत हैं की वे लालू जैसे भ्रस्टाचार में दोषी पाए गए सजायाफ्ता राजनैतिक का समर्थन लेने से इनकार कर सके. मगर उन्हें पता है की अगर भ्रस्टाचार को कसौटी बनाया जाए तो उन्हें असल में “सिटीजन कैंडिडेट” बनना पढ़ेगा और तब किसी पार्टी से वो समर्थन नहीं ले पायेंगे. अपने लम्बे प्रशासनिक अनुभव से उन्हें इतना तो पता है कि किन मुद्दों को कसौटी बनाना चाहिए? कब बोलना चाहिए और कब नहीं? किसका विरोध करना है और किसका नहीं.

जो लोग रामनाथ कोविंद के बारे में जानने के लिए गूगल और विकिपीडिया पर जाने की सलाह दे रहे थे वे गोपाल गाँधी के बारे में भी थोडा पढ़े. १९४६ में जन्मे गाँधी १९६८ में आईएस बन गए थे. यानी सिर्फ २२ साल की उम्र में. वे निश्चित रूप से एक कुशाग्र बुद्धि के छात्र रहे होंगे. १९६८ से १९८५ तक तमिलनाडू में विभिन्न प्रशासनिक पदों पर रहने के बाद अगले सात साल तक वे उप- रास्ट्रपति और राष्ट्रपति के सचिवालय में थे. १९९२ से २००३ में सेवानिवृत होने तक वे विभिन्न देशों में राजदूत भी रहे. अगले ही साल कांग्रेस ने उन्हें राज्यपाल बना दिया.

इस लेख का उद्देश्य गोपाल गाँधी के अनुभव या उपलब्धियों पर सवाल उठाना नहीं है. लेकिन ये स्वाभाविक है की गाँधी-राजगोपालाचारी परिवार के होने के नाते उन्हें बेहतरीन शिक्षा के अवसर भी मिले. गिने चुने अपवादों को छोड़कर आज भी आईएस कुलीन वर्ग तक ही सीमित है तो आप सोच ही सकते हैं १९६८ में कितने लोगों को अवसर मिलता होगा?

जो लोग दिल्ली की सत्ता के गलियारों में उच्च पदों की नियुक्तियों के बारे में जानते है, उन्हें पता है कि आईएस में भी किसको कहाँ रखना हैं ये कैसे तय किया जाता है. अगर वे वास्तव में देश के लिए कुछ करना चाहते तो राष्ट्रपति, उप-राष्ट्रपति सचिवालय की जगह शिक्षा, स्वास्थ्य या शहरी विकास जैसे किसी ज़मीनी विभाग में काम करते. या कमसे कम गाँधीजी के प्रिय विषय स्वच्छता को लेकर ही सरकार में रहते हुए कोई अभियान चलाते.

बार बार कहा जाता है की गोपाल गाँधी को लम्बा प्रशासनिक अनुभव है, मगर क्या कार्यकाल का लम्बा समय ही एक मात्र कसौटी होती है? अधिकतर आईएस इतने वर्ष ही नौकरी में रहते हैं. तो क्या सभी बेहतरीन होते हैं? मैंने बहुत खोजा मगर किसी नीति विशेष या विभाग में उनके द्वारा लिए गए निर्णय या पहल की कोई जानकारी कमसे कम नेट पर उपलब्ध नहीं है. हाँ उनके लेखों और कुछ चर्चित किताबों के अनुवाद की जानकारी ज़रूर उपलब्ध है. एक लेखक और विचारक के रूप में उनका सम्मान बहुत है. लेकिन हमारे देश की यही समस्या है की नेता क्रिकेट बोर्ड में व्यस्त हैं , क्रिकेटर एक्टिंग कर रहे हैं, एक्टर कहानियाँ लिख रहे हैं और लेखक नेतागिरी कर रहे हैं. क्या ये अच्छा ना हो की जिसका जो काम है वो ईमानदारी से करे.

वैसे अधिकारीयों के कामों की चर्चा कम ही होती है लेकिन एस. आर. शंकरन को जनता का आईएस कहा जाता था, उन्होंने बंधुआ मजदूरी की प्रथा को बंद करने में अहम् रोल निभाया. टी एन शेषन ने चुनाव आयोग का रुख बदल दिया. केपीएस गिल और अजित धोभाल ने हिंसा प्रभावित पंजाब और उत्तर पूर्व में बहुत बेहतरीन काम किया.
अभी हाल में नागालैंड से एक युवा आईएस अधिकारी आर्मस्ट्रांग पेम ने मणिपुर में १००km की रोड अपने फंड्स और जनता द्वारा दिए गए सहयोग से बना कर एक मिशल पेश की है. ऐसे कई लोगों को चर्चा यदा-कदा होती रहती है.

दुर्भाग्य से अच्छा काम करने वाले प्रशासनिक अधिकारीयों को लगातार परेशान किया जाता है. जैसे अशोक खेमका( रोबर्ट वाड्रा केस ) का २०-२२ साल में ४० से अधिक बार स्थानांतरण किया गया है. अभी हाल में ही यूपी की महिला पुलिस अधिकारी को भी बीजेपी कार्यकर्ताओं को नियम बताने के लिए नेपाल सीमा के पास भेज दिया गया है. कभी कभी तो एमपी के आइपीएस नरेन्द्र कुमार और कर्नाटक के आईएस डी रवि की तरह ईमानदार अधिकारीयों को मार भी दिया जाता है.

इसका तात्पर्य यह कतई नहीं है की बाकी सारे अधिकारी भ्रष्ट हैं, मगर यह तय है की इतने लम्बे कार्यकाल के दौरान अगर गोपाल गाँधी जैसे अधिकारी भी नेताओं से कभी नहीं भिड़े तो थोडा आश्चर्य होता है. इसके दो ही मतलब हो सकते हैं की या तो उन्हें कांग्रेस की सरकारों ने उन्हें महत्वपूर्ण विभागों से दूर रखा या फिर उन्होंने खुद इस तरह के विभाग चुने. जहाँ ज़मीनी स्तर पर जाकर काम न करना पढ़े या नेताओं से सीधा टकराव न हो.

गोपाल गाँधी के आईएस रहते देश ने आपातकाल भी देखा, सिक्ख समुदाय का सरकार के संरक्षण में नरसंहार भी देखा है. तो आज अगर उन्हें देश में हिंसा या भय का माहौल दिखता है तो ये सवाल लाज़मी है की उस समय उन्होंने क्या किया? आखिर देश और जनता का अहित देखते हुए भी उच्च पदों पर बैठे अधिकारीयों का मूक दर्शक बने रहना क्या उचित है? आज हम मनमोहन सिंह की आलोचना भी सिर्फ चुप रहने के लिए ही करते हैं. या अपनी नौकरी पूरी करने के बाद अचानक उन्हें देश की चिंता हो गयी है.

हालांकि गोपाल गाँधी हर लिहाज़ से राष्ट्रपति और उप-राष्ट्रपति दोनों पदों के लिए योग्य हैं. लेकिन देश में उनसे अधिक पढ़े लिखे और अनुभवी आईएस अधिकारी भी हैं,  सिर्फ उनके पास गाँधी-राजगोपालाचारी के वंशज होने की विशेष योग्यता नहीं हैं. क्या यह महज़ संयोग है की राष्ट्रपति, उप-राष्ट्रपति दोनों पदों के लिए कांग्रेस की अगुआई वाले विपक्ष ने राजनैतिक परिवारों के वंशजों को चुना है.

गोपाल गाँधी बहुत खुलकर राजनैतिक लेख लिखते हैं. जिसका स्वागत किया जाना चाहिए. ऐसे पढ़े लिखे लोगों को तो सक्रिय राजनीति में आकर एक आदर्श प्रस्तुत करना चाहिए. अगर वे सचमुच अपने आप को सिटीजन कैंडिडेट साबित करना चाहते हैं तो उन्हें सक्रिय राजनीति में आना चाहिए. कई लोगों को शायद उनसे प्रेरणा मिले. हाँ मगर सक्रिय राजनीति एक पूर्णकालिक जिम्मेदारी है. ये कोई नौकरी नहीं हैं की जिसमे पद पर बने रहने की गारंटी होती है. उल्टा  जनता की अपेक्षाओं पर खरे उतरने का दवाब हमेशा बना रहता है. खुद इंदिरा गाँधी और अटल बिहारी वाजपेयी जैसे लोग को जनता चुनाव में नकार चुकी है. तो सक्रिय राजनीति में उन्हें जनता के बीच जाना होगा, धूल मिट्टी, पसीने में तर होना होगा. सिर्फ सेमीनार हाल में अच्छे बुरे पर प्रवचन देने से काम नहीं चलेगा. ज़मीन पर आकर उन प्रवचनों के हिसाब से बदलाव लाकर दिखाना होगा. राजनेताओं की आलोचना बहुत आसान है, मगर यथ प्रजा तथ रजा के हिसाब से हमें वैसा ही नेता मिलता है जैसा ज्यादातर लोग चाहते हैं.

खैर गोपाल गाँधी का स्वयंभू सिटीजन कैंडिडेट बनने का प्रयास सतही है.इसकी कोई आवश्यकता नहीं थी. ऐसा करने से उनकी देश और समाज की चिंता भी विश्वसनीय नहीं लगती. फिर भी चुनाव के लिए शुभकामनाये.
खैर जो लोग सुविधा के हिसाब से बोलते और चुप रहते हैं उन के लिए नुसरत फलेह अली खान साहब की एक कव्वाली पेश है.

कहना ग़लत ग़लत तो छुपाना सही सही

https://www.youtube.com/watch?v=q89NdfH-P8Q&index=6&list=RDQPA0HToz3oU

 

 

 

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